सर पर जो रख दे अपना हाथ,
लगता है हर वक्त हँ हमारे साथ,
बनी रहे उनकी हम पर छत्रछाया,
हर मुश्किल में दिल मांगे उनका साया,
उनके कांपते हाथों में भी है शक्ति भरी,
उनके आशीर्वाद से ही है जिंदगी हरी-भरी,।।
जिस घर में है बुजुर्गों का सम्मान,
घर के रथ की है उनके हाथों में कमान,
फ़िर कैसे अधूरे रहेंगे वहां किसी के अरमान,
काश आज के बच्चे खुशी का राज़ समझ पाते,
तो क्यों अंधेरे में अपने वो कदम बढाते।।
“किसी भी वर्तमान समाज और परिवार की अखंडता व सांस्कृतिक वैभव का पिरामिड यदि इस आधुनिकता के तूफान में मजबूती से खड़ा है तो उसका मूल कारण है उसकी बुनियाद में अपने बुजुर्गों का तप,त्याग,साधना,उत्कर्ष और निराभिमानी जीवन साधना को जीवन का आभूषण मानकर जीवन जीना जिसकी वजह से हम मजबूत है। हमारा सांस्कृतिक गौरव अविरल प्रवाहमान है। हमारे संस्कारो की पवित्र नदिया आज भी गतिमान है। लेकिन विभिन्न कालखण्डों में आये क्रांति कारी परिवर्तन ने हमारे कदमो को लड़खड़ा दिया है। डिजिटल क्रांति बहुसंख्यक समाज के लिए वरदान भी बनी है तो कतिपय परिवारों के लिए अभिशाप भी बनी है। विवेक से जिसने इसके सगुण पक्ष को पहचाना है उसके लिए वरदान और जिसने इसे केवल उपभोग और सुविधा भोग से जोड़कर देखा उसके लिए ये अभिशाप बनी है।
गौरतलब है कि आधुनिकता की रोशनी ने निसन्देह हमारे देखने के नजरिये पर अपना नकारात्मक प्रभाव अवश्य छोड़ा है। जिसकी वजह से सांस्कृतिक वैभव फीका पड़ता नजर आरहा है, सामाजिक एकजुटता बिखरी हुई नजर आती है, हृद्ध्य आनन्द से रहित है, आंखों में वो समत्व की चेतना का अभाव है, दिलो में एक दूसरे के लिए तमस है, परिवारों की परिभाषा बहुत लघु गढ़ी जा रही है। परिवारों में आनंद का स्थान अवसाद ले चुका है। पति पत्नी के रिस्तो की पवित्रता का स्थान आपसी तनाव जिसके चलते समाज में तलाक, अवसाद, कोर्ट के मामले दिनप्रतिदिन बढ़ते जा रहे है। आज इसके मूल कारण को समझने की जरूरत है, तथा इसके मूल में जाने की जरूरत है।
इसके मूल में हम जाएंगे तो स्थूल कारण है वो है स्वयं का अहंकार, अभिमान, बुजुर्गों से दूरी बना कर रखना, संवादहीनता, सामूहिक सोच का अभाव, कर्तव्यबोध हीनता, सामूहिक उत्तरदायित्वों के प्रति गैरजिम्मेदाराना रवैया।
आज इस सबके लिए हम एक मूल कारण को जिम्मेदार ठहरा सकते है वो है हमने हमारी धरोहर रूपी बड़े बुज़ुर्गो के दिखाए मार्ग को छोड़ दिया है, उनकी बताई बातों, उनके द्वारा किये गए सद्कार्यों, उनके द्वारा जीया गया आनन्दमय जीवन, उनके द्वारा किये तप,साधना और संयम को आधारहीन, निर्मूल, निरर्थक मानने की भूल कर गए जिसकी वजह से अनचाही हिमालय जैसी दुर्जेय समस्याओं ने हमे घेर लिया व घनीभूत अशांति के आगोश में जीने को मजबूर है।
यदि हमे सुंदर, शान्तिमय कल चाहिए तो जड़ो की ओर लौटना होगा, उनके बताए मार्ग को उसी तरह जीना होगा कुछ आधुनिक डेकोरेशन के साथ सुसज्जित करके। मैं नही कहता की हम पुरातनपंथी बने, लकीर के फकीर बने, जड़वादी बने। मेरा कहने का अभीष्ट निहितार्थ इतना ही है कि हम धरोहर पर समयानुसार रंगरोगन रूपी गैजेट्स को लगाते हुए हमारे मूल स्वरूप को अक्षुण्ण रखते हुए आगे बड़े,परिवारों के विराट स्वरूप को पुनर्स्थापित करे। चारो ओर अशांति की कोलाहल से अपने आपको बचाते हुए अपनी जड़ो को सींचे, जमीन से जुड़े रहे, मानमूल्यो को अपने साथ सतत गतिमान रखे। अध्यात्म को जीवन में व्यावहारिक बनाकर जिये, केवल उसे सिद्धान्तों तक सीमित ना करे। आज धर्म और अध्यात्म के नाम पर मन्दिर जाने वाले भक्तों की संख्या में वृद्धि जरूर हुई है लेकिन धर्म को कर्म में लागू करने वालो की संख्या में आशातीत कमी हुई है, ये चिंता और स्वयं को चिंतन करने की जरूरत है। परिवारों में हो रहे स्खलन को रोकना हम सबकी चुनोती है। इसे लेकर आज कमोबेस अधिकांश परिवार इस बुराई का सामना कर रहे है।
कोरोना जैसी महामारी ने भी हमारे मध्य में अदृश्य सामाजिक दूरी की आग में घी डालने का कार्य किया है। हम इस काम को पहले ही कर चुके थे या करने की ओर कदम थे, लेकिन रही सही कसर कोरोना ने कर दी।
अंततः हमे विचार करना होगा की हमारी धरोहर की चमक धुंधली ना पड़े इसके लिए अपनी सामाजिकता व परिवरनिष्ठा का लिटमस टेस्ट हमे करते रहना होगा विभिन्न पर्व,त्योहार उत्सवों पर परिवार के सामूहिक भोज आदि आयामों के द्वारा। यदि वो जीवित नही है तो अपने माता जी पिताजी की जीवन चर्या की चर्चा होती रहे, उनके जीवन मूल्यों को जीने का हम भी प्रयास करे। और यदि जीवित है तो अपने नवजात, वयःसंधि बच्चो को 24 घण्टे में से कुछ घण्टे उनके साथ समय व्यतीत करने का अभ्यास बनाये।
उनका एक स्पर्श देता है इतनी स्फूर्ति,
जैसे माँ का स्पर्श करता जन्नत की पूर्ति,
जिस घर में है बुजुर्गों का सम्मान,
घर के रथ की है उनके हाथों में कमान,
फ़िर कैसे अधूरे रहेंगे वहां किसी के अरमान,
काश आज के बच्चे खुशी का राज़ समझ पाते,
तो क्यों अंधेरे में अपने वो कदम बढाते।।
सादर प्रकाशनार्थ
पवन कुमार जैन(परबैनी)
जयपुर