गतांक से आगे–
इस प्रकार सम्यकदृष्टि साधक देव, शास्त्र और गुरु के चरणों में सदा समर्पित रहता है। वह किसी प्रकार की ऐसी अज्ञानपूर्ण प्रवृत्तियाँ नहीं करता जिसका कोई अर्थ न हो तथा जिससे कोई धार्मिक या सामाजिक हानि उठानी पड़ती हो। वह एक वैज्ञानिक की तरह तर्क की कसौटी पर कसकर जो कुछ उसके आत्महित में हो, उसे ही धर्म-बुद्धि से स्वीकार करता है। लोक में चली आ रही अर्थहीन रूढ़ियों को वह धार्मिक मूर्खता समझता है। जैन दर्शन में इन्हें मूढ़ता कहा गया है और वह तीन प्रकार की होती है, लोक-मूढ़ता, देव मूढ़ता और गुरु-मूढ़ता।
1. लोक-मूढ़ता- सम्यकदृष्टि साधक दूसरों की देखा-देखी में अन्धश्रद्धा से ऐसा कोई कार्य नहीं करता, जिससे आत्मा की विशुद्धि नहीं होती। “इसमें स्नान करने से जन्म-जन्मान्तरों के पाप नष्ट होते हैं।” इस बुद्धि से वह कभी नदी या सागर में स्नान नहीं करता, क्योंकि ऐसा होता तो सारे जलचर जीवों को स्वतः मुक्त हो जाना चाहिये था। उन्हें तो अब तक पूर्ण निष्पाप हो जाना चाहिए। धर्म बुद्धि से पर्वत पर चढ़ना-गिरना, अग्नि का ढेर लगाकर उस पर कूदना, (अलाव कूदना), पत्थरों और बालू का ढेर लगाकर पूजना तथा पेड़-पौधों की पूजा आदि लोक-मूढ़ता है। सम्यकदृष्टि ऐसे कार्य नहीं करता। वह इन्हें ‘लोक मूढ़ता’ समझता है।
2. देव-मूढ़ता- सम्यकदृष्टि साधक कल्पित, रागी-द्वेषी देवी-देवताओं को ईश्वर मानकर उनसे कोई वरदान नहीं माँगता। दुःख दूर करने के लिए उनकी प्रार्थना नहीं करता तथा धन, वैभव, राज्य, पुत्र आदि की याचना नहीं करता, क्योंकि उसका यह दृढ़ विश्वास रहता है कि संसार में दुःख-सुख अपने-अपने पाप और पुण्य के अनुसार मिलते हैं। कोई भी हमें कुछ दे नहीं सकता और न ही हमारा कुछ छीन सकता है। दूसरे हमें कुछ देते हैं इस प्रकार के विश्वास से कल्पित देवी-देवताओं की पूजा करना ‘देव-मूढ़ता’ है।
3. गुरु-मूढ़ता – सच्चे गुरु की परख हो जाने के कारण वह अन्य वेशधारी परिग्रही, जन-प्रवञ्चक ऐसे गुरु को नहीं मानता जो सत्य, ज्ञान और सदाचार से दूर हैं। लोगों से अपनी पूजा कराते हैं। धन-संग्रह करते हैं तथा आरम्भ परिग्रह से युक्त रहते हैं। झूठे आश्वासन देकर जनता को ठगते हैं एवं मादक पदार्थों का सेवन करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को गुरु मानकर वह उनकी पूजा प्रशंसादि नहीं करता, अपितु पत्थर की नाव की तरह संसार में डुबाने वाला मानकर उनकी उपासना को गुरु मूढ़ता/मूर्खता समझता है।
सम्यकदृष्टि साधक मैं बहुत ज्ञानी हूँ, मेरी बहुत प्रतिष्ठा है, मेरा कुल ऊँचा है, मेरी जाति ऊँची है, मैं अतुल पराक्रम का धनी हूँ, मेरे पास विपुल धन है, मैं महान् तपस्वी हूँ तथा मैं बहुत रूपवान् हूँ इत्यादि रूप से अहंकार नहीं करता। ये मद कहलाते हैं।’ इनके होने पर सम्यक्त्त्व का दम निकल जाता है। सम्यकदृष्टि इन उपलब्धियों को क्षणिक समझकर नाशवान् मानता है और अहंकार को साधना की सबसे बड़ी बाधा मानता है। यह सम्यक् दर्शन का खतरनाक शत्रु है।
सम्यक् दर्शन के अंग
इस प्रकार सच्चे देव, सच्चे शास्त्र और सच्चे गुरु पर. तीन मूढ़ता और आठ मदों से रहित होकर, श्रद्धा करने वाले सम्यकदृष्टि साधक में स्वाभाविक रूप से आठ गुण प्रकट हो जाते हैं, जिससे उसका आचरण निर्मल बन जाता है। इन्हें सम्यक्त्व के अङ्ग भी कहते हैं। जैसे हमारे शरीर के आठ अंग हैं वैसे ही सम्यक्त्व के आठ अङ्ग हैं निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढ़-दृष्टि, उपगूहन, स्थितीकरण, वात्सल्य और प्रभावना। आइए क्रम से इन पर विचार करें-
निःशंकित – शंका का अर्थ होता है सन्देह। सम्यकदृष्टि साधक निःशंक होता है। उसे मोक्षमार्ग पर किसी भी प्रकार की शंका या सन्देह नहीं रहता। रहे भी कैसे? श्रद्धा और शंका भला एक साथ रह कैसे सकते हैं? हम अपने लौकिक जीवन में भी देख सकते हैं, जिसके प्रति हमारे मन में श्रद्धा रहती है, उसके प्रति कोई सन्देह नहीं रहता। सन्देह उत्पन्न होते ही श्रद्धा टूटने लगती है। सम्यकदृष्टि जीव को परमार्थभूत देव, गुरु तथा उनके द्वारा प्रतिपादित सत्य सिद्धान्त सन्मार्ग और वस्तु तत्त्व पर अविचल श्रद्धा रहती है। वह किसी प्रकार के लौकिक प्रलोभनों से विचलित नहीं होता। यह अविचलित श्रद्धा ही निःशंकित अङ्ग या गुण है।
निःकांक्षित– विषय भोगों की इच्छा को आकांक्षा कहते हैं। सम्यकदृष्टि साधक किसी प्रकार की लौकिक व पारलौकिक आकांक्षा नहीं रखता। उसके मन में इन्द्रिय भोगों के प्रति बहुमान नहीं होता। वह बाहरी सुविधाओं को क्षणिक संयोगमात्र मानता है। उसकी यह दृढ़ मान्यता रहती है कि संसार के सारे संयोग कर्मों के आधीन हैं, साथ ही नाशवान् भी हैं। पापोदय आ जाने से एक ही क्षण में धनवान् से निर्धन, रूपवान् से कुरूप, विद्वान् से पागल, राजा से रंक हो सकता है। संसार में किसी का भी सुख शाश्वत नहीं होता। वह संसार के सभी सुखों को विष-मिश्रित मिष्ठान्नवत् अत्यन्त हेय समझता है। यह सब समझकर वह सांसारिक प्रलोभनों से दूर रहता है। यही उसका निःकांक्षित गुण है।
निर्विचिकित्सा – विचिकित्सा का अर्थ ग्लानि या घृणा होता है। सम्यकदृष्टि साधक मानव शरीर की बुरी आकृतियों को देखकर घृणा नहीं करता, अपितु हमेशा उनके गुणों का आदर करता है। उसका विश्वास रहता है कि शरीर तो स्वभाव से ही अपवित्र है। गुणों द्वारा ही इसमें पवित्रता आती है। वह दीन-दुःखी. दरिंद्र, अनाथ और रोगियों के बीमार शरीर को देखकर घृणा नहीं करता, अपितु प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करता है। वह पदार्थ के बाहरी रूप पर दृष्टि न देकर उसके आन्तरिक रूप पर दृष्टि देता है। इस अन्तर्मुखी दृष्टि के कारण वह शरीर के ग्लानिजनक रूप से विमुख हो उसके गुणों में प्रीति रखता है। यही उसका निर्विचिकित्सा गुण है।
अमूढ़ दृष्टि – मूढ़ता ‘मूर्खता’ को कहते हैं। मूर्खतापूर्ण दृष्टि को मूढ़ दृष्टि कहते हैं। सम्यकदृष्टि साधक विवेकी होता है। वह अपने विवेक व बुद्धि से सत्य-असत्य, हेय-उपादेय और हित अहित का निर्णय कर ही उसे अपनाता है। वह अन्धश्रद्धालु नहीं होता। परमार्थ-भूत देव, शास्त्र और गुरु को वह पूर्ण बहुमान देता है। इनके अतिरिक्त अन्य कुमार्गगामियों के वैभव को देखकर प्रभावित नहीं होता, न ही उनकी निन्दा या प्रशंसा करता है, अपितु उनके प्रति राग-द्वेष से ऊपर उठकर माध्यस्थ भाव धारण करता है। यही उसका अमूढ़ दृष्टित्व है।
उपगूहन – सम्यकदृष्टि साधक गुण-ग्राही होता है। सतत अपनी साधना के प्रति जागरूक रहता है। यदि कदाचित् किसी परिस्थिति, अज्ञान या प्रमाद के कारण किसी व्यक्ति से कोई अपराध हो जाये तो वह उसे सबके बीच प्रकट नहीं करता, अपितु एकान्त में समझाकर उसे दूर करने का प्रयास करता है। जैसे-बाजार में अनेक वस्तुएँ रहते हुए भी हमारी दृष्टि वहीं जाती है जिसकी हमें जरूरत है। वैसे ही सम्यकदृष्टि को गुण ही गुण दिखाई पड़ते हैं। अपने अन्दर अनेक गुणों के रहने के बाद भी वह कभी अपनी प्रशंसा नहीं करता, अपितु अपने दोषों को ही बताता है। दूसरों के दोषों की उपेक्षा करके वह उनके गुणों को प्रकट करता है। तात्पर्य यह है कि वह अपने दोषों को सदा देखता रहता है तथा दूसरे के गुणों को। अपने गुणों को छिपाता है तथा दूसरे के दोषों को। अपनी निन्दा करता है तथा दूसरों की प्रशंसा। दूसरे के दोषों तथा अपने गुणों को छुपाने के कारण इस गुण का नाम ‘उपबृंहण’ गुण भी है।
स्थितीकरण – सम्यकदृष्टि साधक कभी किसी को नीचे नहीं गिराता। वह सभी को ऊँचा उठाने की कोशिश करता है। अपने-आपको भी वह हमेशा मोक्षमार्ग में लगाये रखता है। यदि कदाचित् किसी परिस्थितिवश वह उससे स्खलित होता है तो बार-बार अपने को स्थिर करने में तत्पर रहता है। उसी तरह किसी अन्य धर्मात्मा को किसी कारण से अपने मार्ग से स्खलित होते देखकर उसे बहुत पीड़ा होती है। वह येन केन प्रकारेण उसे सहायता देकर उसकी धार्मिक आस्था को दृढ़ करता है। भले ही इसमें उसे कोई कठिनाई उठानी पड़े। यदि कोई व्यक्ति आर्थिक परेशानियों से अपने मार्ग से च्युत हो रहा है तो उसे आर्थिक सहयोग देकर अथवा किसी काम पर लगाकर उसे पुनः वहाँ स्थित करता है. शारीरिक रोग के कारण विचलित हो रहा है तो औषधि देकर, शारीरिक सेवा करके उसे धर्ममार्ग में लगाता है। यदि कुसंगति या मिथ्या उपदेश के कारण वह अपने धर्म मार्ग से स्खलित होता है, तो योग्य उपदेश देकर उसे पुनः स्थित करने का प्रयास करता है। अन्य भी कोई कारण आने पर वह यथासम्भव सेवा/सहयोग देकर उसे स्थिर करता है। यही सम्यकदृष्टि साधक का स्थितीकरण अंग है।
वात्सल्य – वात्सल्य शब्द वत्स से जन्मा है। वत्स का अर्थ होता है बछड़ा। जिस प्रकार गाय अपने बछड़े के प्रति निःस्वार्थ निष्कपट तथा सच्चा प्रेम रखती है, उसमें कोई बनावटीपन नहीं होता, उसे देखकर उसका रोम-रोम पुलकित हो जाता है। उसी प्रकार सम्यकदृष्टि साधक अपने, साधर्मी वन्धुओं के प्रति निश्छल, निःस्वार्थ और सच्चा प्रेम रखता है। उसमें कोई दिखावटी या बनावटीपन नहीं रखता। उन्हें देखकर उसे उतनी ही प्रसन्नता होती है, जितनी कि किसी आत्मीय मित्र से मिलकर होती है। वह उनके साथ अत्यन्त आत्मीयता का व्यवहार करता है। वह अपने प्रेम और वात्सल्य की डोर से पूरे समाज को बाँधे रहता है। सभी लोग उसके प्रेम-पाश में बँधे रहते हैं। वह सबके प्रति सहयोग और सहानुभूति की भावना रखता है। यह उसका वात्सल्य गुण है।
प्रभावना – सम्यकदृष्टि साधक की यह भावना रहती है कि जिस प्रकार हमें सही दिशा दृष्टि मिली है, सत्य धर्म का मार्ग मिला है, उसी प्रकार सभी लोगों का अज्ञानरूपी अन्धकार दूर हो, उन्हें भी सही दिशा मिले, वे भी सत्य धर्म का पालन करें। इस प्रकार की जगत् हितकारी भावना से अनुप्राणित होकर वह सदा अपने आचरण को विशुद्ध बनाये रखता है। उसका आचरण ऐसा बन जाता है कि उसे देखकर लोगों को धर्म में आस्था उत्पन्न होने लगती है। व्यक्ति उसका अनुकरण कर उसके आदर्शों पर चलने लगते हैं। वह परोपकार, ज्ञान, संयम आदि के द्वारा विश्व में अहिंसा के सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार करता है तथा अनेक प्रकार के धार्मिक उत्सव भी करता है, जिसमें हजारों लोग एक स्थान पर एकत्र होकर सद्भावनापूर्वक विश्वक्षेम की भावना भाते हैं, यह सब देखकर लोगों को अहिंसा धर्म की महिमा का भान होता है, यही उसका ‘प्रभावना’ गुण है।
इस प्रकार सम्यक्त्व के निःशंकित आदि आठ गुण कहे गये हैं। इन आठ गुणों का पूरी तरह से पालन करने पर सम्यक् दर्शन रहता है, अन्यथा नहीं। जिस प्रकार किसी विषहारी मन्त्र में यदि एक अक्षर भी कम हो जाता है तो वह मन्त्र प्रभावहीन हो जाता है, उसी प्रकार एक अङ्ग से भी हीन सम्यक्त्त्व हमारे संसार की सन्तति को नहीं मिटा पाता। आठों अङ्ग पूर्ण होने पर ही सम्यक्त्व अपना सही कार्य करता है।
सम्यक्त्व के इन आठ अङ्गों की तुलना हम अपने शरीर के आठ अङ्गों से कर सकते हैं। शरीर के भी आठ अङ्ग होते हैं। दो पैर, दो हाथ, नितम्ब, पीठ, वक्षस्थल और मस्तिष्क। शरीर के इन अङ्गों के प्रति यदि हम थोड़ी बारीकी से विचार करें तो हमें इनमें भी सम्यक्त्त्व की झलक दिखाई देती है। समझने के लिए जब हम चलते हैं तो चलते वक्त एक बार रास्ता देख लेने के बाद बिना किसी सन्देह के अपना दायाँ पैर बढ़ा लेते हैं। दायाँ पैर बढ़ते ही बिना किसी अपेक्षा के बायाँ पैर स्वयं बढ़ जाता है, यही तो निःशंकित और निःकांक्षित गुण का लक्षण है। अतः दायाँ और बायाँ पैर क्रमशः “निःशंकित” और “निःकांक्षित” अङ्ग के प्रतीक हैं। तीसरा अङ्ग है “निर्विचिकित्सा।” विचिकित्सा घृणा या ग्लानि को कहते हैं। इस गुण के आते ही घृणा या ग्लानि समाप्त हो जाती है। हम अपने बाएँ हाथ को देखें, इस हाथ से हम शरीर के मल-मूत्रादिक को साफ करते हैं। उस समय हम किसी प्रकार की घृणा का अनुभव नहीं करते हैं। यह हाथ ‘निर्विचिकित्सा’ अङ्ग का प्रतीक है।
जब हमें किसी बात पर जोर देना होता है, जब हम कोई बात पूर्ण आत्मविश्वास से कहते हैं, तब हम अपना दायाँ हाथ उठाकर बताते हैं तथा अन्य किसी की बात पर ध्यान नहीं देते। यह ‘अमूढ़ दृष्टि’ का प्रतीक है, क्योंकि इस अङ्ग के होने पर वह अपनी श्रद्धा पर अटल रहता है तथा उन्मार्गियों और उन्मार्ग से प्रभावित नहीं होता। शरीर का पाँचवाँ अङ्ग नितम्ब है। इसे सदैव ढाँक कर रखा जाता है। इसे खुला रखने पर लज्जा का अनुभव होता है, यही तो ‘उपगूहन’ है, क्योंकि इसमें अपने गुण और पर के अवगुण को ढाँका जाता है। नितम्ब उपगूहन अङ्ग का प्रतीक है। सम्यक्त्त्व का छठा अङ्ग है ‘स्थितीकरण’। पीठ सीधी हो तभी व्यक्ति दृढ़ता का अनुभव करता है। जब हमें किसी वजनदार वस्तु को उठाना होता है तो उसे अपनी पीठ पर लाद लेते हैं। इससे हमें चलने में सुविधा हो जाती है। पीठ ‘स्थितीकरण’ अङ्ग का प्रतीक है, क्योंकि गिरते हुए को सहारा देना ही तो ‘स्थितीकरण’ है।
हृदय शरीर का सातवाँ अङ्ग है। जब हम आत्मीयता और प्रेम से भर जाते हैं तंब अपने आत्मीय को हृदय से लगा लेते हैं। हृदय वात्सल्य अङ्ग का प्रतीक है। वात्सल्य का अभाव होने पर सम्यक्त्त्व भी निष्प्राण ही सिद्ध होता है। मस्तिष्क शरीर का आठवाँ अङ्ग है। इस अङ्ग से हम सोच-विचार का काम लेते हैं। यह प्रभावना अङ्ग का प्रतीक है, क्योंकि इसके ही आधार पर हम अपने विचारों से दूसरों को प्रभावित करते हैं तथा प्रवचनादि कार्य कर सकते हैं। इस प्रकार इन आठ अङ्गों के पूर्ण होने पर ही हमारा सम्यक्त्त्व सही रह पाता है, अन्यथा वह तो विकलाङ्ग की तरह अक्षम रहता है। यदि हम अपने शरीर के अङ्गों की गतिविधियों की तरह सम्यक्त्त्व के अङ्गों की सार सम्हाल करते रहें तो फिर हमारा सम्यक्त्व स्थिर रहेगा।
क्रमशः–
मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज