श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

जैनधर्म का प्रचार-प्रसार

विश्वपटल पर मुस्लिम, ईसाई और बौद्धों की तुलना में जैनों की संख्या नगण्य है। भारत में भी यह संख्या मात्र 0.4 प्रतिशत है। जैनों का व्यापार-व्यवसाय की दृष्टि से सम्पूर्ण विश्व में आवागमन एवं निवास है। इस दृष्टि से जैनों का अस्तित्व सम्पूर्ण विश्व में दर्ज है, फिर भी जैनधर्म के सम्बन्ध में दुनिया के बहुत कम लोग परिचित हैं। एक शताब्दी पूर्व तक कई लोग इसे बौद्ध धर्म का ही अंश समझते थे, किन्तु याकोबी आदि विदेशी विद्वानों के द्वारा जब आचारांग आदि आगमों का अनुवाद एवं विवेचन प्रस्तुत किया गया तब विश्व में यह स्पष्ट हुआ कि जैनधर्म बौद्धधर्म से भिन्न है तथा इसके प्रवर्तक तीर्थंकर रहे हैं।

जैनधर्म एक व्यवस्थित एवं स्वतन्त्र धर्म है, जिसे पहले निर्ग्रन्थ धर्म के नाम से जाना जाता था। यह वर्तमान में श्वेताम्बर एवं दिगम्बर सम्प्रदायों में विभक्त होकर गतिशील है। श्वेताम्बरों में मूर्तिपूजक, स्थानकवासी एवं तेरापंथ नाम से उपसम्प्रदायें हैं। दिगम्बरों में भी बीसपंथी, तेरहपंथी तथा तारणपंथी उपसम्प्रदाएँ प्राप्त होती हैं। मध्यकाल में पन्द्रहवीं शती तक यापनीय परम्परा भी प्रचलन में रही, किन्तु वह अभी पूर्णतः विलुप्त हो गयी है। जैनधर्म के इन सम्प्रदायों एवं उपसम्प्रदायों के मूल सिद्धान्तों में कोई भेद नहीं है। सभी तीर्थंकर महावीर के उपासक हैं तथा उनकी वाणी को आप्तवचन मानकर अपने मन्तव्यों की विवेचना करते हैं। अहिंसा एवं अपरिग्रह के विवेचन तथा आचार संहिता की कुछ मान्यताओं में उत्पन्न मतभेदों के कारण विभिन्न सम्प्रदाय एवं उपसम्प्रदायों का निर्माण हुआ है। इनके अतिरिक्त श्रीमद्राजचन्द्र एवं कानजीस्वामी के द्वारा कृत व्याख्याओं को लेकर भी नयी विचारधाराएँ प्रकट हुई हैं। इन सबका आधार तो एक ही है और सबको मिलाकर जैनधर्म का स्वरूप बनता है।

आज समस्या यह खड़ी हो गयी है कि ये सम्प्रदायें, उपसम्प्रदायें एवं विचारधाराएँ अपने-अपने विचारों का प्रचार-प्रसार करने में सन्नद्ध हैं। यही नहीं, विभिन्न आचार्य एवं सन्त मुनिराज जैनधर्म के स्थान पर स्वप्रचार करने में लगे हुए हैं। उन्हें जैनधर्म से अधिक चिन्ता अपने व्यक्तित्व के प्रचार-प्रसार की है। जैनधर्म का प्रचार-प्रसार करने पर कम ही ध्यान केन्द्रित है।

अन्य धर्मों में भी सम्प्रदायें एवं उपसम्प्रदाएँ मिलती हैं। कालक्रम से यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, फिर भी व्यक्ति, समाज एवं विश्व के हित को प्रधानता देकर भगवान महावीर के मूल विचारों को समग्र विश्व तक पहुँचाने की महती आवश्यकता है। इसके लिए सभी सम्प्रदायों एवं उपसम्प्रदायों को एकमत होकर जैनधर्म के उन विचारों को समग्र विश्व तक पहुँचाना चाहिए जो निर्विवाद हैं, सबके लिए हितकारी हैं, मानव-जीवन को तनावरहित, अधिक सक्षम एवं सौहार्दपूर्ण जीवन जीने के सूत्र प्रदान करते हैं । जैनधर्म सहअस्तित्व, शान्ति एवं समन्वय के सूत्र प्रस्तुत करता है। यह पर्यावरण-संरक्षण के साथ विश्व की विभिन्न समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है । अतः एतादृक् विचारों का प्रचार-प्रसार अपेक्षित है।

आज अनेक जैन बन्धु भी जैनधर्म के मूल सिद्धान्तों से अपरिचित हैं। वे भी जैनधर्म को जानें और समझें, इसके साथ ही बिना किसी भेदभाव के समस्त मानवजाति के हित की भावना से जैन सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार अपेक्षित है।

उड़ीसा के सम्राट् खारवेल ने तृतीय शती ईसापूर्व में शिलालेखों के माध्यम से जैनधर्म का प्रचार-प्रसार किया था। उनके द्वारा कुमारगिरि पर्वत पर अंकित एक अभिलेख भारतवर्ष के नामकरण में सहायक सिद्ध हुआ है। सम्राट् सम्प्रति, अमोघवर्ष आदि राजाओं ने भी जैनधर्म के प्रचार-प्रसार में योगदान किया। गुजरात के राजा सिद्धराज जयसिंह एवं कुमारपाल ने आचार्य हेमचन्द्र की प्रेरणा से अमारि की घोषणा करायी तथा गुजरात में अहिंसा एवं शाकाहार का सुदृढ़ वातावरण बना। आचार्य हीरविजय ने सम्राट् अकबर को प्रभावित किया तथा अकबर ने पर्युषण पर्व के अवसर पर 18 दिन कत्लखाने बन्द रखने की घोषणा की। श्रीमद्रराजचन्द्र से प्रभावित महात्मा गाँधी के जीवन में अहिंसा एवं सत्य की जीवनशैली का समावेश हुआ। विनोबा भावे भी जैनधर्म से प्रभावित थे। दक्षिण भारत में जैनधर्म पल्लवित – पुष्पित हुआ। भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने अपने उद्बोधन में कहा है कि तमिलनाडु में कभी दो तिहाई लोग जैन धर्मावलम्बी थे, किन्तु आज इनकी संख्या अत्यल्प रह गयी है । प्राचीन एवं मध्यकाल में राज्याश्रय प्राप्त करके ही कोई धर्म प्रचार-प्रसार को प्राप्त होता था । वर्तमान में प्रजातन्त्र है, जिसमें धार्मिक एवं वैचारिक स्वतन्त्रता प्राप्त है। अत: सभी धर्म अपना-अपना प्रचार- प्रसार करने में स्वतन्त्र हैं, किन्तु कोई किसी का बलात् धर्मान्तरण न करे, इसकी कानूनी व्यवस्था की गयी है। विश्व में अधिकांश देशों में प्रजातन्त्र है तथा वैचारिक एवं धार्मिक स्वतन्त्रता का भी वातावरण है। अतः धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार सर्वत्र सम्भव है। किसी का जैन बनना आवश्यक नहीं है, किन्तु जैनधर्म को जानें, समझें तथा उसके सिद्धान्तों का विश्वहित में मूल्यांकन हो, इसकी महती आवश्यकता है।

प्रचार-प्रसार की अनेक विधियाँ हो सकती हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं- 1. प्रामाणिक एवं सर्वोपयोगी साहित्य का देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद 2. विभिन्न भाषाओं में पाठ्य सामग्री की रचना। 3. प्रदर्शनियों का आयोजन 4. विभिन्न धर्मों के साथ तुलनात्मक अध्ययन 5. लघु पुस्तकों के माध्यम से जैनधर्म-दर्शन की प्रस्तुति कर उन पुस्तकों का निःशुल्क एवं अल्पमूल्य में वितरण 6. रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट एवं सार्वजनिक स्थानों पर पुस्तकों की उपलब्धता 7. जैन संग्रहालयों का निर्माण 8. प्रवचनों एवं जैन सिद्धान्तों का टीवी चैनल, यूट्यूब आदि के माध्यम से प्रसारण 9. सार्वजनिक स्थानों पर प्रवचन सभाओं का आयोजन 10. जैनधर्म से सम्बद्ध वैज्ञानिक अनुसंधान एवं उसका प्रकाशन 11. कलाओं के माध्यम से जैनधर्म एवं दर्शन की अभिव्यक्ति 12. दैनिक समाचार-पत्रों एवं सर्वाधिक पठनीय पत्रिकाओं में जैनधर्म-दर्शन सम्बन्धी आलेखों का प्रकाशन 13. जैन सिद्धान्तों की डिजिटल प्रभावी प्रस्तुति 14. विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में जैनधर्म-दर्शन का समुचित सन्निवेश 15. विद्यालयीय पाठ्यक्रमों में जैनधर्म-दर्शन सम्बन्धी सही जानकारी का समुचित समावेश 16. जैनों द्वारा स्थापित विद्यालयों में जैनधर्म-दर्शन का अध्यापन। इस प्रकार की अन्य और भी विधियाँ सम्भव है।

प्रचार के पूर्व विचार एवं आचार का बड़ा महत्त्व है। परिष्कृत विचारों को आचरण में लाने पर प्रचार स्वतः होता है। अध्यात्मयोगी आचार्य श्री हस्तीमलजी म.सा. का कथन है- ” जैनधर्म का प्रचार-प्रसार केवल जैन नाम धराने से नहीं होगा, इसके लिए दो बातें चाहिए – 1. शास्त्रानुसार वीतराग धर्म का प्रचार करना और 2. स्वयं जिनाज्ञा का पालन करना। धर्मक्षेत्र में आचार पक्ष मजबूत होगा तो बिना प्रचार भी स्वतः प्रचार हो जायेगा ।” उपाध्याय यशोविजयजी सारे संसार को जिनशासन रसिक बनाना चाहते थे। उन्होंने कहा- ‘सर्व जीव करूँ शासन रसी’ । उन्होंने जैनधर्म की महिमा को समझा तथा उसे जन-जन तक पहुँचाने का मानस बनाया। महाकवि माघ नैषध महाकाव्य में कहते हैं- ‘अधीतिबोधाचरणप्रचारणै: ‘ पहले अध्ययन हो, फिर उसका अर्थबोध हो, तदनन्तर उसे आचरण में लाकर प्रचार किया जाए। सीधा प्रचार उतना प्रभावी नहीं होता। देश – विदेश की यात्राएँ करते समय जब जैनों ने अपना आहार जमींकन्दरहित शाकाहार अपनाया तो उसका प्रचार हुआ एवं वह ‘जैन फूड’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह आचरण के माध्यम से प्रचार है। इसका प्रभाव अधिक होता है।

प्रचार-प्रसार के विगत दशकों में अनेक उदाहरण मिलते हैं। जैन दिवाकर श्री चौथमलजी महाराज ने सार्वजनिक स्थानों पर सम्पन्न अपने प्रवचनों के माध्यम से विभिन्न जातियों के लोगों तक जैनधर्म का सन्देश पहुँचाया एवं उनमें आस्था उत्पन्न की। श्री समीरमुनिजी ने अभियान चलाकर वीरवाल जैन तैयार किए जो जैन श्रावकाचार से जीवन जीते हैं। मुनि श्री तरुणसागरजी विभिन्न चौराहों एवं सार्वजनिक स्थानों पर प्रवचन देकर हजारों लोगों के मध्य जैनधर्म के सिद्धान्तों को प्रस्तुत करते रहे। उनके प्रवचनों का प्रसारण उनकी आचार मर्यादा में टी.वी. पर भी हुआ । विभिन्न जाति एवं धर्मों के लोगों ने उनके प्रवचनों को रुचिपूर्वक सुना। अभी अधिकतर आचार्य एवं सन्तों के प्रवचन अपने-अपने धर्मस्थानों में होते हैं जहाँ से उनसे सम्बद्ध जैन सम्प्रदायों के स्त्री-पुरुष ही प्रवचन श्रवणार्थ पहुँचते हैं। जो सन्त मुनिराज एवं साध्वियाँ टी.वी. का प्रयोग करते हैं, उनकी बात अन्यों तक भी पहुँचती है, किन्तु वे आचार – नियमों की पवित्रता की अपेक्षा प्रचार बुद्धि को अधिक महत्त्व देने लगते हैं। पुणे एवं मुम्बई के बीच अभय फिरोदियाजी द्वारा एक अभय प्रभावना म्यूजियम बनाया गया है, जो जैनधर्म एवं संस्कृति के प्रचार का कार्य कर रहा है। इसमें जैन- अजैन सभी का प्रवेश अनुमत है। जलगाँव के श्री रतनलालजी बाफना ने महाराष्ट्र के खानदेश में अहिंसा एवं शाकाहार का जन-जन में प्रचार किया एवं अहिंसा तीर्थ की स्थापना की। जैनों के अनेक मन्दिर हैं, किन्तु उनमें जैनों के अतिरिक्त अन्यों का प्रवेश वर्जित होने से अन्य लोग नहीं जुड़ पाते । मन्दिरों में शिक्षण की व्यवस्था हो तो ज्ञान भी प्राप्त हो।

जैनों द्वारा इस देश में हजारों विद्यालय स्थापित हैं, जैनों को अल्पसंख्यक का दर्जा भी प्राप्त है। यदि इन विद्यालयों में नैतिक शिक्षा के रूप में जैन सिद्धान्तों का प्रयोगात्मक शिक्षण प्रारम्भ हो जाए तो जैनधर्म का भारी प्रचार- प्रसार सम्भव है। जैन समाज के कतिपय विद्यालय भी यदि इस कार्य को प्रारम्भ करें तो उनसे प्रेरणा लेकर अन्य विद्यालय भी इस कार्य को आगे बढ़ा सकते हैं। भोपालगढ़ का जैन रत्न विद्यालय पहले इस प्रकार की शिक्षा प्रदान करता था, जिसके पूर्वोत्तीर्ण विद्यार्थी आज भी उस विद्यालय का यशोगान करते हैं। यहाँ अनेक अजैन छात्रों ने भी जैनविद्या प्राप्त की थी।
सम्प्रति जैना (गअखछअ) के माध्यम से अमेरिका सहित अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में 56 जैन चेयर की स्थापना की जा चुकी है, यह भी जैनधर्म-दर्शन के विश्वस्तर पर अध्ययन-अध्यापन एवं प्रचार-प्रसार का एक सशक्त माध्यम है। विडम्बना यह है कि इन जैन चेयरों पर भारत से योग्य विद्वान उपलब्ध नहीं हुए । विदेशी लोग ही इन केन्द्रों पर चयनित हुए हैं। अतः विश्वस्तरीय सुयोग्य युवा विद्वान् तैयार किए जाने की महती आवश्यकता है।

जैन व्यवसायी अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों के माध्यम से भी जैनधर्म का प्रचार-प्रसार कर सकते हैं। अपने प्रतिष्ठानों में जैन आगमों के वचनों को लिखवाकर, प्रार्थना से कार्य का शुभारम्भ कर तथा प्रतिदिन सभी कर्मचारियों को जैन सूक्तियाँ सुनाकर भी इस कार्य को सम्पादित किया जा सकता है। जैनधर्म से सम्बद्ध लघु पुस्तिकाओं का विभिन्न सार्वजनिक सभाओं में वितरण करके भी प्रचार किया जा सकता है।

प्रचार-प्रसार में जैनधर्म के प्रमुख सिद्धान्तों एवं पक्षों यथा- अहिंसा, सत्य, अस्तेय ( ईमानदारी), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, कर्मसिद्धान्त, अनेकान्तवाद, नयवाद, जीवरक्षा, शाकाहार, रात्रिभोजनविरति, संलेखना – संथारापूर्वक समाधिमरण, कषाय-विजय, कलहरहित जीवन, श्रमण जीवन की कठोरता, श्रावक-धर्म आदि की चर्चा जन-जन के मध्य की जा सकती है। इसका प्रचार करते समय किसी अन्य धार्मिक परम्परा के खण्डन या उससे जैनधर्म को श्रेष्ठ बताने की प्रवृत्ति से बचते हुए प्रचार अपेक्षित है।

गृहस्थों के द्वारा प्रचार-प्रसार में आधुनिक संसाधनों का भी उपयोग किया जा सकता है। जैन विचारधारा का सम्यक्बोध सबके लिए हितकारी है, इसी भावना से उसका प्रचार-प्रसार हो । प्रचार-प्रसार की विधियों की जो सूची ऊपर दी गई है, उसमें एक- एक की विवेचना करने का अभी अवकाश नहीं है, सुज्ञजन स्वयं उनका विस्तार कर सकते हैं।

डॉ. धर्मचन्द जैन
एस-1, 28, आयुवानसिंह नगर,
महारानी फार्म, दुर्गापुरा, जयपुर-302018 (राज.)

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