एक बार की बात है एक चोर जंगल में जा रहा था, तो उसे रास्ते में मुनिराज के दर्शन हो गये, वह चोर मन में सोचता है कि ये देवता हैं या पहुँचे हुये संत हैं। जो भयानक, जंगल में निर्द्वन्द होकर बैठे हैं। जरुर कोई सिद्ध पुरुष हैं वह उनके चरणों में बैठा तो उठने का मन नहीं हुआ। तभी महाराज ने अपना ध्यान खोला और चोर को सामने बैठा पाया। चोर बोला-भगवान ! धर्म किसे कहते हैं ? मुनिराज ने कहा-चारित्रं खलु धम्मो । महाराज ने पूछा-आप क्या करते हो? उसने कहा-चोरी। महाराज ने कहा-बस झूठ बोलना छोड़ दो। उसने मुनिराज को नमस्कार किया, महाराज ने धर्म वृद्धिरस्तु का आशीर्वाद दिया। चोर ने झूठ का त्याग कर दिया और वापस घर आ गया । दूसरे दिन वह राजमहल में चोरी करने के लिये गया तो सभी ने उससे पूछा कि भैया आप कौन हैं? वह बोला- मैं चोर हूँ। उसके इस प्रकार बोलने पर किसी को विश्वास नहीं हुआ, कि यह चोर है, क्योंकि कभी चोर अपने मुख से ऐसा नहीं बोल सकता है। और सभी लोगों ने उसे अंदर जाने दिया, वह भी चला गया। चोरी करके सामग्री को पोटली में बाँधकर राजमहल से वापिस भी चला गया किसी ने उससे कुछ नहीं कहा । लेकिन प्रातः होने पर पता चला कि राजमहल में चोरी हो गई। राजा ने सभी सैनिकों को बुलाकर पूछा कि क्या रात्रि में कोई राजमहल में आया था? सभी सैनिकों ने कहा-आया था। तब राजा ने कहा-उस व्यक्ति की खोज की जाये। उसी समय चारों तरफ चोर की खोज करने के लिये सैनिक निकल पड़ते हैं और देखते हैं कि एक जंगल में वही व्यक्ति जो राजमहल में प्रवेश करते समय बोला था कि “मैं चोर हूँ” वृक्ष के नीचे बैठा है। उससे पूछा कि “तुम कौन हो ?” वह बोला-मैं चोर हूँ। पूछा- तुमने राजमहल में चोरी की ? बोला-हाँ । कहा-तुमको राजा ने बुलाया है। और वह सारी सामग्री को लेकर राजमहल में पहुँच गया। राजा ने भी उससे सारी बातें पूछी उसने सारी बातें राजा को बता दी । जिससे राजा का गुस्सा कम हो गया राजा ने पूछा-तुमने चोरी क्यों की ? तो चोर ने सारी परिस्थिति बता दी। फिर राजा ने पूछा कि तुमने चोरी की तो फिर सत्य क्यों बोला ? चोर ने कहा- मुझे जंगल में मुनिराज मिले थे, उनसे मैंने नियम लिया था कि मैं सत्य बोलूँगा, लेकिन चोरी करना नहीं छोड़ सकता पश्चात् राजा ने उसे सत्य बोलने पर बहुत सारा धन देकर सम्मान किया।
चूँकि उसे मुनिराज के वचनों पर श्रद्धा थी, इसीलिये उसे सत्य बोलने का फल मिला। कहने का तात्पर्य है कि सत्य बोलने पर नियम से उपलब्धियाँ होती हैं ।
अन्य संप्रदायों में एक उल्लेख मिलता है कि, जब एक विद्वान ब्राह्मण राजदरबार में राजपुरोहित था। वह रोज राजा को धर्म का उपदेश देता था, एक दिन उसे आवश्यक काम से बाहर जाना पड़ा, तो उसने अपने पुत्र को उपदेश सुनाने की जिम्मेदारी सौंप दी। पुत्र ने उपदेश दिया कि धर्मग्रंथ में कहा है, जो व्यक्ति एक बूँद शराब पीता है, वह मरकर नरकों में जाता है। राजा ने सुना, तो आग बबूला हो गया, क्योंकि यह शराब पीने का आदी था। उसने गुस्से में आज्ञा दे दी, कि इस चालक को ले जाओ, और फाँसी पर चढ़ा दो। इस बात की खबर सारे नगर में वायु की तरह फैल गई। विद्वान के कानों तक भी पहुँची। वह घबराकर भागा-भागा आया, और राजा के चरणों में पड़ते हुए बोला राजन्। मेरे बेटे से कौन सा अपराध हो गया, जो उसे इतनी कठोर सजा दी जा रही है। राजा ने सारी बात बताई । विद्वान ने कहा- राजन् । पुत्र ने ठीक तो कहा है, आपके समझने में गल्ती हो गई।
राजा ने कहा-क्या गल्ती हई ? राजन् शास्त्र में कहा है जो एक बूंद शराब पीता है वह नरक जाता है आप तो बोतल भर शराब पीते हैं आप तो सीधे बैकुंठ जायेंगे । राजा ने ब्राह्मण की बात सुनी तो खुश हो गया और दोनों को सम्मानित किया। विद्वान के मन में पुत्र के जीवन का लोभ तथा नौकरी का लोभ था इसलिये उसने सत्य को ढक दिया। कहने का तात्पर्य है कि हम लोभ में आकर सत्य को ठुकरा देते हैं पर ये उचित नहीं है।
एक बार की बात है एक शिष्य और गुरु विहार करते हुये जा रहे थे आगे-आगे गुरु पीछे-पीछे शिष्य था। चलते-चलते एक घटना घट गई, कि गुरु के पाँव के नीचे मेंढकी दब कर मर गई। शिष्य ने गुरु से सविनय कहा- गुरुदेव !
आपके पैर के नीचे एक मेंढकी दब कर मर गई, अतः आप इसका प्रायश्चित् कर लेना । शिष्य की बात सुनकर गुरु को कुछ धक्का लगा, कुछ-कुछ क्रोध आया, पर दबा कर रखा। पश्चात दोनों विहार करते हुए अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच गये। शाम का समय था, गुरु ध्यान करने बैठ रहे थे, तभी शिष्य ने गुरु को अपराध का स्मरण कराते हुए कहा-गुरुदेव! मेंढकी मर गई थी, प्रायश्चित कर लेना। गुरु अक्कड़बाज थे, वह इस कड़वे सच को झेल न सके और क्रोध में बोले-तेरी यह औकात, क्या तू भूल गया है, कि मैं तेरा गुरु हूँ। तू मेरा शिष्य है, गुरु नहीं। शिष्य तर्कशील था, सुलझे विचारों का था, उसने कहा गुरुदेव मैं मानता हूँ, कि आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ। पर गुरु होने का मतलब यह तो नहीं, कि अब आपको सब कुछ करने का लाइसेंस मिल गया है, आपके सब अपराध माफ हो गये हैं, मैं तो आपको पाप का स्मरण दिला रहा हूँ, आप उसका प्रायश्चित् कर पाप का प्रक्षालन कर लें। इतना सुनते ही गुरु आपे से बाहर हो गये। और गुस्से में डंडा उठा कर शिष्य को मारने के लिये दौड़े तब आगे-आगे शिष्य पीछे-पीछे गुरु । क्योंकि अब गुरु की गुरुता खत्म हो गई थी।
गुरु मारने दौडे, अंधकार तो था ही, एक खंभे से टकरा गये, माथे पर गहरी चोट आई। नस फट गई और वहीं ढेर हो गये। यह है अपनी गल्ती स्वीकार न करने का फल । अतः हम अपनी गल्ति को स्वीकार कर, सत्य पथ को प्राप्त करें ।
एक बार की बात है कि एक श्रावक के पास एक बहेलिया आया और बोला-कि मेरे हाथ में जो चिड़िया है वह मरी है या जिंदा । वह श्रावक सम्यग्दृष्टि, विवेकवान तथा ज्ञानवान था। वह सोचता है यदि मैं जिंदा कहूँगा तो यह हाथ से दबा देगा और उसे मार देगा। और मैं कहूँगा कि यह मरी है तो यह जिंदा दिखा देगा। साथ ही उसका नियम था कि मैं ऐसा सत्य नहीं बोलूंगा कि जिससे किसी का जीवन समाप्त हो जाये। उसे उस शिकारी के हाथ में से थोड़ा सा पंख दिख रहा था हिलता हुआ। और वह बोला कि चिड़िया मरी हुई है। तभी उस शिकारी ने तुरंत हाथ को खोल कर दिखा दिया और कहा कि देखो यह चिड़िया तो जिंदा है और उसे उड़ा देता है। इस प्रकार उस श्रावक ने अपने सत्य वचनों का पालन किया ।