हे अंसुअन की बहती धारा के संरक्षक-
नई पीढ़ियाँ, नई ऊफान की स्वछन्दता से मूल्यवान रूप-लावण्य जीवन को चक्रव्यूह के घेरे में प्री-वेडिंग शूटिंग के उपकरण में समर्पित कर रही है। प्री-वेडिंग, शादी से पहले ही उछल रहा है, उफन भी रहा हैं, शूटिंग, शोर मचा रहा है। अतरंग दृश्यों से एलबम की रचना कर रहा है। दिल-दिमाग—किस्मत को मुस्तैद में रखकर अखियाँ बरस भी रही है, और तरस भी रहीं हैं। यह हैं गोल्डन सम्राटों की अहंकार से, उफनती सपनों की दिव्य दृष्टि |
हे जैन प्रवर्तक अनुयायी-
अपने अंतर्मन से अतरंग में सोचो, आत्मबल की गम्भीरता उभारों और सोचो, शादी से पहले – समाज – संस्था – जाति वर्ग, पति-पत्नि का दर्जा नहीं देता । शादी से पहले लड़का-लड़की एक दूसारे के लिए अजनबी होते हैं। इस रिश्ते में उतार-चढ़ाव भी होना संभव है ।
गोल्डन सम्राटों की झाँकियों का प्रदर्शन- ओछे चटकीले भडकीले फड़कदार–महकदार– कजरावाले – ललाई वाले – विविध रंगोली की धारियाँ धारण कर प्यार के सागर में जीवन का मधुबन, शादियों की मर्यादाओं को, अंतदृष्टि से बदल रहा है। जहाँ न परम्परा है, न समाज, न तप की महिमा, न पवित्र रिश्तों की गरिमा, अमर्यादित गतिविधियों का प्लेटफार्म है। पवित्र जीवन में अपवित्रता का घोल है।
हे सत्यनिष्ठा के धनी-
शादियों के पहिले लड़कियाँ अपने अंश के मिठास को खो देती हैं, लड़का अपने वंश के मिठास को खो देता है । अंश की आत्मा, वंश की प्रतिभा को दूर की लपटों की तरह खौफनाक तूफान के हवाले कर देता है। कुदरत कह रही है
कर्म से – इस प्री-वेडिंग शूटिंग के आरक्षण अवधि में लड़की ने अंश और लड़के वंश की प्रतिभा को झंडारोहण कर दिया, मौत का फन फूँकार मारती हुई दुर्घटना वश लड़के को कफन के चादर में लिपटा कर शमशान में सुला देती है मौत न किसी की इन्तजार करती है, न ही मुहुर्त देखती है, न ही मौका, ऐसे- दुर्बल समय में अंश-वंश लड़की के उत्सव मनते रहेंगे अन्यथा अश्रुअन की धारा बहती रहेगी।हे
तत्त्व ज्ञानी संयमी साधक-
इस जीवन के सागर में अब वो नैयन नहीं जो शर्माते थे, न ही वे होट रहे जो परिवार को देखकर मुस्कराते थे। अब न वह देह रही जो प्रणाम भाव से खिलखिला कर झुक जाया करती थी। अब तो चंचल मन उड़ान भरता है, और देह को भगाता है। जब जिन्दगी अपराध बोध से गुजरती है, अपने ही सुखों को अपनी ही तिजौरी में बन्द कर देती है, एवं जमीं माता के सीने में नश्तर चुभा देती है। हर सुबह की रोमांचित तथा सायंकाल का सुनहरी खुशनुमा मौसम को गार्त में डाल देती है, तो आशाओं का सूरज कैसे उगेगा, वटवृक्ष परिवार की नैतिकता की खुशबू कैसे कायम रह सकती है। संस्कृति बतला रही है कि शास्त्र सम्मत विधियों व सामाजिक रीति रिवाजों एवं विवाह संस्कार के माध्यम से दो भिन्न परिवेशों के वर-वधु परस्पर साहचर्य भाव से एक सूत्र में बद्ध जुगल ही शादी का गढबन्धन है ।
हे धर्म प्रेरणायक-
एक दूसरे के पूरक होते है, पुरूष और स्त्री । विवाह की आधारशिला धर्म और कत्तर्व्य पर रखी गई संस्कारित है। लेकिन आधुनिक रफतार का शारीरिक रोमांचित-मन की— चंचलता, आँखों की चपलता, इच्छाओं की सरपटचाल से प्रभावित होकर खोजी ने सामाजिक रीति रिवाजों की अनदेखी कर शादियों की खुशबू को छीन लिया, प्री-वेडिंग शूटिंग तथा लव मैरिज की खोज निकाल ली। ऊफान से खोजी या नहीं सोच पाया कि चंचल मन तथा विचारों के पंख ईर्ष्या के द्वारा खोल देता है, कुदरत के कानून एवं कर्म के फल बहुत कड़वे होते है ।
हे जागृति पथ के रचयिता-
इस ताण्डव खेल से अनैतिक शादियाँ के अंतरंग दृश्यों का एलबम खोलकर जन समुदाय – समाज – कुटुम्ब अथवा घर के पुत्र एवं पुत्रियों के सामने परोसा जाता है, तब हवा इतनी खसौट मारती है कि आवाज मुखड़े से बन्द कर उड़ा ले जाती है, आँखे तरस रही है और बरस कर एक दूसरे को संकेत से समझाती है, ये अंतरग दृश्य, जीवन के मधुबन को काँटों की माला ने अपराध बोध की खाई में पटक दिया। वाह रे – अतुल्य मूल्यवान जीवन को महकते गुलशन को संस्कृति के माध्यम से, शास्त्र – नीति एवं सामाजिक रीति-रिवाजों से शादियों को ही अतरंग में आलंगन करें वरन लव मैरिज एवं चक्रव्यूह को घेरा जीवन में विष घोलते ही रहेंगे, ये अश्रुअन को तरसा भी रहें हैं और बरसा भी रहें हैं ।
छगन लाल जैन
रि. अध्यापक हरसाना वाले
3 / 308, शालीमार, अलवर