श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

गहराई को छूने पर सम्यक् सत्य की प्राप्ति

एक बार की बात है कि मेरी (विद्यार्थी अरविन्द की) स्कूल अवस्था में किसी छात्र से लड़ाई हो गई, और लड़ाई का कारण, किसी छात्र ने मुझे (अरविन्द) गाली दे दी, उसी लड़ाई के बीच में पंडित जी आ गये। पंडित जी ने आते ही पूछा क्या हो गया ? हमने (अरविन्द) कहा इसने मुझको गाली दी है। पंडित जी बोले ठीक है, इसने तुमको गाली दी है, तुम उस गाली को मुझे दे दो, बताओ कहाँ है वह ? अब हम सोचने लगे कि, अरे। मैं कहाँ से दूँ मेरे पास तो नहीं है अतः गाली कोई वस्तु तो है नहीं, कि मैं उसे दे सकूँ। पंडित जी ने कहा हाँ हाँ, देखो जेब वगैरह में रखी होगी या हाथ में रखी होगी या किसी कमरे में या किसी बैग या बर्तन वगैरह में रखी होगी तो लाओ हमको दिखाओ। अब हम (अरविन्द) सोचने लगे क्या करें गाली कोई देने की वस्तु तो है नहीं कि मैं दे सकूँ। हमने (अरविन्द जी) कहा कि मैं आपको दे नहीं सकता हूँ। पंडित जी ने कहा-क्यों ? तुमने तो ली है, तो तुम दो। और जो लेता नहीं है वो दे भी नहीं सकता। जब घर में कोई व्यक्ति आता है और जब जाने लगता है, तो वह पैसे देता है, तो आप पैसे अपनी माँ तथा पिता को दे देते हो। और जब वह सामने वाला व्यक्ति पैसा देता है लेकिन आप नहीं लेते हैं तो आप अपने माता-पिता को कुछ भी नहीं दे पाते क्योंकि आपने लिया नहीं है। अतः सत्य यह है कि, हमने लिया नहीं तो देंगे क्या? हम समझ गए । अतः हम सत्य की गहराई को छुएँ तो हमें सम्यक् सत्य प्राप्ति होती है ।

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सत्य की सदैव विजय

पंडित गोपालदास जी वरैया के विषय में आता है कि, वे जिस दुकान पर मुनीमी करते थे, उस दुकान पर कुछ दूसरे मुनीम भी काम करते थे उनमें से एक मुनीम ने उन्हें बदनाम करने का प्रयास किया और वह १ रुपया ले के चला गया । अब शाम को जब पंडितजी ने हिसाब किया, तो देखा कि हिसाब में १ रु. कम हो गया। उन्होंने पुनः पूरा हिसाब मिलाया, कि मेरी गिनती करने में गलती हो सकती है, लेकिन २-३ बार हिसाब मिलाया, फिर भी १ रु. का अंतर पड़ा, अब पंडित जी परेशान क्या करें ? क्योंकि पूरा पैसा उन्हीं के हाथ में दिया गया था और उन्होंने अपनी जेब से १ रु. मिलाकर तथा हिसाब की किताब में सारी बात को लिखकर मालिक के खजाने में जमा कर दिया । तथा दूसरे दिन १ रु. कम होने वाली बात को स्पष्ट कर दिया तथा कहा, कि जिसने भी ऐसा किया है उनको मैंने भीख में दिया। उसके पास १ रु. कम था मैंने उसके १ रुपये की पूर्ति की है। इतना सुनते ही वहाँ उपस्थित मुनीम (जिसने पैसा चुराया था) झुंझला गया कि, क्या मैं भिखारी हूँ जो तुम ऐसा कह रहे हो। पंडित जी ने कहा भिखारी हो तभी तो तुमने ऐसा किया है अगर तुम्हारे पास १ रु. कम न होता तो तुम ऐसा नहीं करते और उसने तुरंत १ रु. निकाल कर मालिक के खाते में जमा कर दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि सत्य की सदैव विजय होती है। झूठ को सदैव अपनानित होना पड़ता है ।

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