श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

सत्य उठता एवं उठाता

एक बार की बात है कि एक जंगल में एक शेर विचरण कर रहा था। उसने झटके से जैसे ही नीचे छलांग लगाई कि नीचे कांटों का झाड़ था और उसका पैर उस काँटे के झाड़ पर पड़ गया जिससे उसके पैर में काँटा चुभगया, खून निकल आया, पैर खून से लथपथ हो गया। उसी जंगल में एक लकड़हारा लकड़ी काट रहा था, उसने जैसे ही शेर को देखा तो अपनी जान बचाने के लिये तुरंत ही एक वृक्ष पर चढ़ गया, वह शेर भी उस व्यक्ति के चेहरे की तरफ लगातार देखता रहता है। वह शेर सोचता है कि, यह कोई भला आदमी है और वह शेर धीरे-धीरे लँगड़ाता हुआ उस वृक्ष के समीप पहुँच गया और लकड़हारा धीरे-धीरे घबराहट को शांत करता हुआ, वह मध्य की स्थिति में आ गया तभी उसकी दृष्टि शेर के पैर पर पहुँच गयी, तभी दोनों एक-दूसरे की आँखों को देखते हैं, तो उस व्यक्ति को शेर की दृष्टि में दुख दिखाई दिया तथा शेर को भी उस व्यक्ति की दृष्टि में करुणा, दया दिखाई दी । अब वह व्यक्ति वृक्ष से नीचे उतरा और उसके पैर से काँटा निकाल दिया, वेदना के दूर होते ही वह शेर उस व्यक्ति से बोला, कि तुमने मेरा उपकार किया है. वेदना दूर की है अब मैं तुम्हारे उपकार का बदला उपकार से चकाऊँगा, भूलूँगा नहीं, तुम मुझे सेवा का अवसर दो, जिससे मैं तुम्हारे ऋण से मुक्त हो सकूँ । लकड़हारे ने कहा- मैं जंगल से लकड़ी काटकर बाजार में बेचने जाता हूँ। शेर ने कहा- मैं तुम्हारा वजन घर तक ले जाऊँगा । प्रारम्भ में वह शेर के ऊपर कम वजन रखता था, लेकिन धीरे-धीरे वजन अधिक लादना शुरु कर दिया। जिससे वह सेठ बन गया, उसके पड़ौसी ने देखा कि अरे ! यह तो सेठ बन गया है। क्योंकि वह लकड़हारा सुबह अंधकार में जंगल जाता और सन्ध्या में अंधेरा होने पर घर वापिस आता। एक दिन उसके पड़ौसी ने पूछा-अभी तक तो तुम इतने गरीब थे लेकिन अब इतने बड़े सेठ हो गये हो, क्या बात है ? इस प्रकार दोनों पड़ौसी चर्चा कर रहे थे पास में ही शेर बँधा था, जो उन दोनों की चर्चा सुन रहा था। वह लकड़हारा बोला-भैया, एक सियार हाथ लग गया है। इतना सुनते ही शेर की आँखों से आँसू बहने लगे, और दूसरे दिन जैसे ही वह शेर को लेकर जंगल गया, शेर ने उससे कहा कि भैया, मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ । लकड़हारा बोला- क्या बात है? शेर बोला कि तुम्हारे पास जो पैनी कुल्हाड़ी है, इस कुल्हाड़ी को मेरे गले पर चला दो, और अगर नहीं चलाओगे तो मैं तुमको खा जाऊँगा। लकड़हारा बोला कि यह तुम क्या कह रहे हो? शेर बोला-हाँ, मैं ठीक कह रहा हूँ यह भी शर्त है, कि कुल्हाड़ी को धीरे नहीं, पूरी ताकत से चलाना होगी। लकड़हारा पूछता है-आखिर क्यों ? शेर बोला-पहले कुल्हाड़ी गर्दन पर चलाओ। लकड़हारा सोचता है कि अब मैं क्या करूँ ? एक तरफ जीवन है दूसरी तरफ इसको खत्म करना है “जान बची तो लाखों पाये” और उसने पूरी ताकत से उसकी गर्दन पर कुल्हाड़ी चला दी जिससे खून के फुब्बारे निकलने लगते हैं। शेर बोला कि तुमने अपने पड़ौसी से कहा था, कि मेरे हाथ सियार लग गया। ये तुम्हारे शब्द इस पैनी कुल्हाड़ी से भी अधिक घाव पैदा कर रहे हैं तभी दोनों ने एक-दूसरे को देखा और दोनों की आँखों से आँसू निकलने लगे, अब लकड़हारे के मन में पुनः पूर्व की अपेक्षा दुख उत्पन्न हुआ और दया तथा करुणा उद्भूत हो गई।

पर अब क्या हो सकता था। अतः हमें शब्दों का प्रयोग बहुत सोच-समझकर करना चाहिए, जो भी हो, सत्य बोलना चाहिए, क्योंकि सत्य उठता और उठाता है ।

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