श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

सूख गये आँसू शादियों की नई नई किस्मों से

हे जागृति पथ के अनुयायी –
उठो, जागो, आगे बढो, जैन संस्कार-संस्कृति के लिए, जैन जातीय वर्ग के लिए, शोर मचा दो गूंज के साथ और याद करो उन आत्माओं तथा महा पुरुषों को जिन्होंने जैन धर्म एवं जैन जाति के लिए आहुति दी। आधुनिक युग में प्रेमी- प्रेमियों के रंगीन पंख, चंचल मन, फड़फड़ाता यौवन , तड़फड़ाता आँचल आनन्द के सागर में शादियाँ फिसलकर बेहोशी की नदी में गोते लगाते हुए अन्तर्जातीय के द्वार पहुँच रही हैं। परिवार भी अन्तर्जातीय शादियों में सम्मिलित होकर खुशी के पंखों में जान भर रहा है। ऐसा सोच ही नहीं पाता ऐसे प्रेमी प्रेमियों को शादियों में मौत का मंजर खड़ा मिलता है। परिवार जीवन दर्पण में लुब्धमन एवं मुग्धमन के चश्मे से देखता है जो धन सम्पदा एवं विषय विकारों को अमृत धारा मानता है।

हे जैन धर्म के आत्मज –
स्वतन्त्रता के बीज से स्वच्छन्दता के पौधे बनते हैं ये भयंकर तथा भयाभय होते हैं जो आसुरी भाव पैदा कर शादी की परीक्षा लेता है। थोड़ा सा कुसंग की खिलखिलाहट अति चंचलता एवं वाचालता से सघन वृक्ष के नीचे शपथ ले रहे हैं। ये भयाभय आसुरी भाव तीखी तलवार है, जो गर्दन पर सीधा वार करती है। थोड़ा सा कुसंग सारे-शरीर को राख में बदल देता है। चाहे अन्तर्जातीय शादियाँ हो, चाहे प्री- वेडिंग सूटिंग हो। सूटिंग का अर्थ प्यार की लटपट और आँखों की नटखट, । पंखों की उड़ान के पीछे मक्खन लगाने वाले के हाथ में चाकू होता है । आनन्द के सागर में पाप की छाँया छिपी रहती है।

हे जैन जगत के रखवाले –
मालुम होना चाहिए वक्त बड़ा अजीब है, खुद दिखता नहीं – दिखा सब कुछ‌ जाता है। नई नई किस्मों की शादियाँ तूफानों का दौर बढ़ाती है। जब इंसान का अभिमान आसमान को छूने लगता है तब हवा हँसती हैं। स्वच्छता एवं स्वतन्त्रता वाला गुब्वारा एक दम आकाश में उड़ेगा, अन्त में फट कर पृथ्वी पर ही आता है। तभी तो नौक पर धागा बांधा जाता है। मन, वाचालों के पंख से हवा भर फूल कर उड़ान भर रहा है।

हे आचार-विचारों के संरक्षक –
छोटे कपड़े, छोटी सोच, न होश परन्तु बढ़ रहा है शरीर का जोश। यह जोश शरीर की गुफाओं से जब उछलता है तब विकृत विचारों की उत्पति पैदा होकर अन्तर्जातीय एवं प्री-वेडिंग शूटिंग में प्रवेश कर जाती है। जो जिन्दगी भर नौच नौच कर काँटों की तरह चुभती रहती हैं। जिन्दगी बेहोशी की नदी में बह जाती है। घर के दरवाजे की छवि कई पीढ़ियों को रुला देती है।

हे जिनेन्द्र भक्त –
इन्हें न ही जैन संस्कारों का दीपक रोशनी देता है, न ही जीने की-कला आती है।जिज्ञासा का दीपक भी बुझ जाता है। आत्मा में आँसुओं की जो विपुल शक्ति है वह भी शर्म से सूख जाती है। आज का पाप भविष्य के दुःख का आरक्षण है।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जीवन में अन्धेरा करते हैं,
कुछ लोग ऐसे जन्मते हैं जो स्वजातीय में तोप लगाया करते है।
स्वजातीय के लड़के घूम रहें, मिट्टी की लड़‌की बना रहे,
अन्तर्जातीय का लड़‌का घर आयेगा माँस मदिरा की थैली लायेगा।
वह तो जंवाई कहलायेगा क्या घर का दरवाजा हँस पायेगा,
नवाँसा नवाँसी पूछ रहे हम किस जाति के कहलायेगे,

माँ कोख के गीत गा रही, पिता आत्मजा के गीत गा रहा।
कुछ ऐसे होते हैं जो पराई जाति के गीत गाते हैं ,
कुछ में से कुछ ऐसे होते हैं जो धर्म में मिट जाया करते हैं।
संस्कार-संस्कृति- स्वजातीय के भी सूख गये आँसू,
शादियों की नई नई किस्मों से सूख गये आँसू।

छगन लाल जैन,
रि. अध्यापक हरसाना वाले,
3/308 शालीमार, अलवर

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