श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

मोक्ष आत्मा की परम अवस्था

मोक्ष का स्वरूप

सात तत्त्वों में मोक्ष अन्तिम तत्त्व है। जीव का परम लक्ष्य मोक्ष ही है। सभी आत्मवादी भारतीय दर्शनों ने इसे स्वीकारा है। इसके बावजूद उसके स्वरूप और साधनों के सम्बन्ध में उन सबके अपने-अपने मत हैं। इस अध्याय में हम जैन दर्शन-मान्य मोक्ष के स्वरूप और साधनों के साथ-साथ अन्य दर्शनों में उल्लिखित / वर्णित मोक्ष के सम्बन्ध में भी संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

बन्धन से मुक्ति को मोक्ष कहते हैं। ‘मोक्ष’ का अर्थ है ‘मुक्त होना’। संसारी आत्मा कमों के बन्धन से युक्त होता है। अतः आत्मा और कर्म-बन्ध का अलग-अलग हो जाना ही मोक्ष है। ‘मोक्ष’ शब्द संस्कृत के ‘मोक्ष-आसने’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है ‘छूटना’ या ‘नष्ट होना’। अतः समस्त कर्मों का जीवात्मा से आत्यन्तिक रूप से पृथक् होना, समूल उच्छेद होना मोक्ष है। “आत्यन्तिक क्षय” का अर्थ है जहाँ पुरातन कर्मों का पूर्ण रूप से नाश हुआ हो और नये कर्मों के आगमन की कोई सम्भावना न हो। संवर द्वारा नवीन कर्मों का आगमन रोकने तथा निरन्तर चलने वाली निर्जरा द्वारा पूर्वबद्ध कर्मों के नाश से, यह स्थिति उत्पन्न होती है। इसी को परिलक्षित करते हुए आचार्यश्री ‘उमास्वामी’ ने मोक्ष का लक्षण करते हुए कहा है- “बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्त्रकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ” अर्थात् बन्ध के हेतुओं के अभाव और निर्जरा द्वारा समस्त कर्मों का आत्मा से अलग होना या उनका आत्यन्तिक क्षय होना ही मोक्ष है।

हमारी साधना का प्रमुख उद्देश्य मोक्ष ही है। इसीलिए जैन दर्शन में मुक्त जीवों को ‘सिद्ध’ कहा गया है, क्योंकि उन्होंने अपने समस्त कर्मों का क्षय करके अपने साध्य को सिद्ध कर लिया है। कर्मों के बन्धन के कारण ही जीवात्मा दुःखी होता है। कर्मों के नष्ट हो जाने पर वह शुद्ध बुद्ध निरंजन हो जाता है। उसमें आत्मिक गुणों का चरम विकास हो जाता है और उसकी अनेक अव्यक्त आत्मिक शक्तियाँ पूरे तेज के साथ व्यक्त हो जाती हैं। बन्धन मुक्त पश्क्षियों के स्वतन्त्र आह्लाद की तरह उन्मुक्त आनन्द एवं अनुपम सुख का अनुभव करता है। आनन्द भी कैसा चिरन्तन, शाश्वत, कभी नष्ट न होने वाला।

मोक्ष का अर्थ आत्मा का अभाव नहीं

बौद्ध दार्शनिक ‘मोक्ष’ का अर्थ’ आत्मा का अभाव’ मानते हैं। उनका मानना है कि जैसे ज्योति के बुझने से ज्योति का अभाव हो जाता है, वैसे ही कर्मों का क्षय हो जाने से, चित्त-सन्तति का विनाश हो जाता है। यही निर्वाण है। अतः मोक्ष में आत्मा का अस्तित्व नहीं होता है।’

जैन-दर्शन की यह मान्यता है कि सत् का कभी विनाश नहीं होता तथा असत् की कभी उत्पत्ति नहीं होती। बौद्धों के उपर्युक्त मत की मीमांसा करते हुए आचार्य ‘समन्तभद्र’ महाराज ने कहा है कि दीपक के बुझ जाने से ज्योति का अभाव नहीं होता, अपितु उसके प्रकाश-रूप परमाणु ही अन्धकार रूप परिणत हो जाते हैं।’ उसी प्रकार मोक्ष का अर्थ भी आत्मा का विनाश नहीं होता, कर्मों का क्षय होते ही जीवात्मा अपनी स्वाभाविक अवस्था में परिणत हो जाती है।

वस्तुतः जीव अपने रागद्वेषादिक वैभाविक भावों के कारण ही संसारी होकर दुःखी होता है। आत्मा का राग-द्वेष आदि भावों से मुक्त होना ही मुक्ति है।’ आचार्य कमलशील’ ने संसार और मोक्ष के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “रागादि-क्लेश और वासनामय चित्त को संसार कहते हैं। चित्त का रागादि क्लेश और वासनामय संसार से मुक्त हो जाना ही मुक्ति है। अतः मुक्ति का अर्थ जीव का अभाव न होकर रागादि-क्लेशों से मुक्ति है।” रोग की निवृत्ति होने का अर्थ आरोग्य का लाभ है; न कि रोगी की निवृत्ति। अतः मुक्ति का अर्थ जीव का अभाव किसी भी अर्थ में नहीं हो सकता। जैन दर्शन में आत्मा की स्वाभाविक अवस्था की उपलब्धि को ही मुक्ति कहा गया है। वस्तुतः समस्त कर्मों के क्षय से होने वाला आत्म-लाभ ही मुक्ति है। कहा भी है-
आत्मलाभं विदुर्मोक्षं जीवस्यान्तर्मल-क्षयात्।
नाभावं नाप्यचैतन्यं न चैतन्यमनर्थकम् ।।

मुक्ति के बाद ऊर्ध्वगमन में हेतु

कर्म-मुक्त होते ही जीव का शरीर कपूर की तरह उड़ जाता है तथा जीवात्मा अपनी स्वाभाविक ऊर्ध्वगति के कारण लोक के शिखर पर विराजमान हो जाता है। कर्मों का क्षय और जीव का लोकान्त गमन दोनों साथ-साथ होते हैं। जीव के ऊर्ध्वगति में आचार्य ‘उमास्वामी’ ने चार हेतु दिये हैं

“पूर्वप्रयोगादसंगत्वाद्वन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च।
आविद्ध कुलालचक्र वद्व्यपगतलेपालाम्बुवदेरण्ड-बीजवत् अग्नि-शिखावच्च।

1. पूर्व प्रयोग से (कुम्हार के चाक की तरह) जैसे कुम्हार के द्वारा घुमाया हुआ चाक, डण्डे के अभाव में अपने पूर्व संस्कारवश घूमता रहता है, वैसे ही जीवात्मा द्वारा चेतना के ऊर्ध्वारोहण के लिए किये गये ध्यानादि पुरुषार्थजान्य (प्रयोगजन्य) संस्कारवश जीवात्मा ऊध्वंगमन करता है। अतः पूर्व संस्कार भी जीव के ऊर्ध्वगमन में एक कारण है।

2. असंग होने से मिट्टी से लित तुम्बी, मिट्टी के भार के कारण, पानी में डूबी रहती है और जब वह मिट्टी पानी में गलकर घुल जाती है, तब तुम्बी ऊपर उठ जाती है। वैसे ही कर्म-लेप से लिप्त जीवात्मा संसार में डूबा रहता है; कर्मों के भार से मुक्त होते ही ऊर्ध्वगति कर लेता है। अतः ‘असंगत्व’ ऊर्ध्वगति का दूसरा हेतु है।

3. बन्धन टूटने से जिस प्रकार एरण्ड का फल जब पककर फटता है तो उसका बीज नीचे की ओर न गिरकर, उचटकर, सीधे, ऊपर को ओर जाता है. उसी प्रकार कर्म बन्ध के टूटने से मुक्तात्मा भी सीधे ऊपर की ओर जाते हैं. ये तिर्यक् या नीचे की ओर नहीं जाते।

4. वैसा स्वभाव होने से जैसे निर्वात अग्नि की शिखा ऊपर की ओर हो उठती है, उसी प्रकार कर्मरहित जीवात्मा भी स्वभाव से हो ऊर्ध्वगमन करता है। कर्मरूपी वायु से प्रताड़ित होते रहने के कारण ही वह इधर-उधर भटकता है। तात्पर्य यह है कि जब तक कर्म जीव की स्वाभाविक शक्ति को विकारी बनाये रखता है, तब तक वह पूर्ण रूप से ऊर्ध्वगमन नहीं कर पाता। स्वाभाविक शति को विकृत करने वाले कमों के नष्ट हो जाने पर, जीवात्मा ऊर्ध्वगमन कर लोक के शिखर पर तिलक की तरह विराजमान हो जाता है। गति में हेतुभूत धर्म द्रव्य के अभाव के कारण उससे आगे जीव की गति नहीं होती।’

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