श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

पुरानी नींव – नया निर्माण

(वर्तमान चुनौतियों का समाधान-स्व के विचार से)
विकास समयानुसार होना चाहिए लेकिन नया नूतन चिर पुरातन को साथ लेकर अर्थात नींव पुरानी हो निर्माण नया हो जो युगानुकूल तो हो साथ में परिवारानुकूल हो, जीवनमूल्याधारित हो और जिसकी नींव पर परिवार अखंड और अक्षुण्ण रहे। जंहा विरासत का सम्मान आश्रय के साथ हो।
लेकिन पिछले ढाई दशक में मोबाइल आधारित जीवन मे हमे अपनो की आत्मीयता और सामाजिक ताने बाने को तोड़ने का काम किया है।

हमे अपने स्व को पहचानना होगा। भाषा, भोजन, भेष,भजन, भूमि और भवन हमारी संस्कृति के आधार पर हो न कि विदेशी आयातित हो।

आज चारो ओर इस भीड़ में एक ही कोलाहल सुनाई देता है कि, बच्चे, वयस्क व प्रौढ़ मोबाइल के बिना ना भोजन करते है,ना शौचस्नानादि क्रिया करते है।
अर्थात मोबाइल का नशा इस कदर सिर चढ़कर बोल रहा है कि एक पल भी कैसे मोबाइल से दूर हो जाये। बल्कि नैसर्गिक जीवन से निसृत आनन्द भी ओझल होने लगा है। रक्त रिश्तों में एक अदृश्य, अनुभूत दूरी होने लगी है।
आज प्रत्येक माता पिता के माथे पर चिंता की लकीरें देखी जासकती है, कि बच्चों को कैसे दूर करे मोबाइल की दुनिया से। लेकिन समाधान की ओर किसी भी दृष्टि नही जारही है। सब अभिभावक किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में है।
कारण स्पष्ट है कि माता पिता के पास ऐसा आचरण नही है कि उनका बालक उनका आचरण कर सके। उपदेश देने से बदलाव नही आता है। स्वयं के आचरण से बदलाव आता हैं, क्योकि बच्चाअनुकरण अनुगामी होता है।
मैदानों से बच्चो का बचपन अनभिज्ञ बन रहा है। मैदानों का स्थान मोबाइल गेम व अनगिनत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने लेलिया है।
मोबाइल ने हमारी शैशव और युवा पीढ़ी को मैदान से दूर कर दिया है। मैदान सुने पड़े है। जिस उम्र में मैदान में होना चाहिए उस मे बालक मोबाइल की दुनिया मे फंसा हुआ है।
भुगतानाधारित क्लबो में भीड़ है। जो खेल, योग हमे विरासत से निःशुल्क प्राप्त हुए, उसके लिए हमे कमाई का एक हिस्सा क्लबो में अपव्यय करना पड़ रहा है। बावजूद इसके भी हमारा बच्चा नैसर्गिक विकास से वंचित है।
ना उसमें समन्वय का बीज वपन हो रहा है, ना उसमें मित्रता का, ना उनमें सामाजिक सद्भाव जागृत और ना अपने धर्म के मर्म को समझ पा रहा है और न मूल्याधारित जीवन से परिचय हो रहा है।

आखिर कहा जा कर रुकेगी ये डिजिटल पीढ़ी?

हमारे द्वारा प्रदत्त सुविधाओ के मकड़जाल ने बच्चों के सोचने समझने की शक्ति को कुंद करदिया है। कुतर्कशक्ति का विकाश हो रहा है। तर्क की कसौटी समाप्त हो रही है,
युवाओं अधीरता, असंयम, संवेदनशून्यता और निर्दयता की परिधि पांव पसार रही है।

जिसकी वजह से अल्पायु में बालक हिंसक व्यवहार कर रहे है, अनैतिक कृत्यों जैसी घटनाओं की बाढ़ आगयी है, आत्मबल दुर्बल हो रहा, असम्मान का भाव पनप रहा है, धूम्रपान का चलन तेजी से पांव पसार रहा है। अधीरतापूर्ण और असंयमित जीवन चर्या बनती जा रही है।

आज माता पिता का साहस कमजोर पड़ रहा है कि वो अपने बच्चे को कुछ कह सके। उन्हें भय सताता है कि कैसे अपने बच्चे को सही रास्ते पर चलने के लिए कहे। क्योकि वो ही बच्चा अपने माता पिता को समझाने लगता है कुतर्क,आक्रोशित व हिंसक आचरण से।
कर्ममय जीवन रचे हम,
विश्व का कल्याण हो।
चिर पुरातन राष्ट्र का,
फिर नया निर्माण हो।।

धर्म, कर्तव्यकर्म और परिवार मेल मिलाप से परहेज करती युवा पीढ़ी। अंर्तजातीय विवाहों का बढ़ता चलन, टूटते वैवाहिक रिश्ते, रिश्तों में कम होती स्निग्धता ,
बड़े होने पर सहोदर भाई बहिनों के आपसी विवाद इन सबके मूल में मोबाइल से बढ़ती विकृति ने आग में घी डालने का काम किया है।
आज चिंता का विषय ये भी है घरों में सभी सदस्यो द्वारा मोबाइल पर अधिक समय निवेश किया जा रहा है।

“परिवारों में मंगल संवाद का अभाव की वजह से युवाओं का व्यवहार माता पिता के प्रति गैरजिम्मेदाराना देखा जाता है।”

समय निकाल कर बच्चों के साथ रहकर मोबाइल फ्री जॉन बनाये।
मैदान मे जाकर खेल खेले।
मोबाइल उपवास का चलन घर मे प्रारम्भ हो।
घर के मुखिया को अपना आचरण से संदेश देने का प्रयास करना होगा। उपदेश देने से बात नही बनेगी।
घर की महिलाओं को अपने बच्चों को प्रत्यक्ष स्पर्शाधारित वात्सल्य भाव को जगाना होगा।
सप्ताह में एक दिन सभी सदस्य साथ बैठकर किसी विषय पर मंगलसँवाद करे।
कुटुंब प्रबोधन का भाव रखकर परिवार के सभी सदस्यों के साथ आत्मीय रिश्ते बनाए।
सादर।

पवन कुमार जैन , परवेणी जयपुर

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