श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

आत्मा की शुद्धि और उसके विकास के क्रम : जैन धर्म में 14 गुणस्थान

गुणस्थान क्या है?

जैन दर्शन में गुण स्थान, उन चौदह चरणों के लिए प्रयोग किया गया हैं जिनसे जीव आध्यात्मिक विकास के दौरान धीरे-धीरे गुजरता है, इससे पहले कि वह मोक्ष प्राप्त करें। जैन दर्शन के अनुसार, यह पुद्गल कर्मों पर आश्रित होने से लेकर उनसे पूर्णता पृथक होने तक आत्मा की भाव दशा हैं। यह आत्मा की प्रकृति – ज्ञान, विश्वास और आचरण है।
दर्शनमोहनीय आदि कर्मों की उदय, उपशम आदि अवस्था के होने पर जीव के जो परिणाम होते हैं, उन परिणामों को गुणस्थान कहते हैं। ये गुणस्थान मोह और योग के निमित्त से होते हैं। इन परिणामों से सहित जीव गुणस्थान वाले कहलाते हैं।
गुणस्थान 14 आध्यात्मिक स्तरों का समूह है, जो आत्मा की शुद्धि और उसके विकास के क्रम को दर्शाते हैं। यह आत्मा की मोहनीयता (delusion), कर्मबंध (karma bondage), और सम्यकता ( purity) के आधार पर आत्मा की स्थिति का वर्णन करता है। प्रत्येक गुणस्थान आत्मा की अशुद्धियों के क्षय और उसके आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है।

गुणस्थान के 14 स्तर

1. मिथ्यात्व गुणस्थान (Delusion Stage)

यह आत्मा की सबसे निम्न स्थिति है। मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से होने वाले तत्त्वार्थ के अश्रद्धान को मिथ्यात्व गुणस्थान कहते हैं। इन गुणस्थान वाले मिथ्यादृष्टि जीव को सच्चा धर्म अच्छा नहीं लगता है। आत्मा अज्ञान ( मिथ्यात्व) और भ्रम में फंसी रहती है। सही और गलत के बीच भेद नहीं कर पाती । व्यक्ति भौतिक सुखों और संसार में ही आनंद की खोज करता है। धर्म की ओर झुकाव नहीं होता। उदाहरण: ऐसा व्यक्ति जो अधर्म, हिंसा, और अहंकार में लिप्त हो ।

2. सासादन गुणस्थान (Downfall Stage)

उपशम सम्यक्त्व के अन्तर्मुहूर्त काल में जब कम से कम एक समय या अधिक से अधिक छह आवली प्रमाण काल शेष रहे, उतने काल में अनंतानुबंधी क्रोधादि चार कषाय में से किसी एक का उदय आ जाने से सम्यक्त्व की विराधना हो जाने पर सासादन गुणस्थान होता है। इसमें जीव सम्यक्त्व से तो गिर गया है किन्तु मिथ्यात्व में अभी नहीं पहुँचा है। आत्मा अज्ञान से निकलकर सत्य के प्रति झुकाव महसूस करती है, लेकिन यह स्थायी नहीं होता । यह स्थिति अस्थायी होती है और आत्मा पुनः मिथ्यात्व में गिर सकती है। सही मार्ग के प्रति थोड़ी जागरूकता उत्पन्न होती है। उदाहरण: व्यक्ति क्षणिक रूप से धर्म का अनुभव करता है, लेकिन फिर मोह और सांसारिकता में उलझ जाता है।

3. मिश्रित मिथ्यात्व गुणस्थान (Mixed Delusion and Right Faith)

सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से केवल सम्यक्त्वरूप परिणाम न होकर जो मिश्ररूप परिणाम होता है उसे मिश्र गुणस्थान कहते हैं। आत्मा में मिथ्यात्व और सम्यकत्व (सत्यता) का मिश्रण रहता है। व्यक्ति सत्य को पहचानने लगता है, लेकिन अभी भी भ्रम से मुक्त नहीं होता। सही मार्ग के प्रति प्रयास शुरू होता है। उदाहरण: व्यक्ति धर्म के बारे में सुनता और सोचता है, लेकिन उसे पूर्ण रूप से नहीं अपनाता ।

4. अविरत सम्यकदृष्टि गुणस्थान (Right Faith with Lack of Restraint)

दर्शनमोहनीय और अनंतानुबंधी कषाय के उपशम आदि के होने पर जीव को जो तत्त्वार्थ श्रद्धानरूप परिणाम होता है वह सम्यक्त्व है। सम्यक्त्व के तीन भेद हैं- उपशम सम्यक्त्व, क्षायिक सम्यक्त्व और वेदक या क्षायोपशमिक सम्यक्त्व। दर्शनमोहनीय की तीन और अनंतानुबंधी की चार ऐसी सात प्रकृतियों के उपशम से उपशम और क्षय से क्षायिक सम्यक्त्व होता है तथा सम्यक्त्व प्रकृति के उदय से वेदक सम्यक्त्व होता है। इस गुणस्थान वाला जीव जिनेन्द्र कथित प्रवचन का श्रद्धान करता है तथा इन्द्रियों के विषय आदि से विरत नहीं हुआ है, इसलिए अविरत सम्यग्दृष्टि कहलाता है।
आत्मा सम्यक दृष्टि (सत्य धर्म का ज्ञान) प्राप्त कर लेती है। धर्म के प्रति विश्वास पक्का हो जाता है, लेकिन संयम का अभाव रहता है। व्यक्ति हिंसा, झूठ, और सांसारिक कार्यों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता। उदाहरण: धर्म में आस्था रखने वाला व्यक्ति जो अपने व्यवहार में संयम का पालन नहीं करता।

5. देशविरत गुणस्थान (Partial Restraint)

सम्यग्दृष्टि अणुव्रत आदि एकदेश व्रतरूप परिणाम को देशविरत – गुणस्थान कहते हैं। देशव्रती जीव के प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से महाव्रतरूप पूर्ण संयम नहीं होता है। आत्मा आंशिक संयम का पालन करती है। यह स्थिति आत्मा के सुधार का प्रारंभिक चरण है। व्यक्ति कुछ पापों और अशुद्धियों को त्याग देता है, लेकिन पूर्ण रूप से नहीं। उदाहरण: गृहस्थ जो अहिंसा और सत्य का पालन करता है, लेकिन पूरी तपस्या नहीं करता।

6. प्रमत्त संवर गुणस्थान (Restraint with Negligence)

प्रत्याख्यानावरण कषाय के क्षयोपशम से सकल संयमरूप मुनिव्रत तो हो चुके हैं किन्तु संज्वलन कषाय और नोकषाय के उदय से संयम में मल उत्पन्न करने वाला प्रमाद भी होता है। अत: इस गुणस्थान को प्रमत्तविरत कहते हैं। आत्मा संयम का पालन करने लगती है, लेकिन अभी भी प्रमाद रहता है। व्यक्ति ध्यान और तप करता है, लेकिन उसमें पूर्ण सावधानी नहीं होती । उदाहरण: संयमशील साधु, जो ध्यान और तप करता है, लेकिन कभी-कभी असावधान हो जाता है।

7. अप्रमत संवर गुणस्थान (Restraint without Negligence )

संज्वलन कषाय और नोकषाय का मंद उदय होने से संयमी मुनि के प्रमाद रहित संयमभाव होता है । तब यह अप्रमत्तविरत गुणस्थान होता है। आत्मा संयम और साधना में पूर्ण सावधानी बरतने लगती है। प्रमाद (लापरवाही) पूरी तरह समाप्त हो जाती है। व्यक्ति धर्म के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाता है। जो सतत ध्यान और तपस्या में लीन रहता है। उदाहरण: वह साधु जो सतत ध्यान और तपस्या में लीन रहता है।

8. निर्जरा गुणस्थान (Stage of Partial Destruction of Karmas)

जिस समय भावों की विशुद्धि से उत्तरोत्तर अपूर्व परिणाम होते जायें अर्थात् भिन्न समयवर्ती मुनि के परिणाम विसदृश ही हों, एक समयवर्ती जीवों के परिणाम सदृश भी हों, विसदृश भी हों, उसको अपूर्वकरण कहते हैं। आत्मा अपने कर्मों का क्षय करना शुरू कर देती है। गहन तपस्या और ध्यान के माध्यम से कर्मों का प्रभाव कम होता है। आत्मा का शुद्धिकरण तेज गति से होता है। उदाहरण: आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ने वाला साधु ।

9. अनिवृत्ति-करण गुणस्थान (Advanced Stage of Destruction of Karmas)

जिस गुणस्थान में एक समयवर्ती नाना जीवों के परिणाम सदृश ही हों और भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणाम विसदृश ही हों, उसको अनिवृत्तिकरण कहते हैं । अधःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण, इन तीनों करणों के परिणाम प्रति समय अनन्तगुणी विशुद्धि लिए हुए होते हैं। आत्मा गहन ध्यान और तपस्या में संलग्न होती है। कर्मों का क्षय तेजी से होता है। आत्मा शुद्धि की उच्चतम अवस्था की ओर बढ़ती है। उदाहरण: तपस्वी जो केवल मोक्ष के लिए साधना करता है।

10. सूक्ष्म संपराय गुणस्थान (Stage of Subtle Passions)

अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था को प्राप्त लोभ कषाय के उदय को अनुभव करते हुए जीव के सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान होता है। आत्मा केवल सूक्ष्म मोहनीय कर्मों से ग्रसित रहती है। यह स्थिति अत्यधिक शुद्ध और मोक्ष के निकट है। उदाहरण: ऐसा साधु जो सांसारिक मोह से लगभग मुक्त हो चुका हो।

11. उपशांत मोह गुणस्थान (Suppression of Passions)

सम्पूर्ण मोहनीय कर्म के उपशम होने से अत्यन्त निर्मल यथाख्यातचारित्र को धारण करने वाले मुनि के उपशांतमोह गुणस्थान होता है। इस गुणस्थान का काल समाप्त होने पर जीव मोहनीय का उदय आ जाने से नीचे के गुणस्थानों आ जाता है। आत्मा सभी मोहनीय कर्मों को शांत कर देती है, लेकिन उनका क्षय नहीं होता। यह स्थिति अस्थायी होती है। आत्मा क्षणिक रूप से मोक्ष के करीब पहुंचती है। उदाहरण: अस्थायी रूप से मोह से मुक्त साधक ।

12. क्षीण मोह गुणस्थान (Destruction of Passions)

मोहनीय कर्म के सर्वथा क्षय हो जाने से स्फटिक के निर्मल पात्र में रखे जल के सदृश निर्मल परिणाम वाले निग्रंथ मुनि क्षीणकषाय नामक गुणस्थान वाले होते हैं। आत्मा सभी मोहनीय कर्मों का पूर्ण रूप से क्षय कर देती है। यह स्थायी स्थिति है। आत्मा शुद्धता के उच्चतम स्तर पर होती है। उदाहरण: वह आत्मा जिसने मोह का पूर्ण त्याग कर दिया हो।

13. सयोगी केवलि गुणस्थान (Omniscience with Physical Activity)

घातिया कर्म की 47, अघातिया कर्मों की 16 इस तरह 63 प्रकृतियों के सर्वथा नाश हो जाने से केवलज्ञान प्रगट हो जाता है। उस समय अनन्त चतुष्टय और नवकेवल लब्धि प्रगट हो जाती है किन्तु योग पाया जाता है, इसलिए वे अरिहंत परमात्मा सयोग केवली जिन कहलाते हैं। आत्मा केवलज्ञान (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त कर लेती है। आत्मा अपने सभी कर्मों से लगभग मुक्त हो चुकी होती है। हालांकि, आत्मा अभी भी शरीर से जुड़ी रहती है। उदाहरण: भगवान महावीर की स्थिति केवलज्ञान के बाद।

14. अयोगी केवलि गुणस्थान (Omniscience without Physical Activity)

सम्पूर्ण योगों से रहित, केवली भगवान अघाति कर्मों का अभाव कर मुक्त होने के सम्मुख हुये अयोगकेवली जिन कहलाते हैं। इस गुणस्थान में अरिहंत भगवान् शेष 85 प्रकृतियों को नष्ट करके सर्व कर्मरहित सिद्ध हो जाते हैं और एक समय में लोक के शिखर पर पहुँच जाते हैं। यह मोक्ष की अंतिम अवस्था है। आत्मा शरीर और कर्मों के बंधन से पूरी तरह मुक्त हो जाती है। आत्मा शुद्ध, अनंत और स्वतंत्र हो जाती है। उदाहरण: वह आत्मा जो सिद्धालय में निवास करती है।

जैन धर्म में 14 गुणस्थान आत्मा की शुद्धि की यात्रा का विवरण देते हैं। यह आत्मा को अशुद्धि ( मिथ्यात्व) से पूर्ण शुद्धि (मोक्ष) तक ले जाने की प्रक्रिया है। गुणस्थान आत्मा के विकास का एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक मार्ग है, जो प्रत्येक व्यक्ति को आत्मबोध और आध्यात्मिक उत्थान के लिए प्रेरित करता है।

एम.पी. जैन
सेवा सेवानिवृत्ति निदेशक सांख्यिकी
64, सूर्यनगर, तारों की कूंट, टोंक रोड, जयपुर

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