श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

क्या “श्वेतांबर पल्लीवाल” “पल्लीवाल जैन समाज” से अलग हैं?

“श्वेतांबर पल्लीवाल जैन संदेश” में जनवरी 2025 अंक में इसके सह संपादक श्री गोपाल लाल जैन का संपादकीय ” श्वेतांबर जैन समाज के ऐतिहासिक तथ्यों के संकलन का प्रयास” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है. इसमें आपने युवाओं को समाज और धर्म की गतिविधियों से जोड़ने का आह्वान किया है, जो कि उचित और महत्वपूर्ण है. लेकिन जिस अंदाज में लिखा है वह विचारणीय है. वे लिखते हैं-

“एक और बात की आवश्यकता है, वह है श्वेताम्बर पल्लीवाल जैन समाज के ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन एवं प्रकाशन की।

आज श्वेताम्बर पल्लीवाल समाज की पहचान बनाने वाली एक पीढ़ी (90 साल से ऊपर) लगभग समाप्त हो गई है, दूसरी पीढ़ी (60 से 90 साल) का समापन प्रारम्भ हो चुका है, तीसरी पीढ़ी (35 से 60 साल) सामाजिक-धार्मिक कार्यों को बखूबी संभाल रही है और चौथी पीढ़ी (15 से 35 साल तक) को सामाजिक कडी में लाने की आवश्यकता है।

इस हेतु एक प्रकाशन हो जिसमें हमारी सामाजिक स्थिति जिसमें मुख्य रूप से जगरौटी, काठैर, मेवात क्षेत्र के गांव-शहरों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, हमारी पूर्व विरासत के गाँव व गोठों का परिचय, सामाजिक-धार्मिक कार्य व रीति-रिवाजों की जानकारी, सामाजिक-धार्मिक चेतना से जुडे व्यक्तियों के व्यक्तित्व-कृतित्व का परिचय, परिवारों का विवरण व आर्थिक स्थिति की ओर आमुखीकरण प्रमुख हो।

समाजहित में कार्य करने वाले व्यक्तियों का फोटो युक्त विवरण संकलित कर समाज की चारों पीढ़ियों का विवरण महासंघ के मुख पत्र में प्रकाशन कर उन्हें पल्लीवाल महासंघ से जोडने का प्रयास किया जा सकता है। श्वेताम्बर पल्लीवाल समाज की विभिन्न संस्थाओं जैसे- श्वेताम्बर मंदिर, स्थानक, श्वेताम्बर राजयश गौशाला, श्वेताम्बर तीर्थ सिरस, पल्लीवाल धर्मशाला श्रीमहावीरजी, जैन श्वेताम्बर पल्लीवाल महासंघ व श्वेताम्बर पल्लीवाल संदेश पत्रिका आदि में किये गये कार्य व सहयोग को संकलन कर प्रकाशित करने से न केवल तथ्यों का संकलन होगा बल्कि परिवारों का जुडाव महासंघ से बढेगा तथा महासंघ की योजनाओं के संचालन में सहयोग प्राप्त होगा।”

इसे पढ़ कर ऐसा लगता है कि “श्वेतांबर पल्लीवाल” “पल्लीवाल जैन समाज” से अलग हैं. यदि ऐसा नहीं है तो संपूर्ण पल्लीवाल के लिए लिखा जाना चाहिए. कोई भी श्वेतांबर पल्लीवाल यह दावा नहीं कर सकता है कि उसका एक भी रिश्तेदार दिगंबर नहीं है. इसीप्रकार कोई दिगंबर पल्लीवाल भी यह दावा नहीं कर सकता है कि उसके सभी रिश्तेदार दिगंबर ही हैं. पल्लीवाल समाज रिश्तों में इतना गुथा हुआ है कि इस प्रकार का विभाजन अनुचित और अनुपयोगी है. आज सभी जैन जातियाँ एक होने की बात कर रही हैं और हम आपस में ही विभाजित हो रहे हैं. यह बहुत शर्म की बात है. एक ही परिवार में एक सदस्य श्वेतांबर हो सकता है, दूसरा दिगंबर और तीसरा नास्तिक. फिर भी घर तो एक ही रहता है. समाज और इसकी एकता एक बात है और अमुक धर्म मानना दूसरी बात है. धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है. आम्नायों के आधार पर समाज का विभाजन बहुत अनुचित है. जो ऐसा कर रहे हैं या करना चाहते हैं उन्हें पुनर्विचार करना चाहिए. हम सबों को मिलकर समाज उपयोगी बड़े बड़े भवनों के निर्माण करवाना चाहिए. जहाँ जहाँ पल्लीवालों की संख्या है वहाँ तो अवश्य होने ही चाहिए. पल्लीवाल प्रारंभ में दिगंबर थे या श्वेतांबर, यह बहस तो चलती रहेगी, समाज की एकता विखंडित नहीं होनी चाहिए. समाज में समरसता बनी रहनी चाहिए. समाज के युवा शाकाहारी बने रहें, इसका प्रयास करना चाहिए

डॉ अनिल कुमार जैन, जयपुर

This Post Has 2 Comments

  1. V. K..Jain.IRS retd

    I am in total agreement with your views. Jain population officially is 40 lacs but unofficially it may be 1 crore. Possibily correct figures may come in coming cencus. I request all Jains to get their religion correctly in coming cencus.

  2. Rajendra Prasad w

    “श्वेतांबर पल्लीवाल जैन संदेश” में जनवरी 2025 अंक में इसके सह संपादक श्री गोपाल लाल जैन के संपादकीय ” श्वेतांबर जैन समाज के ऐतिहासिक तथ्यों के संकलन का प्रयास” शीर्षक से प्रकाशित लेख के विषय में डॉ अनिल कुमार जैन ने बिल्कुल यथार्थ बात लिखी है कि
    पल्लीवाल समाज रिश्तों में इतना गुथा हुआ है कि इस प्रकार का विभाजन अनुचित और अनुपयोगी है. आज सभी जैन जातियाँ एक होने की बात कर रही हैं और हम आपस में ही विभाजित हो रहे हैं. यह बहुत शर्म की बात है. एक ही परिवार में एक सदस्य श्वेतांबर हो सकता है, दूसरा दिगंबर और तीसरा नास्तिक. फिर भी घर तो एक ही रहता है. समाज और इसकी एकता एक बात है और अमुक धर्म मानना दूसरी बात है. धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है. आम्नायों के आधार पर समाज का विभाजन बहुत अनुचित है. जो ऐसा कर रहे हैं या करना चाहते हैं उन्हें पुनर्विचार करना चाहिए.
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