श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

भगवान श्री पार्श्वनाथ के 10 भव*

भगवान पार्श्वनाथ के २९००वें जन्म कल्याणक एवं २८००वें निर्वाण कल्याणक के अवसर पर विशेष लेख श्रंखला

1-मरुभूति

        पोतनपुर नगर में अरविन्द राजा की रतिसुंदरी आदि रानियां थी। मतिसागर आदि मंत्री थे।विश्वभूति पुरोहित था।विश्वभूति के मन में श्रद्धा उत्पन्न हुई कि श्री जिनेश्वर के वचन ही सारभूत है, अन्य सब निस्सार है। किसी पूर्व भव के पुण्य के उदय से संभूतमुनिश्री की सेवा से उसे सम्यक्तत्व प्राप्त हुआ था। पुरोहित की पत्नी का नाम अनुद्दरा था। उसके उदर से कमठ और मरुभूति नामक दो पुत्रों का जन्म हुआ।*

यथा समय कमठ का वरुणा के साथ और मरुभूति का बसुन्धरा के साथ पाणिग्रहण कराया गया।*

*विश्वभूति किसी समय संसार को असार अनुभव करके, विरक्त होकर,सद्गुरु के निकट अनशन करके एवं पंचपरमेष्ठी के स्मरण में लीन छोके काल धर्म को प्राप्त हुआ और सौधर्मेन्द्र स्वर्गलोक में देव के रूप में उत्पन्न हुआ।अनुद्दरा भी विशिष्ट आराधना करती हुई और आदर सहित पंचपरमेष्ठी नमस्कार मन्त्र का स्मरण करती हुई काल धर्म को प्राप्त हुई।*

*कमठ और मरुभूति का मन अत्यंत दुःखित हुआ। तब हरिश्चंद्र मुनि ने उन्हें उपदेश दियाचाहे कोई देव हो या असुर, मृत्यु अनिवार्य है। तीनों लोकों में ऐसा कोई प्राणी नहीं जो मृत्यु के वशीभूत न हो। अनन्त अनन्त बार तुम स्वयं मौत के ग्रास बन चुके हो।फिर इतना अधिक खेद क्यों करते हो।मुक्तात्माओ के अतिरिक्त तीनों लोकों में कोन ऐसा जीव है जिसकी मृत्यु न हुई होन हो रही होअथवा न होगी। धर्मरूपी औषध के सिवाय मृत्यु से बचने का अन्य कोई उपाय नहीं है।*

*गुरु महाराज को धारण कर ,शोक का परित्याग करके कमठ और मरुभूति धर्म में उद्यत हुए।*

*संसार की असारता निरुपम सुनकर मरुभूति को वैराग्य उत्पन्न होगया। उसने विचार किया, कब यह शुभ दिन होगा की मै सर्व विरति को ग्रहण करूँगा।गृहवास से विरक्त वह महात्मा कालयापन कर रहा था वह अपनी पत्नी की और भी देखता नहीं था।*

*उधर कमठ दिनोदिन भवाभिनंदिपन के कारण   पवित्र आचरण की अवहेलना करने लगा। निरंतर विषय वासना में डूबा रहता।परस्त्री का सेवन करता।जुआ खेलता।और पापी मित्रो के साथ इच्छानुसार भटकता रहता।*

*मरुभूति की पत्नी बसुन्धरा दुर्धर योवन से सुशोभित थी।उसके पाँव कछुए जैसे उन्नत और कोमल थे।उसकी दोनों जंघायें अति कोमल भलीभांति मिली हुई,रोम रहित और हाथी की सूंड जैसे स्थूल थी।उसके नख किरणों से स्फुरायमान  और कांतियूक्त थे। उसके हस्त कमल केसर के समान थे। उसकी कमर पतली थी।उसका मुख चंद्र सदृश था नेत्र केतकी के पत्र समान लम्बे थे मस्तक अतिशय चिकने और कोमल केशो से व्याप्त था  परन्तु पति उसकी और आंख उठाकर भी नहीं देखता था,अतएव वह अपना जीवन निष्फ़ल मानती थी।*

*बसुन्धरा किसी समय गृहस्थी का काम काज कर रही थी।उस समय मन में प्रज्ज्वलित कामाग्नि वाले तथा समस्त दोष रूपी तपस्वी के मठ के समान कमठ में उसे देखकर कहाहे सुन्दर अंगों वाली ..तू कृष्ण पक्ष के चंद्रबिम्ब की भांति दिनोदिन क्षीण होती हुई क्यों दिखाई दे रही है।*

*बसुन्धरा ने देखायह तो मेरे जेठ है।और वह लज्जित होकर भागती हुयी सोचने लगीजो पहले कभी सुना नहीं,जो लोकाचार के विरुद्ध है,धर्म से व्राह्य और विकार युक्त है ऐसा वचन जेठ क्यों कह रहे है। भय के आवेश से उसका शरीर कांप रहा था। उसने एक हाथ से बन्धन से छूटे हुए केशपाश को पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से खिसकें हुए नाड़े वाले घाघरे को ऊँचा कर रही थी।इस अवस्था में भगते हुए बसुन्धरा को निकट आकर कमठ ने पकड़ लिया। कहा प्रिये , व्याकुल को त्याग दे,मूढ़ता को दूर कर दे,चंचलता छोड़ दे,केशपाश को बाँध ले,नाड़े की गांठ मजबूत कर ले। जब मैं तुम्हारा प्रियतम हूं तो कौन दुसरा पुरुष तुम्हारा अनिष्ट कर सकता है। यह कहकर उसने स्वयं प्राणनाथ की तरह उसका केशपाश बाँध दिया।वेग से चलने के कारण उड़ते हुए उसके वस्त्र केश विराम को प्राप्त हुए। ततपश्चात कमठ बसुन्धरा का आलिंगन करने लगा।*

*तब बसुन्धरा बोलीआप मेरे श्वसुर के समान है,क्या आपको ऐसा कार्य करना योग्य है।*

*कमठ ने कहासुन्दरांगी, हे मुग्धेपुष्प के सदृश अपने योवन को सफल करो।*

*इस प्रकार उसने बसुन्धरा का चित्त अपने अधीन कर लिया क्योकि कामदेव दुर्जय है और स्त्रिजनो में दीर्घदर्शित नहीं होती। साथ ही योवन अवस्था का अस्खलित प्रसार होने से ऐसा ही भवितव्यता होने से तथा पति के प्रति मन में उद्वेग होने से,भविष्य में होने वाले पति के प्रति महान बैर को बाँध कर वह कमठ उसके साथ रमण करने लगा।*

*वरुणा ने यह सब देखकर मरुभूति को कह दिया। मरुभूति को विश्वास न हुआ। उसने सोचा पितां के समान कमठ ऐसा नहीं कर सकता। इस दुष्कृत्य की चर्चा ज़बी बस्ती में होने लग़ी तो वरुणा ने पुनः मरुभूति से कहा।खातिरी कंरने के लिए मरुभूति ने कमठ से कहा आज मैं दूसरे गांव जा रहा हूँ इतना कहा कर वह तुरन्त गाँव से बाहर निकल गया । थोड़ी दूर जाकर रात्रि में कापड़िया का वेश धारण करके ,जांघ और परत पर पाटा बाँध कर हाथ में छोटा सा कलश धर्न करके अपने घर में आ गया।उसने सोने का बहाना कर लिया।*

*पत्नी के साथ कमठ का दुष्कर्म देख  क्रोध उत्पन्न हुआ।उसने राजा अरविन्द से फ़रियाद की।राजा ने भी क्रोधित होकर अपने सेवको को आज्ञा दी कि ब्राह्मण कुल को कलंकित करने वाले कमठ को, कटे कान वाले गधे पर बिठला कर ,खराब ढोल को बजवा कर एवं अकार्य की घोषणा सुनने के लिये एकत्र हुए लोगो के धिक्कार शब्द के द्वारा मन को छेदन करके फ़ौरन नगर से बाहर निकाल दो।*

*राजाज्ञा का पालन किया गया । कमठ को क्रोध तो बहुत आया ,परन्तु मरुभूति का कोई अनिष्ट वह कर नहीं सकता था। वह जंगल में जाकर ज्वलन शर्मा नामक कुलपति के निकट तापस बन गया।*

*एक दिन मरुभूति के मन में आया अरे रे, मुझ मूढ़ ने बड़ा अनर्थ कर डाला। बड़े भाई की विडंबना करवाकर उसे नगर से बाहर निकलवा दिया।परन्तु अब पछताने से क्या लाभ। मैं आश्रम में जाऊ और कमठ से क्षमायाचना करके,उसे प्रसन्न करके घर ले आजाउँ।*

*यही हुआ।कमठ के पैरों में पड़ कर अश्रुपूर्ण नेत्रों  से मरुभूति खमाने लगा।उस समय कमठ ने क्रोध में आकर ,एक बड़ी भारी शिला उठाकर उसके मस्तक पर पटक दी।मरुभूति के मुख से रुधिर का प्रवाह बहने लगा। तापसो ने कमठ को भगा दिया और मरुभूति के ऊपर जल का छिड़काव किया । महान वेदना के कारण  सम्यक्तत्व मग्न हो गया।अतः अरिहंत भगवान और पंच नमस्कार मन्त्र को विस्मरण करके कर्म के अचिन्त्य सामर्थ तथा आर्तध्यान के कारण तिर्यंचायु के बन्ध को  निकाचित्त करके…… दूसरे भव में मरुभूति का जीव दंडकारण्य में हथिनी के गर्भ में उत्पन्न हुआ।*
क्रमश:

पारस मल जैन
जोधपुर

This Post Has One Comment

  1. राजेन्द्र प्रसाद जैन, अध्यक्ष जयपुर शाखा

    पार्श्वनाथ भगवान की जय हो

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