श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

खेल एकता का

महासभा में एकता हो यह हर महा सभाई की दिल्ली तमन्ना है। यूँ भी महासभा में एकता पर हमेशा ही बड़ा जोर दिया जाता रहा है। दो-तीन महीनों में एकाध बयान एकाध बड़े नेता का आ ही जाता है जिसमें एकता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा जाता है कि हम सब एक हैं और हमें कोई तोड़ नहीं सकता। ऐसे बयान सुनकर मुझे प्रायः पूछने का मन किया करता है कि आप सब इतने ही जबर्दस्त तरीके से एक हो, तो ऐसे बयनों की आवश्यकता क्या हैं? पर में पूछता ही नहीं वे ऐसी किसी भी बात का बुरा मान जाते हैं और नाराज महासभाई खतरनाक होता है । पर यह तय है कि महासभा में एकता को लेकर बड़ा शोर है। हर महासभाई यह कहता है और कहता चला जाता है कि संगठन में एकता होनी चाहिए । एक दिन में वह ऐसा पाँच – सात बार कह लेता है। अब तो स्थिति यह हो गई है कि कहीं कोई ‘एकता – एकता’ बड़-बड़ाता पाया जाता है, तो लोग समझ लेते हैं कि हो न हो यह शख्स महासभाई है । और निकलता भी है। हर महासभाई एकता के लिए समर्पित है। वह सुबह उठने से जो एकता में लगता है, तो फिर दिन-रात तक एकता के चक्कर में लगा रहता है। वह सोते-सोते भी एकता में लगा रहता है। दरअसल महासभा में हर एक को शक है कि वह तो एकता चाहता है, पर दूसरा नहीं चाहता। सो वह दूसरों से मिल कर उन्हें एकता का महत्व बताने का प्रयास करता है, जिसमें वह प्रायः असफल होता है क्योंकि दूसरा उसे घर पर मिलता ही नहीं, वह पहले ही, सुबह – सुबह, नित्य कर्मों से निवृत्त होकर तीसरे से एकता की बात करने जा चुका होता है। एकता में ही निवृत्ति है। एक आम समर्पित महासभाई का जीवन चरित्र संक्षेप में यूँ बयान किया जा सकता है कि वह पैदा हुआ, महासभाई बना, एकता करता रहा, और एकता – एकता खेलता हुआ ही मर गया। मरने के बाद भी हो सकता है कि वह प्रेत बन कर महासभाई के आस-पास मंडराता फिरता हो और अपनी अधूरी एकता मुहिम को लेकर दुःखी रहता हो या हो सकता है कि वह भूत बन कर किसी दूसरे महासभाई से चिपट जाता हो ताकि उसके जरिए महासभा की एकता में अपना योगदान दे सके। कई क्षत्रप मुझे शक्ल तथा हरकतों से प्रेतबाधाग्रस्त लगा भी करते हैं।
महासभाई कहता है कि एकता की हमें परम आवश्यकता है, परन्तु उसकी एक आँख इस बात की तरफ भी रहती है कि क्षेत्रीय क्षत्रप का रूख क्या है? यदि क्षेत्रीय क्षत्रप का रूख उलटा है तो वह एकदम पलटी भी मार सकता है। क्षेत्रीय क्षत्रप एक भी हो सकता है या फिर गुटों के अलग-अलग क्षत्रप भी हो सकते है जो अपने आप में अलाकमान का दर्जा प्राप्त होते हैं जो समय-समय पर बदलते रहते है। यदि महासभाई के आलाकमान का रूख उसके बयान से उल्टा है तो महासभाई पल्टी भी मार सकता है। मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है । मैंने यह नहीं कहा था कि हो कि जैसा कुछ असन्तुष्ट कहने की कोशिश कर रहे है, वरन इतना कहा था कि एकता हो, जिसे गलत समझा गया है, क्योंकि हमारी एकता को आलाकमान को मजबूत करने के लिये है, जबकि उनकी एकता की बातों के पीछे कौन बोल रहा है, किस कूटनीति के तहत एकता की बात बोली जा रही है, सो सबको पता है । परन्तु हमारी एकता की कोशिशें जारी रहेगीं और फूट डालने वाले गद्दारों की ईंट से ईंट बजा दी जाएगी। महासभा का यही तो मजा है कि यहां एकता और फूट साथ-साथ चलते हैं। एकता हो रही होती है कि फूट शुरू हो जाती है। जिसके लिये फिर एकता की आवश्यकता पर बल देना लाजिमी हो जाता है। महासभा एक ही साथ एकता और फूट के लिए उसी हद तक प्रतिबद्ध है । पुराना जमाना होता तो देवता फूल बरसाते, ऋषि-मुनि इन्हे देख कर श्लोक उच्चारते कि हे सूर्य से भी तेजामय टिमटिमाते दीपकों, तुम धन्य हो । आजकल किसी को वैसी फुर्सत नहीं है, वरना हरकत अभिनन्दनीय तो है ।

महासभाईयों के बीच एकता की ऐसी कोशिशे चलती रहती हैं। एक महासभाई जब दूसरे महासभाई से मिलता है तो आँख दबा कर या फिर बिना दबाये ही पूछता है कि क्यों प्यारे करते हो एकता ? अर्थात आते हो हमारे गुट में? इसके जवाब में दूसरा महासभाई यही कहता है कि जहां तक एकता का सवाल है तो एकता पर उसका विश्वास अभी का नहीं वरन डॉ. किशन चन्द और डा. क्रान्ती कुमार के जमाने से है क्योंकि वह तो जन्मजात महासभाई है, परन्तु उसे इस सिलसिले में अपने गुट से बात करनी होगी। दरअसल सहासभा में कई गुट हैं- और सभी आपस में एकता के लिये खतरनाक हद तक आमादा है। वे एक-दूसरे के पीछे लगें है, या तो हमारे साथ एकता करो, या फिर हम लगते है तुम्हें दस … । सारे एकता के लिए लड़ रहे हैं, तो उसका कुल तात्पर्य यही रहता है कि सारे महासभाई उसके गुट में आ जाएँ । महासभा में एकता की परम्परा उतनी ही पुरानी है जितनी गुटबन्दी की । महासभाई अपनी परम्पराओं को अंडे जैसे पोस्ते है । वह परम्पराओं से जुड़ी है, जिसमें गुटबन्दी भी शामिल है। महासभा में महासभाई होने से ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि आप किसके आदमी है? इसी आधार पर आपके एकता के प्रयासों को तोला जायेगा ।

अशोक कुमार जैन
बी2 रामद्वारा कॉलोनी महावीर नगर
 जयपुर

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