स्वरचित हाइकु छंद क्र.71 से 80
✍🏼7️⃣1️⃣
मन भर के
जिएं, ना कि मन में
भर के जिएं.
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✍🏼7️⃣2️⃣
परिवर्तन
गर हो जरूरी, तो
अवश्य करें.
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✍🏼7️⃣3️⃣
नश्वर पथ
से रोके सच्चा मित्र,
ईश से जोड़े.
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✍🏼7️⃣4️⃣
चिंता करोगे
तो भटक जाओगे,
चिंतन करो.
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✍🏼7️⃣5️⃣
धर्म का मूल्य
करुणा में है, न कि
अनुष्ठानों में.
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✍🏼7️⃣6️⃣
सच्चा नेतृत्व
आत्म नियंत्रण है
स्वयं को साधो.
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✍🏼7️⃣7️⃣
राम बने तो
पाओ खोके, वरना
पाके भी खोवो.
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✍🏼7️⃣8️⃣
मार्गदर्शक
सही तो दीपक भी
सूर्य सा लगे.
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✍🏼7️⃣9️⃣
स्पष्ट लक्ष्य से
जीवन, सार्थक व
सुफल बने.
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✍🏼8️⃣ 0️⃣
दूरी इतनी
न हो कि खुला दर
पड़े पीटना.
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हाइकु मूल रूप से जापान की एक अत्यंत लोकप्रिय और सबसे छोटी काव्य शैली है,जिसकी मुख्य विशेषता है कि यह केवल तीन पंक्तियों की कविता होती है। इसमें कुल 17 वर्ण (syllables) होते हैं, जिनका क्रम 5-7-5 (पहली पंक्ति में 5, दूसरी में 7, और तीसरी में 5) का होता है।
संयुक्ताक्षर, मात्रा, अनुस्वार, चंद्रबिंदु, विसर्ग, हलन्त वाला व्यंजन आदि अलग syllable (अक्षर-खंड) नहीं बनाते हैं।
हायकू में संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाले शिक्षाप्रद व प्रेरणास्पद विचार होते हैं।
✍🏼हाइकु रचयिता :-
राजेन्द्र प्रसाद जैन
76 मुक्तानंद नगर जयपुर