श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

हिंसा के भेद

गतांक से आगे:-

अहिंसा का व्यावहारिक रूप से पालन हो सके, इसलिए हिंसा के चार भेद किये गये हैं- 1. संकल्पी हिंसा, 2. आरम्भी हिंसा, 3. उद्योगी हिंसा, 4. विरोधी हिंसा।
1. संकल्पी हिंसा- संकल्पपूर्वक किसी जीव का घात करना अथवा उसे कष्ट पहुंचाना संकल्पी हिंसा है। कसाइयों द्वारा प्रतिदिन असंख्य पशुओं को मौत के घाट उतारा जाना इसी संकल्पी हिंसा का परिणाम है। आतंकवादी, जातीय संघर्ष, साम्प्रदायिक दंगों एवं अपने मनोरंजन अथवा माँसाहार के लिए शिकार आदि करना या कराना इसी संकल्पी हिंसा की पर्याय है। इसके अतिरिक्त, धर्म के नाम पर की जाने वाली पशुओं की बलि भी इसी संकल्पी हिंसा की कोटि में आती है।

2. आरम्भी हिंसा– घरेलू काम-काजों में दैनिक कार्यों के निमित्त से जो हिंसा होती है वह आरम्भी हिंसा कहलाती है। इसके अन्तर्गत भोजन बनाना, झाड़ना-बुहारना, नहाना-धोना आदि क्रियाएँ आती हैं।

3. औद्योगिक हिंसा– गृहस्थ को अपने जीवन निर्वाह के लिए अर्थोपार्जन अनिवार्य है। उसके लिए खेती-बाड़ी, नौकरी, व्यवसाय अथवा उद्योग आदि करना पड़ते हैं। इनमें होने वाली हिंसा, औद्योगिक हिंसा कहलाती है।

4. विरोधी हिंसा– अपने तथा अपने कुटुम्बियों के जान-माल की रक्षा के लिए अथवा धर्म, धर्मायतन, तीर्थ, मन्दिर एवं सन्तों पर आने वाली बाधाओं के निराकरण के लिए तथा अपने राष्ट्र की अस्तित्व की रक्षा करने के लिए, आतताइयों अथवा आक्रमणकारियों से मुकाबला करते हुए जो हिंसा करनी पड़ती है; वह विरोधी हिंसा है।

साधक गृहस्थ को चारों प्रकार की हिंसा का त्याग कर पाना सम्भव नहीं है। उसको अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आरम्भी व उद्योगी हिंसा करनी ही पड़ती है। अतः उक्त दोनों प्रकार की हिंसा उसके लिए अपरिहार्य है। इतना होने पर भी वह यद्वा तद्वा कोई भी कार्य नहीं करता है। वह अपनी प्रत्येक क्रियाओं में पूर्ण सावधानी रखता हुआ यत्नाचारी प्रवृत्ति करता है। अपने व्यवसाय में भी वह इसका ध्यान रखता है। उस प्रकार के व्यवसाय को वह भूलकर भी नहीं अपनाता जिसमें जीवों की अधिक हिंसा होती हो, साथ ही बहुजीव-वधकारी उद्योग भी वह नहीं खोलता है।

इसी तरह विरोधी हिंसा से भी वह नहीं बच पाता। यद्यपि वह स्वयं किसी से भी अकारण बैर/विरोध नहीं लेता, किन्तु यदि कोई उस पर आक्रमण करे तो वह उससे बचने के लिए डटकर मुकाबला करता है। आक्रमणकारी आततायी, अत्याचारी का सामना कर उसे सबक सिखाना ही गृहस्थ की विरोधी हिंसा का अभिप्रेत अर्थ है। वह उसके लिए क्षम्य है। उसके बिना समाज में अराजकता बढ़ जायेगी। यदि कोई देश पर आक्रमण कर हमारे अस्तित्व को चुनौती देता है तो इस भावना से कि इससे व्यर्थ में खून बहेगा, डरकर मुँह छुपाना अहिंसा नहीं कायरता है। अहिंसा कायरता नहीं, वह तो वीरों का भूषण है, क्षत्रियों का धर्म है।

जैन-धर्म के सभी तीर्थंकर क्षत्रिय वंशी थे। उन्होंने राष्ट्र की रक्षा एवं स्वेच्छाचारी राजाओं के कुशासन को कुचलने के लिए अपने जीवन में अनेक बार दिग्विजय यात्राएँ करके समस्त राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधा था। मौर्य-सम्राट् चन्द्रगुप्त, मेघवाहन, सम्राट् खारवेल एवं वीर सेनापति चामुण्डराय जैसे अनेक जैन बीर योद्धा हुए, जिन्होंने अपने रण-कौशल से राष्ट्र की रक्षा कर भारतीय इतिहास को गौरवान्वित किया है। वस्तुतः जैन-धर्म उन क्षत्रियों का धर्म था, जो युद्ध-स्थल में दुश्मन का तलवार से सत्कार/सामना करना जानते थे और क्षमा करना भी जानते थे। जैन-धर्म के अनुसार अपने अस्तित्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अस्त्र उठाना अपराध नहीं, धर्म है। उनकी लड़ाई न्याय के लिए न्यायपूर्वक होती थी। जैन राजनीति के व्याख्याता आचार्य सोमदेव सूरि ने इसी बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “रणाङ्गण में अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित शत्रु तथा देशद्रोही व्यक्ति पर ही राजागण अपने शस्त्र का प्रहार करते हैं न कि कमजोर, निहत्थे, कायरों और सदाशयी निरपराध पुरुषों पर। ”

यः शस्त्र-सहितो समरे रिपुः स्यात् कण्टको वा निजमण्डलस्य ।। यः अस्त्राणि तत्रैव नृपाः क्षिपन्ति । न दीनकानीन-शुभाशयेषु ॥’

अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर रणाङ्गण में जो शत्रु बनकर आया हो या अपने देश का दुश्मन बनकर आया हो, राजागण उसी पर अपने अस्त्र का प्रहार करते हैं। जैन राजनीति का यही आधार है। इस न्यायपूर्ण युद्ध में भी इसकी अहिंसा खण्डित नहीं होती।

हिंसक भी शत्रु से युद्ध करता है और अहिंसक भी, दोनों के द्वारा युद्ध में भीषण नरसंहार होता है। फिर भी हिंसक निर्दयी और अहिंसक दयालु ही बना रहता है, क्योंकि वह अपने इस कृत्य पर प्रसन्न नहीं होता। वह सिर्फ हिंसा के लिए हिंसा का रास्ता नहीं अपनाता, अपितु परिस्थितियों के कारण उसे हिंसा करनी पड़ती है। हिंसक और अहिंसक की मानसिकता में महान् अन्तर होता है। हिंसक के अन्दर है आक्रमण, अहिंसक के अन्दर है केवल रक्षा, हिंसक के हृदय में रहता है द्वेष और अहिंसक के हृदय में रहती है क्षमा। हिंसक को अपने द्वारा किये गये नरसंहार को देखकर हर्ष होता है तो अहिंसक को होता है पश्चात्ताप। अपनी इसी मनःस्थिति के कारण गृहस्थ अपनी छोटी-मोटी अपरिहार्य हिंसाओं के होने पर भी अहिंसक बना रहता है। वस्तुतः वह हिंसक नहीं है। हिंसा वह करना नहीं चाहता, उसे करनी पड़ती है।

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अहिंसा कायरता नहीं है। जीवन से पलायन भी अहिंसा का उद्देश्य नहीं है। अहिंसा तो व्यावहारिक जीवन को सन्तुलित बनाकर स्व और पर के घात से बचने का उपाय है। अहिंसा कायरता नहीं, अपितु मानव में मानवता को प्रतिष्ठित करने का अनुष्ठान है।

पाँच व्रत

जैनाचार में अहिंसा के अनुपालनार्थ सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह व्रत रूप पञ्चसूत्रीय आचार की प्ररूपणा की गयी है। उक्त पाँचों व्रतों का मुख्य उद्देश्य अहिंसा का अनुपालन ही है। जैसे खेत की फसल की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर बाड़ लगाई जाती है, वैसे ही सत्य आदि अहिंसा की रक्षा के लिए लगाये जाने वाले बाड़ की तरह है। आत्मविकास में बाधक कर्मों को रोकने तथा उन्हें नष्ट करने के लिए अहिंसा एवं तदाधारित सत्य आदि व्रत्तों का परिपालन अनिवार्य है। इसमें व्यक्ति एवं समाज दोनों का हित निहित है। वैयक्तिक उत्थान एवं सामाजिक उत्कर्ष के लिए असत्य का त्याग, अनधिकृत वस्तु के ग्रहण से परहेज तथा संयम का परिपालन अनिवार्य है। इनके अभाव में अहिंसा का विकास नहीं हो सकता। परिणामतः आत्मविकास में बहुत बड़ी बाधा उपस्थित हो जाती है। इन सबके साथ अपरिग्रह का व्रत भी आवश्यक है। परिग्रह आत्मविकास का प्रबल शत्रु है। जहाँ परिग्रह होता है वहाँ आत्मविकास के सारे मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। इतना ही नहीं, परिग्रह आत्मा के अधःपतन का बहुत बड़ा कारण बनता है। परिग्रह का अर्थ ही है पाप का संग्रह। यह आसक्ति से बढ़ता है तथा आसक्ति को बढ़ाता है। इसी का नाम मूर्च्छा है। ज्यों-ज्यों परिग्रह अधिक बढ़ता है, त्यों-त्यों आसक्ति बढ़ती जाती है। जितनी अधिक आसक्ति बढ़ती है, उतनी ही अधिक हिंसा बढ़ती है। यही हिंसा मानव-समाज में वैषम्य उत्पन्न करती है। इसी से मनुष्य का आत्मपतन भी होता है।

अपरिग्रह-वृत्ति अहिंसामूलक सम्यक् आचार के परिपालन के लिए अनिवार्य है। मुख्य रूप से समाज में बैर-विरोध बढ़ाने वाली वृत्तियों के नियन्त्रण के लिए ही उक्त व्रतों की व्यवस्था दी गयी है। हिंसा मत करो, झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, कुशील मत करो तथा परिग्रह का सञ्चय मत करो। इन निषेधात्मक नियमों से ही मनुष्य के आचरण का परिष्कार सरलतम रीति से किया जा सकता है। हिंसादिक पाँच पाप सामाजिक पाप हैं। मनुष्य की इन्हीं प्रवृत्तियों से आज मानव-समाज प्रदूषित हो रहा है। जो व्यक्ति जितने अंशों में इनका परित्याग करता है, वह उतना ही सभ्य और समाज हितैषी माना जाता है। जितने अधिक व्यक्ति इसका पालन करेंगे, समाज उतना ही अधिक समृद्ध, सुखी और प्रगतिशील बनेगा।

जैन-शास्त्रों में उक्त व्रतों पर बहुत जोर दिया गया है। जैन साधना का मूलाधार उक्त व्रत ही हैं। इस पर ही जैन साधना का भवन टिका है। इसके अभाव में साधना की शुरुआत ही नहीं हो सकती।

उक्त पाँच व्रतों के परिपालन के लिए व्रतों के दो स्तर स्थापित किये गये हैं।

प्रथम है साधु मार्ग और द्वितीय श्रावक मार्ग या गृहस्थ मार्ग। इन्हें क्रमशः साधु धर्म और श्रावक धर्म भी कहते हैं। साधु मार्ग निवृत्तिमूलक है। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहरूपी पाँचों पापों के परिपूर्ण त्याग से यह प्रारम्भ होता है। साधना का राजमार्ग यही है, क्योंकि उक्त पाँचों पाप ही हमारे आत्मविकास के सबसे बड़े अवरोधक हैं। इनसे विमुख हुए बिना आध्यात्मिक आनन्द आ ही नहीं सकता। श्रावक-मार्ग या गृहस्थ-मार्ग का निर्वाह उक्त पापों के आंशिक त्याग से होता है। इसका पालन समाज में रहने वाले मनुष्य अपनी क्षमता के अनुरूप करते हैं। गृहस्थ-मार्ग त्याग और भोग के बीच सन्तुलित जीवन जीने की पद्धति है। साधु जीवन में जहाँ आध्यात्मिक जीवन का चरमोत्कर्ष है, तो श्रावक जीवन भी नैतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों के क्रमिक विकास के साथ-साथ मानवीय गुणों का संचार करता है। साधु धर्म व्यक्ति को आत्मकेन्द्रित बनाकर पूर्ण निवृत्ति का मार्ग प्रशस्त करता है और श्रावक धर्म मानव मात्र में नैतिक और धार्मिक गुणों का आरोपण कर एक श्रेष्ठ इंसान बनाता है। इस तरह हम साधु धर्म को व्यक्ति धर्म तथा श्रावक धर्म को समाज धर्म भी कह सकते हैं। समस्त जैनाचार, श्रावकाचार या गृहस्थाचार तथा श्रमणाचार या साध्वाचार के रूप में विभाजित है। अगले अध्यायों में क्रमशः इनके स्वरूप पर पूर्ण विचार करेंगे।

क्रमश:-

मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज

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