कुछ विचारणीय बिंदु (3):
विचारशील एवं चिंतनशील व्यक्ति समाज की स्थिति की समीक्षा कर सकता है। कुछ दिशा-निर्देश दे सकता है लेकिन उन्हें धरातल पर उतारने का कार्य नहीं कर सकता है। वह तो राष्ट्रीय व सामाजिक नेतृत्व, संत और विद्वान् ही कर सकते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर पा रहा है। इस कारण समाज में असंतोष का सा वातावरण है। आज दिगंबर जैन समाज में कई राष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं हैं तथा उसके अनेक नेता भी हैं। लेकिन उनमें से एक भी ऐसा नजर नहीं आ रहा है जिसका कोई स्पष्ट विजन हो, जो समाज के सभी वर्गों को साथ में लेकर चल सके। समाज के लोग भी उसके साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने को तैयार हों। जब वह खड़ा हो तो उसके साथ दूसरे भी खड़े हो जाएँ, वह कुछ बोले तो सब लोग उसे सुने, लोग उसकी बात को मानें जब वह अन्य समाज तथा देश के नेताओं के मध्य जाए तो हमें लगे कि हमारा कोई कद्दावर नेता खड़ा है जो पूरे जैन समाज की बात रख रहा है।
आज एक भी सामाजिक संस्था ऐसी नहीं है जो अपनी कोई छाप छोड़ पाये, जिस पर हम गर्व कर सकें। कुछ संस्थाएं तो मात्र नेतागिरी के लिए ही हैं। लोग पदों पर बैठ जाते हैं लेकिन क्या और कैसे करना है इसकी उन्हें कोई समझ नहीं है। आज हमारे अनेक तीर्थ असुरक्षित हैं, उनकी रक्षा कैसे हो, उसके लिए क्या कार्ययोजना हो, इस सबकी उन्हें न तो कोई समझ है और न ही कोई जानकारी। हमारे समाज में अनेकों गरीब और बेरोजगार हैं. उनकी किस प्रकार मदद करें, जैन युवाओं की शिक्षा के लिए क्या योजना बनाएं, इस तरफ कोई ध्यान नहीं है। विभिन्न जैन जातियों की जनसंख्या कितनी है, उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है. कुछ पता नहीं। सामाजिक स्तर पर भी यही हाल है विभिन्न समाज के चुनाव होते हैं तो लगता है कि विधानसभा या लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं। मैं तो एक महिला संगठन के चुनाव देखकर दंग रह गया जिसमें मुश्किल से 125-150 सदस्य होंगे। क्या गजब का चुनाव प्रचार, पर्चेबाजी, बैनर, बूथ, ग्रुपों में घर-घर प्रचार। किसी भी प्रकार समाज के पदाधिकारी बन भी जाएं तो कोई दिक्कत नहीं, लेकिन समाज के लिए क्या और कैसे करना है, इसकी तो कुछ जानकारी हो। यह जानने और समझने में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है, मात्र नेतागिरी है। मंदिर, धर्मशाला और तीर्थ स्थानों का हाल भी अच्छा नहीं है। हमारे प्राचीन तीर्थस्थान और धर्मशालायें उपेक्षित हो रहे हैं। धर्मशालाओं के कमरे, ओड़ने-बिछाने के कपड़े और शौचालय बहुत ही गंदे रहते है (पदाधिकारियों के कमरों की बात अलग है)। इन संस्थाओं में कोई एक बार पदाधिकारी बन जाये, वह हमेशा के लिए उससे चिपक जाता है, पद छोड़ने का नाम नहीं लेता है। कब्र में पैर लटके हैं फिर भी युवाओं को आगे नहीं आने देते हैं, नई ऊर्जा और नई विचारधारा के अभाव में वही पुरानी दकियानूसी सोच कुछ अच्छा होने में बाधक हैं। कुछ वृद्ध नेता अपवाद हो सकते हैं जो सकारात्मक सोच रखते हैं तथा पूरी निष्ठा के साथ इस अवस्था में भी सक्रिय हैं, लेकिन अधिकतर स्थिति ऐसी नहीं है। वरिष्ठ सामाजिक नेताओं व कार्यकर्ताओं का उचित सम्मान होना चाहिए, उनका मार्गदर्शन भी लेना चाहिए लेकिन कार्य युवा शक्ति के हाथों में होना चाहिए। वरिष्ठ नेताओं को भी युवाओं पर भरोसा होना चाहिए।
संतवाद और पंथवाद भी एक गंभीर समस्या बनी हई है जिसके लिए हमारे कुछ नेता भी जिम्मेदार हैं। आगरा में अपने प्रारंभिक 20-25 वर्ष की उम्र तक हमें मात्र इतना ही मालुम था कि दिगंबरों में दो मत हैं तेरापंथ और बीसपंथ लेकिन कौन तेरापंथी है और कौन बीसपंथी, इसका कोई भेद नहीं था। सभी मिलजुल कर प्रेम पूर्वक रहते थे। लेकिन अब स्थिति बिल्कुल अलग है, तेरापंथ और बीसपथ का भेद स्पष्ट दिखाई देने लगा है। इसका श्रेय हमारे नेताओं को तो है ही, संतों को भी जाता है। अपने को दूसरे से अच्छा दिखाने के चक्कर में यह भेद एक बड़ी खाई का रूप लेने के लिए आतुर है। पिछले कुछ सालों में बात और आगे बढ़ गई है। बात 13 या 20 तक ही सीमित नहीं रह गई है बल्कि अपने को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ सी मच गई है। इसी कारण प्रत्येक बड़े-बड़े खर्चीले आयोजनों में अधिक रुचि लेने लगे हैं। इससे व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा तो शायद पूरी हो जाए लेकिन जैनधर्म का नुकसान तो अवश्य ही हो रहा है।
साधुओं को अपने प्रवचनों में क्या बोलना है, अब यह महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। जाने अनजाने में अधिकतर साधु धार्मिक बातें कम और सांसारिक बातें अधिक करने लगे हैं; और तो और, राजनैतिक बयानवाजी भी करने लगे हैं। बहुत से साधु तो किसी एक राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी की विचारधारा का प्रचार करते नजर आते हैं। यह एक चिंता का विषय है। जैनधर्म में अनेक ऐसे सिद्धांत हैं जिन्हें बिना किसी को ठेस पहुंचाए हुए भी कहा जा सकता है। लेकिन बहुत से संत जैनधर्म का अच्छा ज्ञान न होने के कारण विकथा, राष्ट्रकथा करने लगे हैं जोकि अनुचित है।
साधु में ज्ञान भले ही कम हो, उसका चारित्र बोलता है, उसी से धर्म का प्रचार भी अधिक होता है। लेकिन आए दिन साधुओं की अनेक ऐसी घटनायें सामने आती रहती है जो समाज को तो शर्मसार करती ही है, जैनधर्म को भी हानि पहुंचाती है। इसके लिए उनके दीक्षागुरु अधिक दोषी हैं। उन्होंने बिना जाँचे-परखे बिना ज्ञान दिए साधु कैसे बना दिया। चलो साधु बना दिया कोई बात नहीं, अपने साथ में रखना था, उसे अकेला क्यों छोड़ दिया; इतना ही नहीं, साधु के गुण तो हैं नहीं, आचार्य बना दिया। हमारे राष्ट्रीय नेता इस तरह की समस्याओ का समुचित हल निकालना तो दूर, उन्हें और अधिक बढ़ाने का कार्य करते हैं। पंथवाद का पक्ष लेते है और शिथिलाचार को भी बढ़ाते हैं।
यूँ तो विद्वानों की भूमिका हमेशा से ही महत्वपूर्ण रही है लेकिन वर्तमान में उन पर और अधिक जिम्मेदारी आ पड़ी है। यह ही एक ऐसा वर्ग है जो साधु संतों से निर्भीक होकर कुछ कह सकता है। नेताओं से भी कह सकता है। वह साधुओं को समय-समय पर जैनधर्म के सिद्धांतों को समझा सकता है, यदि कोई साधु अपने मार्ग से च्युत हो रहा है तो उसे सावधान कर सकता है, सही दिशा दिखा सकता है। लेकिन कुछ विद्वान् संतवाद और पंथवाद के व्यामोह में पड़ जाते हैं और जो बड़ा काम वे कर सकते हैं उससे वे चूक जाते हैं। फिर भी आज कैसी भी स्थिति हो, मेरा मानना है कि अब भी विद्वान् इस स्थिति को बेहतर बना सकते हैं।
यदि ये सब मिलकर थोड़ा सा प्रयास करें तो स्थिति सुधर सकती है। विद्वानों का दूसरा काम श्रावकों को शिक्षित करना भी है। जब श्रावकों को यह ही नहीं मालुम होगा कि उनके क्या कर्तव्य हैं, देव शास्त्र गुरु का स्वरूप क्या है, देव और कुदेव में क्या भेद है, तो वे सही और गलत का निर्णय कैसे कर पायेंगे। आज विद्वानों की भी अनेक संस्थायें हैं। उसके बावजूद भी मेरा मानना है कि विद्वान् थोड़ा सा प्रयास करें तो इस स्थिति को बेहतर बना सकते हैं। वे हमारे नेताओं को भी मार्गदर्शन प्रदान कर सकते है।
डॉ. अनिल कुमार जैन
महावीर नगर
जयपुर