परम पूज्य आचार्य उमास्वामी महाराज जो एक गहन तत्त्व चिंतक है उन्होंने अपने तत्त्वार्थ सूत्र में बहुत सुन्दर बात कही है सातवें अध्याय में कहा है –मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि च सत्वगुणाधिकक्लिश्यमानाविनयेषु । अर्थात प्राणियों के प्रति मैत्री, गुणाधिक के प्रति प्रमोद, क्लिश्यमान के प्रति करुणा व अविनेय के प्रति माध्यस्थ भाव रखें।
मैत्री भाव – यदि कोई प्राणी दुःखी है तो उसके दुःख को दूर कर दे, ये सर्वश्रेष्ठ है यदि दूर न कर सके तो कम से कम सहानुभूति रख ले और सबसे अच्छा विचार तो यह है कि दूसरों को दुःख ही न हो, कोई भी व्यक्ति ऐसा काम ही न करे कि उसे दुःख हो। बस दूसरों के दुःख को दूर करने का भाव मैत्री भाव कहलाता है। किसी वृद्ध को हाथ का सहारा दे दिया, कोई भूखा है तो भोजन करा दो, बीमार है औषधि करा दो और परोपकार करते हुए भी प्रत्युपकार की भावना न हो कि यदि यह मेरा काम करेगा तो ही मैं इसका करूँगा। जो प्रत्युपकार की भावना रखेगा वह वास्तविक मैत्री भाव तक नहीं पहुँच पायेगा। अतः निःस्वार्थ भावना से प्राणी मात्र के दुःख को दूर करना ही मैत्री भाव है।
प्रमोद भाव – गुणी जनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड आवे। गुणवान को देखकर प्रमुदित होना चाहिए। गुणीजनों को देख मुख पर प्रसन्नता छा जाना, मन आल्हादित हो जाना यह प्रमोद भाव है। यूं तो संसार में एक भी प्राणी ऐसा नहीं जिसके अंदर कोई गुण न हो परन्तु हर गुण मोक्ष मार्ग में प्रयोजनीय नहीं होता है। जो मोक्ष मार्ग में प्रयोजनवान है वे अहिंसा आदि व्रत है निःशंकित आदि 8 अंग होते है। यदि कोई उपकारी को देख प्रमुदित होता है तो आचार्य कहते है वह प्रमोद भाव नहीं है अपितु गुणवानों यानि रत्नत्रय धारी को देख प्रसन्न होना प्रमोद भाव है, प्रसन्नता कैसी हो –
चार मिले चौसठ खिले, रहे बीस कर जोड़। धर्मी से धर्मी मिले, हरषे 60 करोड़ ।।
कारुण्य भाव – कोई साधर्मी हमारा तड़प रहा हो, बीमार हो, बुखार चढ़ रहा हो, सिर दर्द कर रहा हो तो उसे पूछ लीजिए, सेवा, वैय्यावृत्ति कर दीजिए। यदि रत्नत्रय के पालन में कोई विघ्न आ गया है तो उसे दूर करने का यथायोग्य प्रयत्न करना चाहिए। कुछ लोग एक इन्द्रिय की रक्षा कर लेते है और साधर्मी को पूछ नहीं पाते तो करुणा भाव कैसे हो! कोई तड़प रहा है और हम मुँह फेर लेते है कि हमें क्या करना, पड़े रहने दो ऐसी दुर्भावनाएँ जहाँ है वहाँ करुणा कैसे हो सकती है। जहाँ प्राणी मात्र के प्रति करुणा की बात की जाती है वहाँ साधर्मी के प्रति तो नियम से होना ही चाहिए।
माध्यस्थ भाव – कर्तव्य विहीन, अनुशासन विहीन के प्रति गुरु की दृष्टि हट जाती है वे दृष्टि को मोड़ लेते है क्योंकि वे न तो डंडे मारते है न डाँटते-फटकारते मात्र दृष्टि से ही दंडित कर देते है। माध्यस्थ्यभाव रखते है जो शिष्य गुरु आज्ञा को भंग कर देते हैं, संघ के अनुशासन का पालन नहीं करते। वे पार्श्वस्थ कहलाते हैं। पार्श्वस्थ साधुओं को सन्मार्ग पर लाने के लिये गुरु जन उनके प्रति माध्यस्थ्य भाव रखते है। यदि कोई राष्ट्र का नियम भंग करता है। तो उस पर कानूनी धाराएँ लगायी जाती हैं, विभिन्न प्रकार के दंड निर्धारित किये जाते हैं। परन्तु गुरु कोई धाराएँ तो लगाते नहीं है अपितु माध्यस्थ भाव ही धारण कर लेते है। यदि गुरु की दृष्टि हमारे ऊपर से कुछ हट जाती है तो मन में आकुलता-व्याकुलता होने लगती है कि आखिर मुझसे क्या गलती हुई होगी और चिंतन प्रारंभ हो जाते है फिर एक नहीं अनेकानेक गल्तियाँ दिखने लगती है। जब मैं संघ में था तो कभी-कभी ऐसा हो जाता था कि यहाँ से नमोस्तु करो तो गुरुवर अपनी दृष्टि उस ओर कर लेते थे, मन में घबराहट होने लगती थी कि आखिर मुझसे क्या अपराध हो गया, दिन भर चिंतन में डूबा रहता था और गुरु के पास जाकर दसो गलतियाँ गिना देता था और आलोचना सुनकर गुरु प्रसन्न हो जाते थे। मैं पूछता आचार्य श्री आपने इतनी देर क्यों लगाई, पहले ही बता देते तो मैं गलती सुधार लेता। आचार्य श्री बोले- यदि मैं पहले बता देता तो तुमने जो इतनी सारी आलोचनाएँ सुनायी है वह कौन सुनाता। अन्दर की झाडू बुहारी नहीं हो पाती।
कोई शिष्य जब अपने अपराध निवेदन करने गुरु के पास जाता है तो गुरु दस चक्कर उससे लगवा लेते हैं। तब जाकर समय देते है उस समय में परख लिया जाता है कि शिष्य हमारा कितना भव-भीरु है। यदि भव-भीरुता है तो दस चक्कर लगाकर भी थकेगा नहीं। यदि भव भीरु नहीं है तो कहेगा मैं तो थक गया चक्कर लगाते-लगाते। मुझे नहीं जाना, न माला फिरती है, न स्वाध्याय होता है। महाराज चक्कर लगवाते रहते है ऐसे व्यक्ति को जब गुरु प्रायश्चित देते है तो दंड अधिक मिलता है क्योंकि परिणामों की निर्मलता कम है और जो भव भीरु शिष्य है वह कहेगा – हमारे गुरुवर कितने व्यस्त रहते है फिर भी अपने साधना के अमूल्य क्षण निकाल कर हमें प्रायश्चित देते हैं। यदि दो चार बार आना भी पड़ गया तो भी हमारा सौभाग्य है इंतजारी करना पड़ी तो भी सौभाग्य है गुरुद्वारे पर बैठने पुण्यवानों को मिलता है और हमारी आलोचना का प्रशस्त भाव है तो नियम से पुण्योपार्जन ही होगा। ऐसे भव भीरु शिष्यों को गुरु बड़े-बड़े अपराधों का भी स्वल्प प्रायश्चित देते है। ऐसे शिष्यों को गुरु वात्सल्य व प्रोत्साहन भी देते है परन्तु जो गुरु से विपरीत वृत्ति वाले है अनुशासन विहीन है यदि उनके साथ और अनुशासनवान के साथ समान व्यवहार रखा तो मोक्षमार्ग की प्रशस्तता नहीं रह पायेगी। इसीलिए अविनेय के प्रति माध्यस्थ भाव रखा जाता है। यदि गुरु की दृष्टि परिवर्तित है तो अनुशासनवान की दृष्टि भी परिवर्तित हो जाती है। उनके साथ यदि माध्यस्थ्य भाव रखा जाता है तो पार्श्वस्थ की संगति रखने वाला भी पार्श्वस्थ ही है। अतः उसके साथ भी माध्यस्थ भाव रखा जाता है। जैसे शराबी की संगति रखने वाला भले स्वयं शराबी न भी हो तो भी दुनियाँ उसके शराबी होने की शंका करने लगती है। उसी प्रकार पार्श्वस्थ की संगति रखने वाला भी उसी के तुल्य हो जाता है। अतः गुरु दृष्टि से चलना चाहिए तथा अविनेय के प्रति राग द्वेष व पक्षपात से रहित माध्यस्थ भाव होना चाहिए। अविनेय कौन है? तो आचार्य भगवन् कहते है जो श्रुत के प्रति अथवा देव, शास्त्र व गुरु के प्रति विनयावनत न हो वह अविनेय है। गुरु शास्त्राभ्यास करा रहे है और आप बाते करें, अथवा गुरु दूसरा विषय पढ़ा रहे हो और आप दूसरा विषय पढ़े अथवा स्वाध्याय में माला फेरे या उपयोग यहाँ-वहाँ ले जाए, शास्त्र को उपयोग से न सुने अथवा जो सुनाया जा रहा है वह सिरदर्दी लगे तो यह अविनेय भाव है अथवा गुरु और गुरुकुल के विपरीत वृत्ति रखना सब अविनेय में ही गर्हित हो जाता है आचार्य भगवन् ने उनके प्रति माध्यस्थ भाव रखने हेतु इंगित किया।
इस प्रकार सत्त्वेषु – प्राणियों के प्रति मैत्री भाव, गुणाधिक के प्रति प्रमोद भाव, दुःखी प्राणियों के प्रति करुणा तथा अविनेय के प्रति माध्यस्थ भाव रखने से अहिंसा आदि व्रतों की पूर्णता होती है।