जैन कालचक्र के अनुसार, यह एक अत्यंत विचित्र और अपवादस्वरूप काल होता है, जिसमें प्रकृति के सामान्य नियमों के विरुद्ध कई अनहोनी और आश्चर्यजनक घटनाएं घटती हैं।हुंडा अवसर्पिणी काल क्या है ?
जैन धर्म में समय को एक पहिए (कालचक्र) की तरह माना गया है, जिसके दो भाग होते हैं:-
उत्सर्पिणी (विकास का काल) और अवसर्पिणी (ह्रास या गिरावट का काल)।
सामान्यतः-हर कालचक्र अपने तय नियमों से चलता है। लेकिन असंख्यात (अनगिनत) अवसर्पिणी काल बीत जाने के बाद एक बार ऐसा विशेष ‘अवसर्पिणी काल’ आता है जिसे ‘हुंडा अवसर्पिणी काल’ कहते हैं। वर्तमान में यही काल चल रहा है और हम इसके पांचवें आरे (दुषम काल) में जी रहे हैं।इस काल में होने वाली प्रमुख विचित्र घटनाएं (अपवाद)इस काल दोष के कारण ऐसी घटनाएं घटती हैं जो सामान्यतः-अन्य कालों में नहीं होतीं:-
तीर्थंकर के ऊपर उपसर्ग (कष्ट):-सामान्य नियम के अनुसार तीर्थंकरों पर कभी कोई संकट या उपसर्ग नहीं आता, लेकिन इस काल में भगवान महावीर, भगवान पार्श्वनाथ और भगवान सुपार्श्वनाथ पर घोर उपसर्ग हुए।
दिव्यध्वनि का न खिरना:-तीर्थंकर को केवलज्ञान होने के तुरंत बाद समवशरण में उनकी वाणी (दिव्यध्वनि) गूंजती है, लेकिन इस काल के दोष के कारण अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर की दिव्यध्वनि पूरे 66 दिनों तक नहीं खिरी।
तीर्थंकर के घर कन्या का जन्म:-सामान्यतः तीर्थंकरों के केवल पुत्र होते हैं, लेकिन इस काल में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) के घर दो कन्याओं (ब्राह्मी और सुंदरी) का जन्म हुआ।
चक्रवर्ती की हार और मानभंग:-चक्रवर्ती राजा अपनी दिग्विजय यात्रा में कभी नहीं हारते, लेकिन काल दोष के कारण भरत चक्रवर्ती को अपने छोटे भाई बाहुबली से पराजित होना पड़ा।
तीसरे काल में ही मोक्ष:-सामान्य नियम से जीव चौथे काल में ही मोक्ष जाते हैं, लेकिन इस काल में भगवान आदिनाथ और उनके कई पुत्र तीसरे काल के अंत में ही मोक्ष चले गए।
शलाका पुरुषों की संख्या में कमी:-सामान्यतः एक काल में 63 शलाका पुरुष (महापुरुष) होते हैं, परंतु इस विचित्र काल के कारण यह संख्या घटकर 58 ही रह गई।
असमय प्राकृतिक आपदाएं:-इस काल में बिना मौसम के अत्यधिक बारिश (अतिवृष्टि), सूखा (अनावृष्टि), भूकंप और बिजली गिरने जैसी भयानक प्राकृतिक आपदाएं बार-बार आती हैं।
त्रिभुवन जैन
कोटा