श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

संसार का शमन तप से

माटी का कुंभ जब अग्नि में पक गया तो लोग उसको मंगल कलश के रूप में मान-सम्मान देने लगे जिसमें एक दिन माटी ईर्ष्या से जल उठी। जमीन में पड़ी मिट्टी सोचती है कि मैं कहाँ पददलित अकिंचन सी बनी हूँ। और यह कलश कहाँ मान-सम्मान पूर्वक शिरमौर बना हुआ है। कुंभ को इतना मान-सम्मान क्यों ? जबकि अंश एक सा, वंश एक सा, फिर ऐसा पक्षपात क्यों ? तब कुंभ बोला – मैंने साधना के मार्ग को चुना है, तपन को सहा है। साधना की उन्नति ही सिद्धि का मार्ग है। मेरी कहानी सुनो – पहले कुम्भकार आया और उसने मुझ पर कुदाली चलाना शुरु कर दिया। मैंने उस पीड़ा को चुपचाप सहन कर लिया। फिर उसने मुझे कूटा, छाना और ठंड के दिनों में पानी में गला दिया। मेरा सारा शरीर फूल गया। तब मेरा लौंदा (पिंड) बनाया गया मेरी पीड़ा का पारावार नहीं था। चुपचाप समर्पण के साथ उसपीड़ा को सहता रहा । कुम्भकार ने मुझे चाक पर चढ़ाया और जोर से घुमाया, मेरा सिर चकराने लगा और उसी चक्कर की दशा में मैने कुंभ का आकार ले लिया । मुझे प्रखर धूप में तपाया, मेरे अन्दर के जलीय अंश को सुखा दिया। इतने पर भी जब संतोष नहीं हुआ तब धधकती हुई आग में रख दिया गया। अग्नि की तपन से मेरा सारा शरीर जल गया। मेरे रंग में निखार आ गया। मैं काले रंग से लाल हो गया। इतना कष्ट सहने के बाद में कीमती बन पाया हूँ। इस प्रकार एक मिट्टी के कुंभ को इतने कष्टों को सहन करने के बाद मंगल कलश का नाम प्राप्त हुआ तो हे आत्मन् ! बिना तप धर्म को स्वीकार किये संसार की तपन कैसे शांत हो सकती है अर्थात् नहीं हो सकती ।

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तामसिक तप अप्रयोजनीय

बात उस समय की है जब रावण, विभीषण तथा कुंभकर्ण विद्या प्राप्ति हेतु साधना में विधिपूर्वक संलग्न थे, उन्हें भूख-प्यास, घर – कुटुम्ब का स्मरण नहीं था, उनकी साधना से प्रसन्न होकर विद्या देवता उपस्थित हो गये। उन्होंने परीक्षा हेतु मेघनाथ आदि के सिर बना लिये, एवं मंदोदरी, सिर गोद में रख विलाप करने लगी, इतना भयंकर विलाप कि जंगल के तिर्यञ्च आदि रो पड़े तथा मंदोदरी कहने लगी छोड़ दो यह तप। यह सुनकर कुंभकर्ण का ध्यान टूट गया, वे बोले चुप हो जाओ, मेरे रहते ऐसा नहीं हो सकता और आँख खोल कर देखते हैं कि वहाँ कोई नहीं है तो पुनः साधना में संलग्न हो गये, दूसरी बार ऐसा ही विभीषण के साथ हुआ और वे भी अपनी साधना से विचलित हो गये । तीसरी बार रावण के सामने भी ऐसा ही दृश्य उपस्थित हुआ परंतु रावण अपनी साधना से विचलित नहीं हुए। और उन्हें विद्या सिद्ध हो गई। क्योंकि उसने एकाग्रता से तप किया था। लेकिन विद्या सिद्धि के लिये जो साधना की जाती है वह एक तामसिक तप है। जो मोक्ष मार्ग में प्रयोजनीय नहीं होता ।

 

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