श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

दृष्टि को बदलो सृष्टि भी बदली नजर आयेगी

हम चल रहे है दृष्टि की ओर। दृष्टि यानि आँख। जो देखना है वह दर्शन है। यह व्याकरण कहता है आँख होगी तो दर्शन होगा, आँख नहीं तो दर्शन नहीं होगा। परमार्थ कहता है दर्शन पहले होगा, दृष्टि बाद में होगी। जिसकी दृष्टि । समीचीन हो वह सम्यग्दृष्टि है। पहले श्रद्धान होना चाहिए। श्रद्धान है तो सम्यग्दृष्टि । लौकिकता में व्यक्ति आँख को ही दृष्टि समझता है। परन्तु आगमाभ्यासी कहेगा आँख नहीं अपितु हमारा श्रद्धान रुप परिणाम ही दृष्टि है। दोनों दृष्टि है परन्तु दृष्टि-दृष्टि में फेर है। एक मिथ्यादृष्टि की भी दृष्टि है एक सम्यग्दृष्टि की भी दृष्टि है। दृष्टि दोनों की है परन्तु दिशा विपरीत है। मिथ्यादृष्टि से पूछो मोक्ष चाहते हो, कहेगा -हाँ, परन्तु अंतर परिणति सुख चाहती है वह भी आतंरिक नहीं लौकिक सुख चाहती है। जबकि सम्यग्दृष्टि लौकिक नहीं पारलौकिक सुख चाहता है। शरीर का नहीं, आत्मा का शाश्वत सुख चाहता है। दोनों मोक्ष पाना चाहते हैं परन्तु चाहत की परिभाषा भिन्न-2 है। श्रद्धा आत्मा का गुण है। अनुलोम हो तो सम्यक् है विलोम हो तो मिथ्या है। जैसे Railway वाले दो झंडी दिखाते है। एक हरी व एक लाल। एक line clear होने का संकेत है तो दूसरा खतरे का प्रतीत है। बस श्रद्धा अनुलोम है तो समझो मुक्ति की line clear है। यदि श्रद्धा विलोम है तो अभी खतरा है। श्रद्धा एक वस्तु है पर्यायें दो है। दोनो पर्यायों की युगपत प्रवृत्ति संभव नहीं है। मिध्यात्व के सद्भाव में जीवन अंधकार मय है। आँखें हो पर रोशनी न हो तो कुछ नहीं दिखता। आँखों में रोशनी नहीं है तो क्या दिखेगा। गुरु उपदेश देते है देखो देखो सामने सच्चे देव है, वो देखो शास्त्र जी है, वो देखो गुरु विराजे है परन्तु आँखों से अंधे को क्या दिखेगा। बस ऐसी ही दशा मिध्यादृष्टि की है अंधा है तो आत्मा, आत्महित का पथ नहीं दिखता है वह तो शरीर के लिये ही जीता है। चार्वाक की तरह वह कहता है-

यावज्जीवं सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् ।
परलोक किसने देखा जब तक जियो सुख से जियो, खाओ-पियो एश करो। ऋण लेना पड़ें तो ऋण लेकर भी घी पिओ।

मुझे मकान बनाना है, फैशन वाले कपड़े चाहिए, अमुक आइटम खाऊँगा उसी की Planning में जीवन का The End हो जाता है। परन्तु Planning पूरी भी नहीं हो पाती। अंत समय के आने पर आकुलित होता है परन्तु कोई रक्षक नहीं क्योंकि जो आये है वह नियम से जायेगा। परन्तु जिसने शरीर में ही आत्म कल्पना कर रखी है वह शरीर को नहीं छोड़ना चाहता। मैंने महाराज से पूछा -जीव कब से संसार में भटक रहा है? उत्तर मिला अनादि से। अर्थात् कोई प्रारंभनहीं। क्यों भटक रहा है? दृष्टि को समीचीन न बना पाने के कारण। खाना-पीना, सोना जीवन जीना, पूरा हुआ तो पर्याय पलटना यह चक्र चलता रहता है। परन्तु जब दृष्टि समीचीन होती श्रद्धा जागृत होती है तो अनंत संसार का अंत भी होता है। श्रद्धा दो प्रकार से जगती है। (1) स्वभाव से (2) गुरु के उपदेश से। आचार्य भगवन् उमास्वामी महाराज कहते है अ. 1 सू.

तन्निसर्गादधिगमाद्वा’ (1) निसर्गज (2) अधिगमज – निसर्गज भी किसी अपेक्षा से अधिगमज है। क्योंकि देशना लब्धि कारण है। मैंने पुनः पूछा गुरुदेव ! उस सम्यक् श्रद्धा को प्राप्त कैसे करे? गुरुदेव ने कहा पुरुषार्थ करो! क्या पुरुषार्थ करूँ? गुरु जी बोले- गुरुओं का प्रवचन सुनो, सेवा, भक्ति करो स्वाध्याय पढ़ो। जिनदेव का दर्शन करो। ये निमित्त है जो सम्यग्दर्शन में हेतु बनते है। एक सज्जन आये बोल – महाराज ! नींद आती है। यहाँ प्रवचन शुरु वहाँ नींद शुरु। मैंने कहा कभी तो खुलेगी, 1 शब्द भी कान में पड़ेगा तो देशना लब्धि का काम करेगा और देशना लब्धि सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति में हेतु बनती है। इसलिये प्रवचन जरुर सुनो। गुरु की देशना कभी भी व्यर्थ नहीं जाती।

‘देशना’ जैन दर्शन का 1 अंक है। श्रद्धा, विश्वास, आस्था अंक है। ज्ञान Zero है, चारित्र Zero है, व्रत, नियम, संयम भी Zero है। संगति का बड़ा प्रभाव है। जब ये सारे Zero एक Hero की संगति करते है तो सारे Zero भी Hero बन जाते है। पहले ज्ञान के Zero ने सम्यग्दर्शन Hero से दोस्ती की तो कीमत 10 दस गुनी हो गई। चारित्र के Zero ने दो दोस्तों की संगति की तो 1000 गुना कीमत हो गयी। व्रत, नियम, संयम के तीन Zero भी मिल गये तो कीमत 1000000 दस लाख की हो गई।

‘दंसण मूलो धम्मो’ धर्म की जड़ सम्यग्दर्शन है। जिसने जड़ को पकड़ लिया तो वृक्ष स्वयं मिल जायेगा।

धर्म वृक्ष की जड़, नींव का पत्थर, विकास के पथ को जो पा लेता है। वह पार हो जाता है सम्यग्दर्शन रुपी जड़, ज्ञान, चारित्र के ताने बाने को सम्हालने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हम भी ऐसी ही दृष्टि की संरचना करेंगे तो हमारा जीवन सफल हो जायेगा। सम्यग्दृष्टि परमात्म अर्चना कर जीवन को सफल बना लेते है। अतः दृष्टि पर दृष्टि रखों। दृष्टि बदल गई तो सृष्टि स्वयं बदली नजर आयेगी। यदि दृष्टि समीचीन हो गई तो सारी सृष्टि ही बदल जायेगी और आपका जीव भी बदल जायेगा। अतः दृष्टि बदल, सृष्टि को बदल दो।

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