तीव्र गति से हो रहे तथाकथित विकास तथा नश्वर भौतिक संसाधनों को प्राप्त करने की अभीप्सा ने, आत्मीय रिश्तों से अधिक अर्थ को प्रधानता देकर, आज संतानों को अपने दायित्वबोध से दूर कर दिया है।
इसी कारण आज कमोबेश प्रत्येक घर में बुजुर्ग माता-पिता उपेक्षा की कलियुगी आँधी में जीवन जीने को विवश हैं।
जिन बेटा-बेटी को माता-पिता जन्म से लेकर अपने पैरों पर खड़ा होने तक श्रमसाध्य, धर्माधारित और आध्यात्मिक प्रयासों से सँवारते हैं तथा अंततः अपनी विरासत का अधिकार भी सौंप देते हैं, उसी संतान के मुख से यह सुनने को मिलता है—
“पापाजी मेरे पास रहते हैं, मैं उन्हें खाना खिलाता हूँ।”
यह उसके पराकाष्ठित अहंकार का तुष्टीकरण मात्र है।
माता-पिता केवल देह नहीं हैं, जो मृत्यु के बाद समाप्त हो जाएँ। वे एक तत्व हैं, जो मृत्यु के पश्चात भी अपनी संतान के मध्य अपने विचारों, संस्कारों और त्याग के रूप में सदैव विद्यमान रहते हैं। हमारे शास्त्रों में उन्हें ईश्वरतुल्य मानकर आजीवन उनके चरणों की सेवा का संस्कार वर्णित है—
मातृ देवो भवः।
पितृ देवो भवः।
मंदिर की मूर्ति बोलती नहीं है, किंतु घर में विराजमान माता-पिता जीवंत भगवान हैं।
“जिसको नहीं देखा हमने कभी,
पर उसकी ज़रूरत क्या होगी।
हे माँ! तेरी सूरत से अलग
भगवान की मूरत क्या होगी।”
आज हम अपने बच्चों के लिए घर में दुनियाभर की सुविधाओं का अंबार लगा देते हैं, ताकि उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा न हो। और ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि जब ईश्वर ने हमें सामर्थ्य दी है और माता-पिता ने आशीर्वाद दिया है, तो अपने बच्चों के लिए अपेक्षित हर प्रयास करना हमारा कर्तव्य है।
लेकिन जब माता-पिता के जीवन में सुविधाओं की बात आती है, तब उन्हें अक्सर अकेले उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है, अथवा ऐसे निर्जन स्थान पर रख दिया जाता है जहाँ उन्हें परिवार का कोई सदस्य आता-जाता दिखाई नहीं देता।
दवाई दिलवा देना या रोटी खिला देना मात्र ही सेवा नहीं है।
उनका प्रत्येक दर्द अपना दर्द समझना, उनके मन की बात जानना, वृद्धावस्था में उत्पन्न उनकी छोटी-छोटी अभिलाषाओं को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
माता-पिता तभी खुलकर अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं, जब हम उनके पास बैठकर धैर्यपूर्वक बातें करते हैं, उनके मन को सुनते हैं और उनकी इच्छाओं को जानने का प्रयास करते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि सेवाकार्य बड़े पुण्यों से प्राप्त होता है। हमारे पास माता-पिता हैं, अकूत धन-दौलत है, अचल संपत्ति है, फिर भी अनेक लोग इस पुनीत सेवा-कार्य से वंचित रह जाते हैं।
एक बार अवश्य विचार करें—
हमसे कहाँ चूक हो गई?
हम सेवा जैसा सत्कर्म क्यों नहीं कर पाए?
हमने अपने माता-पिता को अकेले जीवन जीने के लिए क्यों छोड़ रखा है?
यदि वे हमारे पास हैं भी, तो क्या हम उनकी न्यूनतम आवश्यकताओं का पर्याप्त ध्यान रखते हैं?
क्या हमने उन्हें वे सुविधाएँ उपलब्ध करवाई हैं जिनकी उन्हें आवश्यकता है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
हम प्रतिदिन कितना समय उनके पास बैठकर उनसे बात करते हैं?
अपना दायित्वबोध समझना और फिर उसे पूर्ण करना ही वास्तविक कर्तव्य है।
विरासत का विकास तभी संभव है जब हम अपनी विरासत को सँवारें और उसके प्रति सम्मान अपने हृदय में संजोए रखें।
इस सेवा-कार्य और कर्तव्यपालन के अनगिनत लाभ हैं—
हमारे बच्चे हमसे सीखेंगे और वही संस्कार अपने जीवन में उतारेंगे।
ईश्वर हमसे प्रसन्न होगा।
ईश्वर-भक्ति के लिए अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं रहेगी।
माता-पिता की वाणी से हमें आशीर्वाद मिलेगा और उनकी आत्मा को तृप्ति प्राप्त होगी।
हमारा भविष्य उज्ज्वल बनेगा।
हमारे घर के संस्कारों की सुगंध दूर-दूर तक पहुँचेगी।
हमारी सेवा दूसरों के लिए उदाहरण बनेगी।
हमें आत्मसंतोष प्राप्त होगा कि “मैंने अपने दायित्व को पूर्ण जिम्मेदारी के साथ निभाया।”
समाज भी हमें सम्मान की दृष्टि से देखेगा।
घर में कलियुग के कुप्रभाव अपनी छाया नहीं डाल पाएँगे।
हमारे बच्चे गर्व से कहेंगे—
“मेरे पिताजी ने दादाजी का बहुत ध्यान रखा।”
ध्यान रखें— हमारे बच्चे हमारे आचरण को देखकर सीखते हैं, उपदेश से नहीं।
आज यह सब लिखने की प्रेरणा मुझे ईश्वर से प्राप्त हुई है।
ये शब्द मेरे इष्टदेव को समर्पित हैं।
सादर। 🙏
पवन कुमार जैन परवेणी
जयपुर