आत्मा की संपूर्ण परिग्रहों से रहित अवस्था ही उपादेय है वही हमारा वास्तविक स्वरुप है। परिग्रह क्या है? तो आचार्यों ने मूर्च्छा भाव को परिग्रह कहा है। मूर्च्छा का अर्थ है चेतन व अचेतन पदार्थों के रक्षण, अर्जन, संवर्धन हेतु चिंता व मोह (राग) भाव को मूर्च्छा कहते है।
अंतरंग में मूर्च्छा है तो वस्तु को ग्रहण करने का भाव नियम से पाया ही जायेगा। श्वेताम्बरों का कहना है कि हम वस्त्रो को ग्रहण तो करते है परन्तु हमारे मूर्च्छा नहीं है तो यह तो त्रिकाल में संभव नहीं। जहाँ रागांश का अभाव है वहाँ वस्त्र ग्रहण हो नहीं सकता। गिरनार जी की घटना है हम लोग वहाँ विराजमान थे। श्वेताम्बरों ने तर्क दिया कि हमारे वस्त्र तो है पर मूर्च्छा भाव नहीं है इसलिये हमारा अपरिग्रह महाव्रत है मैंने Practical का सहारा लिया उन साधु का दुपट्टा पकड़ा और फाड़ना चाहा तो बोले अरे! ये क्या करते हो? मैंने कहा अब कहिये मूर्च्छा भाव है या नहीं। वे बड़े शर्मिन्दित हुए। महाराज आपने तो मूर्च्छा भाव को Practical से दिखा दिया।
कहने का तात्पर्य यह है कि परिग्रह हो और मूर्च्छा न हो यह संभव नहीं। यदि वस्त्र है तो धोने का भाव होता है क्योंकि मैला हो गया है। वस्त्रों के फटने की चिन्ता है। यही मूर्च्छा भाव है। जितना अधिक परिग्रह होगा उतना ही Tension बढ़ता जायेगा। क्योंकि उसको संभालने की चिंता है। यदि अपने तनाव को कम करना चाहते है तो परिग्रह का प्रमाण कर लेना चाहिए। परिग्रह के प्रमाण से अनेक लाभ है (1) अनावश्यक कर्मास्रव, बंध से बचते है। (2) तनाव से मुक्ति मिलती है। (3) और व्यक्ति अपने आप में हल्कापन महसूस करता है।
आज जिसने परिग्रह का प्रमाण बनाया है वही आगे चलकर सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग कर सकता है। यह मेरा यह मेरा ‘इद मेंद इति संकल्पम्‘ यह भाव संकल्प कहलाते है और परिग्रह के होने पर ही संकल्प उत्पन्न होता है। जिसकेपास परिग्रह नहीं होता वहाँ संकल्प विकल्प नहीं है। परिग्रह के रुप (1) बाह्य परिग्रह है परन्तु ममत्व भाव नहीं है परिग्रह ही है। (2) बाह्य पदार्थ नहीं है परन्तु मूर्च्छा है- परिग्रह ही है। अब प्रश्न यह है कि यदि संग्रह का नाम ही परिग्रह है तो ज्ञानादि के संग्रह का भाव भी परिग्रह होना चाहिए। नहीं, जो रत्नत्रय धारी अप्रमत्त भाव से सहित मुनि है उनके मूर्च्छा न होने से अपरिग्रहवान है।
बुद्धि पूर्वक संकल्प-विकल्पों का त्याग अपरिग्रह है, इदमेंद, अहमेंद भाव परिग्रह है। 24 प्रकार के परिग्रह त्यागी मुनि अपरिग्रही हैं आगम के अनुसार। परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से संकल्प-विकल्पों के त्याग हो जाने पर अपरिग्रह पन होता है जो कि 7वें गुणस्थान में संभव है। सातवें अप्रमात्त गुणस्थानवर्ती जीवों का ज्ञान, दर्शन आदि गुण उपादेय है, स्वरुप स्वभाव दशा में है। अतः ज्ञान, दर्शन, के संग्रह होने पर भी वे अपरिग्रही है। “परिग्रह ही संपूर्ण दोषों का मूल है।”
अपरिग्रह की विशेषता मुनिजन निःसंग होते है। क्योंकि परिग्रह नहीं है। परिग्रह से रहित होने के कारण पवन की तरह हल्के होते है। परिग्रह भार है। जो परिग्रह रुपी ग्रह के चक्कर में फंस जाते है वे भारी हो जाते है और भारी वस्तु नियम से नीचे की ओर जाती है। इसीलिए कहा जाता है “परिग्रह आत्मा का पतन करता है” परिग्रह रखने से मूर्च्छा भाव होता है और मूर्च्छा भाव हिंसा आदि संपूर्ण पापों का हेतु बन जाता है। परिग्रह है तो उसके अर्जन, रक्षण में सावद्य हिंसा होगी है। यदि हम अपना सामान किसी को नहीं देना चाहते दूसरा मांग रहा है तो व्यक्ति झूठ बोलता है कि मेरे पास नहीं है परिग्रह में अतिमूर्च्छा है तो दूसरे की सुन्दर वस्तु देख मन ललचा जाता है और फिर कदम चोरी की ओर बढ़ते है। परिग्रह है तो पारस्परिक लेने-देन हो सकता है और वही परिग्रह दुर्गति का हेतु बनता है इस प्रकार एक पाप में सभी पाप समाहित है और वह दुर्गति का हेतु बनता है।