चक्षुइन्द्रिय के वशीभूत, सुवेग चोर
मद्दिल नाम के नगर में भर्तृमित्र नाम का एक सेठ पुत्र रहता था । उसकी पत्नि का नाम देवदत्ता था। वसंत ऋतु का समय था। सेठ भर्तृमित्र अपने अनेक मित्रों के साथ वसन्तोत्सव के लिए वन में गया। वहाँ पर वसंतसेन नाम के मित्र ने बाण द्वारा आम्र मंजरी को तोड़कर अपनी पत्नि को कर्णाभूषण पहनाये । उसे देखकर देवदत्ता ने पति भर्तृमित्र से कहा हे प्राणनाथ! “आप भी बाण द्वारा मंजरी तोड़कर मुझे दीजिये ” भर्तृमित्र को बाणविद्या नहीं आती थी अतः वह उसे मंजरी नहीं दे सका, उसे बहुत लज्जा आयी भर्तृमित्र ने मन में निश्चय किया कि मुझे भी बाण विद्या अवश्य सीखनी है। मेघपुर नाम के नगर में धनुर्विद्या का ज्ञाता एक पंडित रहता था। उसके पास जाकर भर्तृमित्र ने बहुत से रत्न देकर तथा उसकी सेवा करके बाण विद्या में अत्यन्त निपुणता प्राप्त की। पुनश्च उस नगर के राजा की कन्या मेघमाला को चंद्रकवेध प्रण में जीतकर उसके साथ विवाह किया। दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। एक दिन भर्तृमित्र के घर से समाचार आया तो वह जाने के लिये उत्सुक हो गया और राजा से आज्ञा लेकर घर की ओर प्रस्थान किया। राज-वैभव के साथ रथ में सवार हो मेघमाला एवं भर्तृमित्र मद्दिल नगर की ओर जा रहे थे। रास्ते में वन में भीलों की पल्ली आई। वन में आगत पथिकों को लूटना ही उन भीलों का काम था । उनका सुवेग नामक सरदार था। सुवेग मेघमाला का मनोहर रूप देखकर मोहित हुआ और उसका अपहरण करने के लिए वह भर्तृमित्र से लड़ने लगा । मेघमाला उसका मन युद्ध से विचलित करने के लिए उसकी तरफ जाने लगी। सुवेग उसके रूप को देखने लगा। इतने में भर्तृमित्र ने बाण द्वारा उसके दोनों नेत्र नष्ट कर दिये, सुवेग घायल हो गया और मृत्यु को प्राप्त हुआ । तब भर्तृमित्र मेघमाला के साथ निर्विघ्न रूप से अपने नगर में पहुँच गया। इस प्रकार सुवेग नेत्रेन्द्रिय के विषय में आसक्त होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।
कर्णेन्द्रिय के वशीभूत गन्धर्वदत्ता
पाटली पुत्र नरेश की गन्धर्वदत्ता नाम की स्त्री थी उसकी अनिद्य सुन्दरी नाम की राजकन्या थी। वह गान-विद्या में महानिपुण थी। उसने यह प्रतिज्ञा की कि जो मुझे गायन कला में जीतेगा, मैं उसे वरूँगी । बहुत से राजकुमार उसकी सुन्दरता से आकृष्ट होकर आये, किन्तु कोई उस कन्या को जीत नहीं सका। एक दिन बहुत दूर देश से गान विद्या का एक पंचाल नाम का संगीताचार्य अपने पाँच सौ शिष्यों के साथ उस नगरी में आया। राजकन्या की प्रतिज्ञा से वह परिचित हुआ। उसने राजा से कहा कि आपकी कन्या गान-विद्या में चतुर है, मैं भी इस विद्या से परिचित हूँ। मैं आपकी पुत्री का गीत-संगीत सुनने का इच्छुक हूँ। इस तरह की युक्ति से उसने गन्धर्वदत्ता के महल के पास अपना निवास स्थान प्राप्त किया। मध्य रात्रि के अनन्तर शान्त वातावरण में वीणा की झंकार के साथ उसने सुमधुर गान प्रारम्भ किया। गन्धर्वदत्ता गहरी नींद में सो रही थी, धीरे-धीरे उसके कर्ण-प्रदेश में संगीत की लहरियाँ पहुँची, वह सहसा उठी। संगीत की ध्वनि ने उसको ऐसा आकृष्ट किया कि वह बेभान हो, जिधर से वह मधुर शब्द आ रहा था, उधर दौड़कर जाने लगी। उसका पैर चूक जाने से महल से गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुई। इस प्रकार कर्ण इन्द्रिय के वश होकर उसने अपने प्राण गवाँ दिये।