राग द्वेष कर्म के बीज है। जीव के संसार में परिभ्रमण का कारण राग द्वेष हैं ।
रोग (राग) के लिए बारह भावनाए उपचार है। भावना योग से आत्मा शुद्ध हो जाती है। हमे अपने आपको बारह भावनाओं से भावित करना है।
आत्मा तत्व नित्य है। शरीर अनित्य है। पर जीव उसे नित्य मानता है।
परिवार अनित्य है। संसार अनित्य है।
” अनित्याणी शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ”
अनित्य भावना महत्वपूर्ण है, यह मोक्ष में ले जाने वाली है। यह भावना समकित तक ले जायेगी।
अनित्य असत्य है, नित्य सत्य है।
भावित करना – आत्मा को भावित करना है। भावनाओं में पुरजोरता होती है निरन्तरता होती है। बार बार विचार करके भावनाओं को बनाना है।
व्यक्ति ना समझी को समझदारी मान लेता है।
एकत्व भावन
अन्यत्व भावना
सारे दुखों का कारण है एकत्व भाव का अभाव
एकत्व भावना- मैं आत्मा हूँ। यह सकारात्मक रुप है।
अन्यत्व भावना – “मैं शरीर नहीं हूँ। यह नकारात्मक रूप है।
विस्मृति का नाम प्रमाद है।
दया से ऊपर वीतरागता है।
परदया – स्वदया
अपने आपको आत्म भाव में भावित करना एकत्व भावना होती है।.
भगवान महावीर का प्रेम सभी से है, किन्तु मोह किसी से भी नहीं।
कर्म-
जीव अनादि काल से कर्मों से जुड़ा हुआ है। और अनादिकाल से जीव कर्मों की निर्जरा करने मे लगा हुआ है।
निर्जरा भावना – 8- कर्म होते है।
जीव अनादि काल से कर्म बन्ध करता है।
समान जाति के पुदगलो के समूह को वरगणा कहते हैं।
मोह व अज्ञान झूठ बोलने के कारण है। छदमस्थ अवस्था में झूठ बुलता है। आत्म विशुद्धि के लिए जिनवाणी है।
दूसरों के समझाने के लिए विद्वता चाहिए। खुद को समझाने के लिए सरलता चाहिए।
मन से ही कर्म बन्धन होता है। और मन से ही सम्यक दर्शन होता है। कर्म निर्जरा मन से ही होगी।
मन दो तरह के होते है-
1- द्रव्य मन 2. भाव मन
१२ गुणस्थान तक भाव मन होता है।
हर समय हर जीव के आठ कर्मों की निर्जरा हो रही है। विभाव आत्मा के साथ रह ही नहीं सकता है।
निर्जरा उदयपूर्वक ही होती है। दो तरह की निर्जरा होती है-
1. अकाम 2 सकाम
. 1.अकाम निर्जरा – बिना इच्छा के, यह मिथ्यादृष्टी के होती है।
2. सकाम निर्जरा- यह सम्यकदृष्टी के होती है।
आंशिक रूप से कर्मों का क्षय होना निर्जरा है।
कर्म बांधना आत्मा का विभाव है।
कर्म बन्ध 5 कारणों से होता है-
1- मिथ्यात्व 2- अवृत 3- प्रमाद 4- कषाय 5 – योग
सबसे अधिक कर्म बन्धन मिथ्यात्व के 90000, अव्रत के 9000, प्रमाद के 900, कषाय के 90 व योग के 9 होते हैं।
भेद विज्ञान – शरीर अलग है, आत्मा अलग है। कर्म को अपना नहीं मानना सकाम निर्जरा है।
प्रज्ञा से विवेक करें –
कर्म को अपना मानने से कर्म बंधन होता है। पाप को आत्मा से अलग समझना प्रायश्चित है। विनय है।
अपनी आत्मा ही अपनी है बाकि सब-कुछ पराया है।
बोधि दुर्लभ भावना –
संसार में बोधि का मिलना दुर्लभ है। हम खुद होते हुए भी खुद को देख नहीं पाये, अपनी आत्मा को पहचान नहीं पाये । खुद का स्वरूप प्राप्त नहीं हो पाया।
समकित प्राप्त करना है तो हमें मोह माया को छोड़ना पडेगा।
18 पापों को छोड़ेंगे तो आत्मा हल्की होगी तब मोक्ष में जा सकेगें।.
बोधी का मतलब सबसे पहले अपने आप को पहचानना । वैराग्य बढ़े, गुरु भगवन्तों के प्रति भक्ति बढे।कर्म को अपना मानना मिथ्यात्व है।
मनुष्य सांसारिक प्राणी है। वीतरागता से जीना बहुत कठिन है।
4 भावना-
1- मैत्री भावना 2- प्रमोद भावना
3-कारुण्य भावना 4-माध्यस्थ भावना ।
दया मोक्ष का द्वार है। अनुकम्पा सम्यक दर्शन में सहायक होती है। हमारे जीवन में दया व करुणा के भाव होने चाहिए। अंहिसा महानदी के समान है सम्यक दृष्टी का सभी जीवों के प्रति वात्सल्य होता है। माध्यस्थ भावना – मध्यस्थ भाव (तटस्थ ) बीच में रहता है।
उपरोक्त चारों भावनाओ से हमें भावित करना है। राग देष घटेगें, वीतरागता बढ़ेगी। मुक्ति की ओर बढ़ेंगे।
—श्रद्देय श्री यशवन्त मुनि जी म०स० के प्रवचन से-
श्रीचन्द जैन, जयपुर
पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री
अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा