उदारवादी अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी सोच ने भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों में स्पष्ट प्रतिबन्ध के उल्लेख के बावजूद गोमांस पर से प्रतिबन्ध हटाने की योजना बनानी शुरू कर दी है। इसलिए यह विचारणीय विषय हो गया है क्योंकि श्री वी. के. तनेजा की अध्यक्षता में बनाये गये कार्यदल ने गोमांस के निर्यात किये जाने की संस्तुति कर दी हैं ।
तीर्थकरों की धरा पर जीव हिंसा को सरकारी संरक्षण जैन दर्शन जैन धर्म की आस्थाओं को नष्ट-भ्रष्ट किये जाने का योजनागत प्रयास है और सम्पूर्ण जैन समाज इसे मूक दृष्टा की भांति असहाय निरीह भाव से देखकर भी अनदेखा कर रहा है।
अफसोस होता है जब एक जैन दूसरे जैन को मोबाइल पर संदेश भेजता है कि देश का सबसे अधिक आयकर जैनों द्वारा दिया जाता है, देश की सर्वाधिक शिक्षण संस्थायें जैन समाज द्वारा निर्मित और संचालित की जाती है, सबसे ज्यादा मन्दिरों का निर्माण जैनों द्वारा कराया गया है एवं इस देश के विकास में जैन मतावल्वियों का योगदान अन्य समाजों की अपेक्षा अधिक है। फिर भी उस धर्म के अनुयायियों की भावनाओं को निरन्तर आहत किया जाना इस धर्म के मानने वालों की अस्मिता पर प्रश्न चिन्ह भी लगाता है।
विचारणीय विषय है कि देश में जैन समाज की आवाज को क्यों नकारा जाता है। आपके समझ में आ जायेगा कि जैन दर्शन जिसे जैन धर्म कहा जाता है जिसने एक वैज्ञानिक जीवन पद्धति का विकास किया उसके मानने वाले आज कितने भागों में विभाजित है इसे भी सारी दुनिया जानती है। यह विभाजन दिन – प्रतिदिन और बढ़ रहा है। अभी तक यह दिगम्बर श्वेताम्बर, मन्दिर मार्गी, स्थानकवासी, तेरहपंथी, बीसपंथी आदि नामों से विभाजित था और अब यह विभाजन मंचो में बदलता दिखाई दे रहा है।
वैश्विक पटल पर यदि गहरी नजर डाले तो आप देखेंगे की जितने अल्प संख्यक मतावलम्बी है वह बहुसंख्यको की अपेक्षा ज्यादा संगठित रहते है । परन्तु जैन धर्मावलम्बियों में बिल्कुल उल्टा दृश्य नजर आ रहा है। वे अब दिन-प्रतिदिन विघटन की स्थिति में आते जा रहे है। धार्मिक आचरण और उनके मूल्य अब प्रदर्शन का विषय बनता नजर आ रहा है और वास्तविक जीवन में जैन धर्म के मूल्यों का ह्रास हो रहा है।
यह कोई उपदेश नहीं वरन् सच्चाई है कि हम अपनी जीवनचर्या में अनेक बार यह जान ही नहीं पाते कि हमारे अन्तस का काम, क्रोध, मद, लोभ कब जाग्रत हुआ, वास्तव में वह हमारा नहीं है बल्कि किसी और के द्वारा फेंका हुआ है। इसे कहते है विचारों का संक्रमण । अब तो विज्ञान भी स्वीकार करता है कि किसी और का थ्रो आपके भीतर पेस्ट हो रहा है और आप तदनुरूप रिएक्ट कर रहे हैं। साधारण सी बात है, कहा जाता है कि गाड़ी चलाते हुए ड्राईवर के पास बैठी हुई सवारी को सोना नहीं चाहिये, क्योंकि पड़ौसी के आलस्य से उसकी निन्द्रा निश्चित ही संक्रमित होगी और यह संक्रमण बाहर ही नहीं होता बल्कि भीतर तक प्रभाव छोड़ता है। जैन धर्म में भगवान महावीर ने कहा है कि अज्ञानी से दूर रहना और ज्ञानी के पास रहना मंगलकारी है । जिसकी चेतना बीमार हो उसका सानिध्य अमंगलकारी होगा और जो जाग्रत है, प्रसन्न है उसकी मौजूदगी मंगलकारी होगी। सामाजिक संगठनों को निरन्तर इस पर चिन्तन करते हुए संगठनों में पनपती विकृतियों पर कठोरता से प्रहार करते रहना होगा ताकि सामाजिक संगठनों की सार्थकता बनी रहे।
रमेश चन्द पल्लीवाल
सम्पादक