श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

असाधु को साधु मानना मिथ्यात्व है ?

एक भड़भूजा दिल्ली में रहता था। एक बार वह अपने गांव गया। वहाँ उसके एक मित्र ने उससे पूछा- ‘तुम दिल्ली में क्या करते हो?’ भड़भूजा ने उत्तर दिया ‘वहां भी में भाड़ भूँजता हूँ।’ इस पर मित्र ने कहा- भाई। अगर दिल्ली जाकर भी भाड़ ही भूजना था तो यह हमारा गांव ही क्या बुरा था? भड़भूजा ने स्पष्ट किया गांव में इतने पैसे कैसे पाता? दिल्ली में अच्छी आमदनी है। पैसे होने के कारण अब गाँव में मेरी इज्जत भी बढ़ गई है।

भड़भूजा जैसे ही कुछ-कुछ स्थिति हमारे कतिपय साधुओं की हो गई है। यदि उन्हें दौलत व शौहरत के पीछे ही भागना था तो घर-गृहस्थी में ही क्या बुरा था? लेकिन इसका सीधा सा उत्तर है- घर में रहते हुए न तो श्रेष्ठि लोग इतने पैसे उनके नाम पर खर्च करते और न ही उनका इतना नाम होता। घर में रहते हुए कोई युवक यह सोच भी नहीं सकता कि कोई समाज उसके कहने पर पांच हजार रुपये खर्च कर देगा। साधु बनने के बाद पांच लाख रुपये भी कुछ नहीं हैं। खूब मेहनत करने के बाद भी कम वय में कोई उतना नाम नहीं कमा पाता जितना साधु बनने के बाद नाम कमाता है। चाहे वह व्यक्ति कितना ही होशियार, सयाना तथा विद्वान् क्यों न हो? अतः दौलत व शौहरत कमाने का एक अचूक शार्टकट साधन है- साधु बन जाना है। इतना अवश्य है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। सो दौलत व शौहरत पाने के लिए कपड़े भी छोड़ने पड़ते हैं। तथा खाना भी एक बार लेना होता है।
यहाँ कुछ प्रश्न उठते हैं जो साधु दौलत व शौहरत के पीछे भाग रहा हो, क्या वह वाकई में साधु है? क्या किसी साधु की जांच परख की जा सकती है? आखिर हम साधु किसे कहें? जब इन प्रश्नों को आम लोगों के बीच रखते हैं तो कई लोग यह कहते मिल जाते हैं कि ‘इन प्रश्नों से हमें क्या लेना देना। हम तो वेष की पूजा करते हैं। वैसे भी हम इतने योग्य कहाँ कि उनकी जांच परख कर सकें।’ कोई भी व्यक्ति यह कहकर आत्म संतोष कर सकता है, लेकिन वह स्वयं को धोखा दे रहा है तथा सम्यक्दृष्टि की श्रेणी में नहीं आ सकता। ध्यान रहे, जिस प्रकार साधु को असाधु मानने में मिध्यात्व है, उसी प्रकार असाधु को साधु मानना भी मिथ्यात्व है। इसलिये यदि आप आत्म कल्याण चाहते हैं तो यह जानना आवश्यक है कि कहीं हम असाधु (कुगुरु) को साधु (गुरु) तो नहीं मान रहे हैं?

‘छहढ़ाला’ की दूसरी ढ़ाल में प० दौलत राम जी ने कुगुरुओं के बारे में लिखा है कि कुगुरू पत्थर की नाव के समान होते हैं। जो स्वयं तो संसार रुपी समुद्र में डूबेंगे ही, साथ में अपने शिष्यों तथा अनुयायियों को भी डुबोयेंगे। उन्होंने ऐसे कुगुरूओं पर श्रद्धा न रखने को कहा है क्योंकि इससे मिथ्यात्व का पोषण होता है। प० दौलतराम जी ने कुगुरुओं का वर्णन क्यों किया? इसका आशय दूसरी ढ़ाल के प्रारम्भ में ही व्यक्त कर दिया। उनका मानना है कि जब तक मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्या चरित्र को जानेंगे नहीं तो उसे छोड़ेंगे कैसे? अतः सम्यक् दृष्टि के लिए यह आवश्यक है कि वह साधु को साधु समझे तथा असाधु को असाधु ।

अब प्रश्न यह है कि हम साधु की जांच परख कैसे करें? इसके लिये यदि हम मोटी-मोटी बातों पर भी गौर करें तो समझ में आ जायेगा कि कौन साधु है तथा कौन असाधु या कुसाधु । नीचे कुछ बिंदु प्रस्तुत हैं, जो इन कार्यों में संलग्न हैं उन्हें साधु नहीं माना जाना चाहिये –
(1) जो शील- शैथिल्य का दोषी हो। शील-शैथिल्य में साधु भेष में रहते हुए किसी महिला साध्वी या ब्रम्हचारिणी के साथ एक कमरे में ठहरना, उनसे यौन संबंध रखना, युवतियों से लगाव होना, युवतियों के नंगे चित्र रखना या खींचना, प्रेम-पत्र लिखना आदि सब कुछ शामिल हैं।

(2) जो आज के वैज्ञानिक युग में भी समाज को अंधविश्वास की ओर ले जाने का कार्य करे। इसमें जादू-टोना, भूत-प्रेत, तंत्र-यंत्र तथा चमत्कार आदि दिखाने जैसे कार्य करना सम्मिलित हैं।

(3) जो ईंट-पत्थर आदि से सम्बन्धित कार्यों के लिये पैसा इकट्ठा करें या समाज को इसके लिए प्रेरित करे। इसमें करोड़ों रुपये की लागत से नये मन्दिरों, नये तीर्थों का निर्माण आदि सम्मिलित है। इन कार्यों में अनावश्यक जीव हिंसा होती है तथा पर्यावरण भी प्रभावित होता है।

(4) जो अपने नाम के प्रचार के लिये बड़े-बड़े (खर्चीले) अनुष्ठान या आयोजन करवाने में लिप्त रहे। जो उपाधियों और पदवियों का भूखा हो, जो समाचार पत्रों में छाया रहना चाहता हो तथा जो अपने नाम कमाने के लिये अपने गुरु का सानिध्य छोड़कर स्वतंत्र विचरण करता हो।

(5) जो अपने पास टेलीफोन, मोबाइल एवं टी०वी० रखता हो ।

(6) जो अपने प्रशंसकों को तो अपने इर्द-गर्द इकट्ठा करे तथा अपने आलोचकों का समाज से बहिष्कार करने, उन्हें पिटवाने के लिये समाज को प्रेरित करे।

(7) जो भाषा समिति का पालन न करें, जो यह सोचे कि साधु बनने के बाद उसे किसी से कुछ भी कहने की छूट है।

इनके अतिरिक्त और भी कई बिंदु हो सकते हैं। सुधी लोग इन्हें आसानी से समझ सकते हैं। शील- शैथिल्य के सम्बन्ध में एक बात और स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। कुछ लोग कह सकते हैं कि किसी को भी बदनाम करने के लिये उसके सिर पर यह दोष मढ़ा जा सकता है। मैं इस बात से पूर्ण रूप से असहमत नहीं हूँ। लेकिन एक बात यह भी विचारणीय है कि धुँआ वहीं होता है जहाँ आग होती है। वैसे भी साधु लोग ऐसी स्थिति ही क्यों पैदा होने देते हैं जिससे उनके शील-शैथिल्य की बात बने। दूसरी बात यह है कि यदि किसी सीधु पर शील-शैथिल्य का आरोप कोई लगा देता है, चाहे वह गलत ही क्यों न हो, तो साधु का कर्तव्य है कि वह लो प्रोफाइल में रहे तथा और अधिक कठिन साधना करे। लेकिन यहाँ देखने में विपरीत ही आता है। यदि किसी साधु पर यह दोषारोपण किया जाता है तो वह और अधिक अपना नाम कमाने के चक्कर में रहता है। मानो कि वह सोचता है कि बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा?

अब प्रश्न आता है कि साधु किसे कहें? ‘मेरी भावना’ में पं० जुगल किशोर जी ‘ मुख्तार ने बहुत सरल शब्दों में लिखा है जिनके विषय-भोगों की आशा नहीं है,  जो समता भाव रखते हैं, जो स्व और पर के कल्याण के लिए प्रति समय तत्पर रहते हैं तथा जो स्वार्थ-त्याग के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं, वे साधु हैं।’ साधु अपने प्रशंसकों एवं आलोचकों में कोई भेद नहीं रखता। संत कबीर तो आलोचकों को अपने नजदीक रखने का सुझाव देते हैं जिससे साधु अपनी गलती समझ सके तथा उसे दूर कर सके। साधु किसी चमत्कार या तत्र-मंत्र के चक्कर में नहीं पड़ता है और न ही साधु को भवन आदि निर्माण कराने का कोई विकल्प रहता है। साधु हमेशा हित-मित वचन बोलता है।

कुछ लोग सोचते हैं कि आजकल ऐसे साधु मिलते कहाँ हैं। लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ। आज भी ऐसे साधु मौजूद हैं लेकिन उनमें से अधिकतर साधुओं को लोग पहिचानते नहीं क्योंकि न तो वे किसी बड़े बैनर के तले हैं, न ही उनका कोई नाम है, न ही वे अनेक उपाधियों को धारण करते हैं, न ही वे किसी श्रेष्ठि को खर्च करने को कहते हैं, और न ही व्यर्थ की बातों में अपना समय नष्ट करते हैं।

अन्त में एक बात यह अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि यदि हमको हंस देखने को न मिले तो क्या हम कौवे को हंस मान सकते हैं? इसी प्रकार यदि हमको सच्चा साधु न मिले तो किसी असाधु या कुसाधु को साधु नहीं मान लेना चाहिए अन्यथा मिथ्यात्व का दोष लगेगा।

डॉ. अनिल कुमार जैन
D-197, मोती मार्ग, बापू नगर, जयपुर

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