श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

श्रद्धा की आँख में दिखते हैं परमात्मा

मनुष्य के पास दो आँखें हैं तीसरी आँख विरले ही प्राणियों को प्राप्त होती है। प्रायः संसार दो आँखों का ही प्रयोग करता है। पौद्गलिक पदार्थ ही इन चर्म चक्षुओं से दिखते हैं। चर्म चक्षुओं की शक्ति मात्र पुद्गल अर्थात् मूर्तिक को देखने की है। जहाँ भी नजर डालो मात्र मूर्तिक ही पदार्थ दिखते हैं। ऊपर देखों तो क्या दिखता है? आप कहेंगे- आकाश। परंतु वास्तव में ऊपर दिखने वाला आकाश नहीं अपितु गैसों का पिण्ड है। और हम उस नीले/आरामानी दिखने वाले पुद्गल के महास्कन्ध को आकाश कह देते हैं। परंतु वह आकाश नहीं। आकाश तो अरूपी है वह इन चर्म-चक्षुओं का विषय है ही नहीं। आकाश में ही छहों द्रव्यें रहती है आकाश अवगाहन देने का कार्य करता है ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ आकाश न हो। आँखों से दिखने वाले स्थूल पुद्गल भी होते हैं और आँखों से न दिख पाने वाले सूक्ष्म पुद्गल भी होते हैं। संपूर्ण लोकाकाश पुद्गल स्कन्धों व अणुओं से भरा हुआ है। यद्यपि सूक्ष्म स्कन्धों को हम दूरबीन, माइक्रोस्कोप से देखने का प्रयत्न करते हैं पर वह भी स्थूल ही है। सूक्ष्म तो कार्माण वर्गणा होती है। चर्म चक्षु से जो न दिखे उसे हम यंत्रों से देखते हैं पर वह भी है तो पुद्गल ही। क्योंकि आचायर्यों ने कहा है- रूपिणः पुद्गलाः। जिसका भी रूप, रस, गंध, स्पर्श, वर्ण है वह पुद्गल है और हमारी आँखें पुद्गल को ही देख पाती है। आप मंदिर जी आते हैं तो भगवान को देखते हैं परंतु वास्तव में दिखती तो प्रतिमा ही है। आँखें बंद करके भी जो परमात्मा दिख जाते हैं वे भी मूर्तिक ही है। कोई व्यक्ति साकार परमात्मा को मानते हैं तो कोई निराकार परमात्मा को। कोई मूर्ति पूजक होता है कोई मूर्ति पूजा को नहीं मानते। एक बार आचार्य विमलसागर जी जब गृहस्थावस्था में थे तब वे पंडित थे तब कई संप्रदाय के लोगों की संगोष्ठी में पंडित जी का जाना हुआ वहाँ आर्य समाज के लोग भी थे वे मूर्ति को नहीं मानते थे। इस विषय पर पंडित जी से दो शब्द बोलने कहा गया, पंडित जी ने कहा- निराकार परमात्मा को मानते हो, तो वे बोले हाँ तो पंडित जी बोले तो आप साकार को भी मानते हो। पूछा गया कैसे? पंडित जी ने उस संस्था के संस्थापक के फोटो को दिखाकर पूछा ये आपके संस्था संस्थापक है वे बोले हाँ। और धीरे से पंडित जी ने वह नीचे छोड़ दी। कांच फूटा, फोटो बिखर गई। लोगों को बड़ा बुरा लगा। पूछा- ऐसा अविनय क्यों किया पंडित जी बोले- अनादर के लिए क्षमा करें परंतु आपको बुरा तो लगा है। वे बोले- हाँ हाँ बुरा लगा है पंडित जी बोले- बस सिद्ध हो गया कि आप साकार को भी मानते है तभी तो बुरा लगा। वे नतमस्तक हो गये पंडित जी ठीक कह रहे हैं। इसलिए मूर्ति पूजनीय है क्योंकि वह मूर्तिमान का स्मरण कराती है। परंतु मूर्ति भी कौनसी पूजनीय है तो जो प्रतिष्ठित है। क्योंकि बिना प्रतिष्ठा की मूर्ति में अभी मूर्तिमान की स्थापना नहीं हुई। स्थापना होने के बाद मूर्ति में मूर्तिमान के दर्शन होने लगते हैं और दर्शन पा हम धन्य हो गये। हम दर्शन करते समय कहते हैं-

धन घड़ी यो धन दिवस यो ही धन जनम मेरो भयो। अब भाग मेरो उदय आयो दरस प्रभुजी के लखि लायो।

(दर्शन स्तुति)

दर्शन कर आनंदित वह होता है जिसका तीसरा नेत्र खुल गया हो। ‘मनु रेक चिंतामणी लयो।’ जैसे- भिखारी को चिंतामणी रत्न मिलने पर वह खुश हो जाता है वैसे ही सम्यग्दृष्टि भगवान के दरस पा खुश हो जाता है। अहो भाग्य! मेरे जो प्रभु का दर्शन पा लिया। प्रभु दर्शन, नींव का पत्थर है। वह पत्थर प्रायः माता-पिता रखते हैं। जिस दिन दर्शन हो जाए जीवन धन्य धन्य हो गया ऐसा सम्यग्दृष्टि मानता है। धार्मिक क्रियाओं में वह हर्षित होकर भाग लेता है। श्रद्धालु, परमात्मा का दर्शन कर अपना भाग्योदय मानता है। और उसका भाव सहित किया दर्शन पापों को नष्ट कर देता है- कहा गया है-

दर्शनं देव देवस्य दर्शन पाप नाशनम्।

दर्शनं स्वर्ग सोपानं दर्शनं मोक्ष साधनम् ।

दर्शन पाठ (1)
दर्शन से पाप नष्ट ही नहीं होते अपितु स्वर्ग का सोपान भी है वह परंपरा से मोक्ष का साधन भी है। क्योंकि सम्यग्दृष्टि मात्र देवायु का ही बंध करता है अन्य आयु का नहीं। इसलिए यदि आप अपना भला चाहते हैं तो अपना तृतीय नेत्र जो कि श्रद्धा व आस्था का नेत्र है उसे खोल लीजिए क्योंकि तृतीय नेत्र खुलते ही आत्म वैभव, आत्मनिधि, परमात्म दर्शन हो जाता है और आत्मा आत्म हित पथानुगामी हो जाती है।

आचार्यों ने सम्यग्दृष्टि के प्रति कहा है कि जिसकी परमार्थ के प्रति आस्था है उसी का नाम रूचि है। कुछ लोग कहते हैं मुझे दर्शन के बिना कुछ नहीं रूचता, दर्शन बिना आकुलता-व्याकुलता होने लगती है वही रूचि है। ऐसी रूचि तीसरे नेत्र के खुलने पर ही उत्पन्न होती है। अतः अपना तृतीय नेत्र खोलिए और मुक्ति पथ के पथिक बन जाइए।

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