श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

निर्जरा

गतांक से आगे –

निर्जरा का अर्थ

बद्ध कर्मों का आत्मा से अलग होना निर्जरा है।’ सात तत्त्वों में संवर तत्त्व के बाद इसका स्थान है। संवर के द्वारा कर्मों का आस्रव रुकता है; तो निर्जरा द्वारा पूर्व-बद्ध अर्थात् संचित कर्मों का क्षय होता है। जैसे जल के प्रवेश-द्वार को बन्द कर देने पर सूर्य के प्रखर ताप से तालाब स्थित जल धीरे-धीरे सूख जाता है, वैसे ही कर्मों के आस्रव को संवर द्वारा रोक देने पर तप आदि साधनों से आत्मा के साथ पहले बाँधे हुए कर्म धीरे-धीरे निःसत्व होते जाते हैं। इस दृष्टि से ‘निर्जरा’ का अर्थ हुआ ‘कर्म-वर्गणाओं का आंशिक रूप से आत्मा से छूटना।” आत्म-प्रदेशों से कर्मों का छूटना ही निर्जरा है। यह प्रक्रिया जब उत्कृष्टता को प्राप्त हो जाती है, तब आत्मा में लगे सम्पूर्ण कर्मों का विलगाव हो जाता है और आत्मा अपनी स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त कर लेता है। कर्मों का पूर्ण रूप से विलग होना ही मोक्ष है।

निर्जरा शुद्धता की प्राप्ति के मार्ग में सीढ़ियों के समान है। जैसे कदम-दर-कदम सीढ़ियों पर चढ़कर मंजिल पर पहुँचते हैं, वैसे ही क्रमशः निर्जरा करते हुए मोक्ष-अवस्था प्राप्त की जाती है।

निर्जरा के भेद

निर्जरा दो प्रकार की होती है- द्रव्य निर्जरा और भाव निर्जरा। आत्मा के जिस निजी (शुद्ध) परिणमन से कर्म-पुद्गल विलग होते/झड़ते हैं, उस परिणाम/भाव की प्रक्रिया को भाव निर्जरा कहते हैं। दूसरे शब्दों में, भाव निर्जरा से तात्पर्य आत्मा में होने वाली उस वैचारिक उज्ज्वलता से है जिससे कर्म-पुद्गल आत्म-प्रदेशों को छोड़ने के लिए बाध्य होते हैं। द्रव्य निर्जरा से तात्पर्य है कर्म पुद्गलों का आत्म-प्रदेशों से विलग होने की प्रक्रियाः जो कर्म फल भोगने के द्वारा अथवा कर्म-फल भोगने से पूर्व तप आदि के द्वारा सम्पादित होती है।’

इस प्रकार से द्रव्य निर्जरा दो प्रकार की हो जाती है। प्रथम सविपाक निर्जरा और द्वितीय अविपाक निर्जरा।

स्थिति के पूर्ण होने पर, कर्मों के सुख-दुःखात्मक फल देकर विलग होने को सविपाक निर्जरा कहते हैं। जैसे आम आदि फल पककर झड़ जाते हैं, वैसे ही यह निर्जरा केवल फलोन्मुख हुए कर्मों की होती है। इसे यथाकाल-निर्जरा भी कहते हैं।’ यह सभी संसारी जीवों के प्रतिसमय होती रहती है, क्योंकि बंधे हुए कर्म अपने-अपने समय पर अपना फल देकर निजीर्ण होते ही रहते हैं। मोक्षमार्ग में इस प्रकार की निर्जरा का महत्त्व नहीं है, क्योंकि इस निर्जरा में राग-द्वेष होने के कारण निर्जरा के साथ-साथ नवीन कर्मों का बन्ध भी होता है। संवर पूर्वक होने वाली निर्जरा ही मोक्षमार्ग में उपादेय है।

सविपाक निर्जरा के विपरीत अविपाक निर्जरा है, जिसमें परिपाक-काल से पहले तप आदि साधनों के द्वारा, समय से पूर्व ही कर्मों को झड़ाया/गलाया जाता है। यह ऐसा ही है जैसे-माली कच्चे आमों को तोड़कर, पाल आदिक में रखकर, उन्हें समय से पूर्व ही पका लेता है। वैसे ही अविपाक निर्जरा परिपाक काल से पूर्व ही तप आदि विशेष साधनों द्वारा की जाती है। यह समय से पूर्व ही कर्मों को गला देती है।’ मोक्षमार्ग में यह अविपाक निर्जरा ही उपादेय मानी गयी है। यह व्रतधारी, सम्यक्दृष्टि पुरुषों के ही होती है।

निर्जरा का साधन

निर्जरा का साधन तप कहा गया है।’ करोड़ों वर्षों से सञ्चित कर्म तप से निर्जरित हो जाते हैं।’ भव कोटि संचियं कम्मं तवसा णिरज्ञ्जङ्ग‘। कहा गया है कि तप के विना अकेले संवर से ही मोक्ष नहीं होता। जैसे अर्जित धन उपभोग के बिना समाप्त नहीं होता, वैसे ही सञ्चित कर्म तपस्या के बिना नष्ट नहीं होते। इसलिए कर्म-निर्जरा के लिए तप आवश्यक है। वैदिक ग्रन्थों में भी “तपसा किल्विषं हन्ति” तप द्वारा पाप नाश करते हैं। ऐसा कहकर तप को आत्मशोधन का उपाय बताया गया है। तप की बहुत महिमा है। जैसे जल मिट्टी को गला देता है, किन्तु अग्नि में तपने के बाद, उसी घड़े में जल को, अपने भीतर धारण करने की क्षमता आ जाती है, उसी प्रकार तप के द्वारा आत्मा में अनेक गुणों की अभिव्यक्ति हो जाती है। जैसे सोने को तपाने पर स्वर्ण की आभा निखर उठती है; ठीक वैसे ही तपस्वी जन जितना ही अधिक दुर्द्धर तप करते हैं, उनकी आत्मा में उतना ही निखार आता है।

जैन-शास्त्रों में तप का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसे मोक्षमार्ग का प्रमुख अङ्ग बताकर, धर्म निरूपित किया गया है। ‘धम्मो मंगल मुक्किद्वं अहिंसा संयमो तवो” तप के माहात्म्य का उल्लेख करते हुए ‘भगवती आराधना’ में कहा गया है कि “जगत् में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जो निर्दोष तप से प्राप्त नहीं होता। जैसे अग्नि तृण को जलाती है, वैसे ही तप रूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को जलाकर भस्म कर डालती है। उत्तम प्रकार से किया गया, आस्रव-रहित तप का फल वर्णन करने में हजारों जिह्वाओं वाला इन्द्र भी समर्थ नहीं है।'”

तप का लक्षण

तप की व्याख्या भिन्न-भिन्न प्रकार से की गई है। किसी ने अमुक व्रत को ही तप माना है, किसी ने वनवास, कंद-मूल भक्षण अथवा सूर्य के आतप को सहना ही तप माना है, तो किसी ने देह और इन्द्रियों के दमन से ही तप की पूर्णता स्वीकार की है, किसी ने मात्र मानसिक तितिक्षा को ही तप मानने की हिमायत की है, परन्तु जैन धर्म में तप का बड़ा विशद अर्थ किया गया है और उसमें शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि करने वाले सारे प्रयोगों को स्थान दिया गया है।

इच्छा निरोधस्तपः यह जैनों का प्रसिद्ध सूत्र है। तप का मूल उद्देश्य इच्छाओं का निरोध ही है। इसलिए अज्ञानपूर्वक लौकिक, ख्याति पूजा, प्रतिष्ठा और लाभ की भावना से किये गये तप को बाल-तप (अज्ञानियों का तप) कहा गया है। वस्तुतः ऐहिक आकांक्षाओं से ऊपर उठकर, सिर्फ कर्म-क्षय के लिए किया गया पुरुषार्थ ही तप है। आचार्य अकलंकदेव ने तप का लक्षण करते हुए कहा है, “कर्म निर्दहनात्तपः” कर्मों का दहन अर्थात् भस्म कर देने के कारण ही इसे तप कहते हैं, जैसे अग्नि संचित तृणादि ईंधन को भस्म कर देती है, उसी प्रकार तप भी जन्म-जन्मांतरों के सञ्चित कर्मों को जला डालते हैं तथा देह और इन्द्रियों की विषय प्रवृत्ति को रोककर उन्हें तपा देते हैं अत: ये तप कहे जाते हैं। “तवो विसयविणिग्गहो जत्थ“, तप वही है जहाँ विषयों का निग्रह है।

तप के भेद

तप के बारह भेद हैं। अनशन, ऊनोदर, वृत्ति-परिसंख्यान, रस-परित्याग, विविक्त-शय्यासन और काय-क्लेश ये छह बाहा तप हैं। बाह्य द्रव्यों के आलम्बन पूर्वक होने से तथा बाहर प्रत्यक्ष दिखने से, इन्हें बाह्य तप कहते हैं।’ प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह भेद आभ्यन्तर तप के हैं। मनोनिग्रह से सम्बन्ध होने के कारण इन्हें आभ्यन्तर तप कहते हैं।’ बाह्य तप भी आभ्यन्तर तप की अभिवृद्धि के उद्देश्य से ही किये जाते हैं। आभ्यन्तर तप साध्य है, बाह्य तप उनके साधक है।’

बाह्य तप

अनशन ‘अशन’ का अर्थ होता है ‘भोजन’। भोजन का त्याग करना ‘अनशन’ तप कहलाता है। यह सीमित समय के लिए भी होता है तथा यावज्जीवन भी। अनशन से भूख पर विजय होती है। भूख को जीतना और मन का निग्रह करना अनशन तप है। अनशन से शारीरिक शुद्धि भी होती है। यह शरीर का सबसे बड़ा चिकित्सक है। कहा भी है “लंघनं परमौषधम्।” अनशन को उपवास भी कहते हैं। ‘उपवास’ का अर्थ होता है- ‘उप’ यानी ‘पास’; ‘वास’ का अर्थ है ‘बैठना’। अपने करीब आने को उपवास कहते हैं। अकेले भोजन छोड़ना उपवास नहीं कहलाता। भोजन के साथ-साथ विषय-विकारों का त्याग कर, मन पर नियन्त्रण करना ही उपवास है। मनोनिग्रह के अभाव में किया गया उपवास, उपवास न होकर लंघन कहलाता है। ध्यान की साधना में उपवास आवश्यक है।

ऊनोदर ‘ऊन‘ का अर्थ है ‘कम’, ‘उदर’ का अर्थ पेट अर्थात् भोजन करते समय भूख से कम खाना, पेट को अपूर्ण रखना ‘ऊनोदर तप’ है। अधिक खाने से मस्तिष्क पर रक्त का दबाव बढ़ जाता है। परिणामतः स्फूर्ति कम हो जाती है और नींद आने लगती है। इसके अतिरिक्त अधिक खाने से वायु-विकार आदि अनेक प्रकार के रोग हो जाते हैं। ऊनोदर तप बहुत उपयोगी है। इससे ब्रह्मचर्य की सिद्धि भी होती है तथा यह निद्रा विजय का साधन है।’ भूख से कम खाना ही ऊनोदर है, इसे अवमौदर्य भी कहते हैं।

वृत्ति-परिसंख्यान – भिक्षा के लिए जाते समय मुनि द्वारा घरों का नियम करना कि मैं आहार के लिए इतने घरों तक ही जाऊँगा और इस रीति से आहार मिलेगा तो लूँगा, अन्यथा नहीं। इसे ‘वृत्ति परिसंख्यान तप’ कहते हैं। यह तप भोजन के प्रति आशा और राग की निवृत्ति के लिए किया जाता है।’ रस-परित्याग ‘रस’ का अर्थ है ‘प्रीति बढ़ाने वाला’। “रसः प्रीतिविवर्धनम्“- रस भोजन में प्रीति बढ़ाता है। घी, दूध, तेल, दही, मीठा और नमक-इन छह प्रकार के रसों के संयोग से भोजन स्वादिष्ट होता है तथा अधिक खाया जाता है। इनके अभाव में भोजन नीरस हो जाता है। इन्द्रिय विजय के लिए इनमें से किसी एक, दो या सभी रसों का त्याग करना ‘रस-परित्याग तप” है। विविक्त-शय्यासन ब्रह्मचर्य, ध्यान, स्वाध्याय आदि की सिद्धि के लिए एकान्त स्थान पर शयन करना तथा आसन लगाना ‘विविक्त शय्यासन तप’ है।

कायक्लेश– ‘कायक्लेश’ का अर्थ होता है- शारीरिक कष्टों बाधाओं को सहन करना। सुख से प्राप्त हुआ ज्ञान प्रतिकूलताओं में नष्ट हो जाता है, अतः साधक को कष्ट-सहिष्णु होना चाहिए। इसी उद्देश्य से शारीरिक ममत्व को कम करने के लिए, तथा तज्जन्य कष्ट सहने के लिए, और धर्म की प्रभावना के लिए अनेक प्रकार के आसनों द्वारा खड़े रहना, बैठना, ध्यान लगाना आदि ‘कायक्लेश तप’ है। ये छहों तप वाह्य वस्तु की अपेक्षा के कारण तथा दूसरों द्वारा प्रत्यक्ष होने के कारण बाह्य तप हैं।
आभ्यन्तर तप

प्रायश्चित्तः किये गये अपराधों के शोधन को प्रायश्चित्त कहते हैं। ‘प्रायः’ का अर्थ ‘अपराध’ है और ‘चित्त’ का अर्थ होता है ‘शोधन’। अपराधों के शोधन की प्रक्रिया को प्रायश्चित्त कहते हैं।’ ‘प्रायश्चित्त’ शब्द की व्युपत्ति करते हुए, कहा गया है कि जिसके द्वारा पाप का छेदन हो वह प्रायश्चित्त है।

यह एक ऐसा तप है, जिसमें अपने अज्ञान व प्रमादवश हुई भूलों का अहसास होते ही साधक का मन पश्चात्ताप से भर जाता है तथा वह निश्छल भाव से उसे अपने गुरु के समक्ष प्रकट कर देता है। जैसे, किसी कुशल वैद्य के हाथों दी गयी औषधि को रोगी, अपने लिए हितकारी जान, कड़वी होने पर भी बड़े उत्साह से ग्रहण करता है, वैसे ही प्रायश्चित्त से शिष्य, गुरु द्वारा प्रदत्त अल्प या अधिक दण्ड को अपना हितकर समझ सहर्ष स्वीकार करता है।

कुछ लोग प्रायश्चित्त को दण्ड समझते हैं। प्रायश्चित्त दण्ड नहीं है। दोनों में अंतर है। प्रायश्चित्त ग्रहण किया जाता है, दण्ड दिया जाता है। प्रायश्चित्त में सहज स्वीकृति है, दण्ड में मजबूरी। प्रायश्चित्त लेने वाले का मन पश्चात्ताप से भरा होता है, जबकि दण्ड भोगने वाले को प्रायः अपराध-बोध भी नहीं रहता, यदि कदाचित् होता भी है तो उसके प्रति पश्चात्ताप नहीं होता। प्रायश्चित्त को लेने वाला उसे समझता है- ‘स्वयं पर गुरु की कृपा, दण्ड को समझा जाता है बोझ’। दोनों की मानसिकता में महान् अन्तर है, अतः दोनों एक नहीं कहे जा सकते।

प्रायश्चित्त – तप से दोषों का नाश होता है तथा भावों की विशुद्धि होती है। प्रायश्चित्त वही लेता है, जिसका मन सरल होता है।

विनय पूज्य -पुरुषों एवं मोक्ष के साधकों के प्रति हार्दिक आदर-भाव विनय है। विनय का व्युत्पत्तिपरक अर्थ करते हुए कहा गया है कि “विलयं नयति कर्ममलमिति विनयः” अर्थात् जो कर्म मल को दूर कर दे, वह विनय है। इसलिए विनय को ‘मोक्ष का द्वार’ कहा गया है।
वैयावृत्य गुणों के अनुराग पूर्वक संयमीजनों की थकावट क्लान्ति आदि को दूर करना, हाथ-पाँव दबाना तथा और भी ऐसे उपकार करना ‘वैयावृत्य’ कहलाता है।’ बाल, वृद्ध, युवा, तपस्वी साधुओं के हाथ-पाँव दबाकर, तेल मर्दन कर, आवश्यकता के अनुसार योग्य औषधि लगाकर उनकी यात्रा, स्वाध्याय और तपस्याजन्य श्रम के खेद को दूर करना वैयावृत्य है। वैयावृत्य का बहुत महत्त्व है। वैयावृत्य करने से समाधि-धारण, ग्लानि पर विजय, परस्पर वात्सल्य एवं सनाथता प्रकट होती है।’ आचार्य श्री कुंदकुंद ने वैयावृत्य को जिन-भक्तिपरक बताते हुए, अपनी शक्ति के अनुसार सदाकाल करने की प्रेरणा दी है। भगवती आराधना में कहा गया है कि “समर्थ होते हुए भी जो वैयावृत्ति नहीं करता, वह धर्म-भ्रष्ट है।”

जिनाज्ञा का भंग, शास्त्र-कथित धर्म का नाश अथवा साधु-वर्ग का व आगम का त्याग ऐसे महादोष वैयावृत्ति की उपेक्षा करने से उत्पन्न होते हैं। *

स्वाध्याय – आलस्य के त्याग और ज्ञान की आराधना को स्वाध्याय कहते हैं। वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश ये पाँच स्वाध्याय के पाँच भेद हैं। ग्रन्थों का अर्थ सहित पढ़ना/ पढ़ाना वाचना है।’ संशय के निवारण के लिए तथा अर्थ के निश्चय के लिए ज्ञानीजनों से प्रश्न करना ‘पृच्छना’ है। पढ़े हुए अर्थ का बार-बार विचार करना ‘अनुप्रेक्षा’ है। शुद्धतापूर्वक पाठ करना ‘आम्नाय’ है। धर्म का उपदेश करना, सुनना या मनन करना धर्मोपदेश है।

स्वाध्याय करने से ज्ञान बढ़ता है, वैराग्य बढ़ता है एवं तप में वृद्धि होती है। मन को स्थिर रखने का स्वाध्याय से सरल उपाय और कोई नहीं है। इसीलिए कहा गया है कि स्वाध्याय से बड़ा कोई तप नहीं है।’

व्युत्सर्ग- अहंकार और ममकार का त्याग करना व्युत्सर्ग तप है।” इसके दो भेद हैं- बाह्य उपधि त्याग और आभ्यन्तर उपधि त्याग।” आत्मा से पृथक् धन-धान्यादि के प्रति ममता का त्याग करना बाह्य उपधि त्याग है तथा रागादिक विकारी भावों का त्याग आभ्यन्तर उपधि त्याग है।” कुछ समय के लिए अथवा जीवन पर्यन्त के लिए शरीर के ममत्व को त्यागना आभ्यन्तर उपधि त्याग है।’ इसके करने से निर्भयता और निःसंगता आती है। मन हल्का होता है तथा आशा-तृष्णा पर विजय प्राप्त होती है।

क्रमशः

मुनिश्री प्रमाणसागर 

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