श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

यदि नारी विष बेल है तो नर विषाक्त बरगद

सदियों से हमारा समाज पुरुष-प्रधान समाज रहा है। पुरुष हमेशा से अपने-आपको स्त्रियों से श्रेष्ठ मानता रहा है। इसके पीछे मुख्य दो कारण रहे हैं एक तो पुरुष को मासिक धर्म का कोई चकर नहीं होता है, तथा दूसरे वह मातृत्व के बोझ से बचा रहता है। इन दो कारणों से ही वह सदा स्त्री को यह एहसास कराता रहा है कि तुम पुरुष से श्रेष्ठ नहीं हो सकतीं। यदि एक अच्छे भले व्यक्ति को बार-बार प्रत्येक कहने लगे कि ‘तू पागल है, तू पागल है, तो एक बार वह स्वयं भी सोचने लगेगा कि क्या वाकई वह पागल हो गया है? कुछ ऐसी ही स्थिति स्त्री के साथ भी रही प्रतीत होती है। उससे बार-बार कहा जाता रहा कि तू हीन प्रकृति की है, तुझे मासिक अशुद्धि रहती है, तुझे मातृत्व का बोझ धारण करना पड़ता है। तेरा स्थान तो घर के भीतर ही है तेरा बाहर जाना उचित नहीं है। तुझे शिक्षा देने का कोई प्रयोजन नहीं है; और स्त्री के बारे में न जाने क्या-क्या नहीं कहा गया। सामान्य पुरुष ने ऐसा कहा, ऐसा नहीं है। हमारे मुनि-ऋषियों ने भी स्त्री के संबंध में यह सब कहा। आखिर स्त्री की दशा भी उस सूझते व्यक्ति की-सी हो गयी जो अपने को पागल समझने लगा। स्त्री स्वयं को पुरुष की तुलना में हीन समझने लगी। और जब यह बात विद्वानों और तपस्वियों ने कही तो उस बेचारी की यह धारणा और मजबूत हो पड़ी। उस भोली को क्या मालुम कि इसके पीछे ऋषि-मुनियों की कोई चाल है।

शास्त्रों में अनेक प्रकरण आते हैं कि अनेक महान् तपस्वियों की तपस्या एक स्त्री द्वारा नष्ट हो गयी। यदि कोई तपस्वी एक स्त्री को देख कर विचलित हो उठता है तो उसमें स्त्री का क्या दोष? खोट तो तपस्वी की आन्तरिक भावना में है। वह तपस्वी मात्र काय-क्लेश करता है, मैथुन को दबाने का प्रयत्न तो करता है, पर मैथुनी इच्छा से मुक्त नहीं हो पाता है। खोट तो उसकी स्वयं की तपस्या में है, लेकिन वह यह बात मानने को राजी नहीं है। तपस्या में जो-जो वस्तु उसे बाधक महसूस हुई, उस सबको उसने छोड़ने को कहा। परिग्रह, मोह, ममता, घर आदि सबको हेय कहा, कुशील सेवन को हेय कहा। धीरे-धीरे उसने मोह को काफी कम भी कर लिया; लेकिन फिर भी वह जब कुशील सेवन की भावना से मुक्त नहीं हो पाया तो वह झल्ला पड़ा। स्त्री को उसने अनेक खरी-खोटी संज्ञाएँ दीं। वह स्त्री को कुटिल, मायाचारिणी, कपटी, नागिन, विष-बेल, और न जाने किस-किस नाम से संबोधने लगा। वस्तुतः वह अपनी गलती-की-कुण्ठा से तो ग्रस्त था ही, पुरुष होने के नाते अपनी श्रेष्ठता से भी कुण्ठित हुआ। वह अपने दोषों को स्त्री पर थोपने लगा।

और इस प्रकार स्त्रियाँ हीन वर्ग में आ गयीं। पुरुषों के लिए वे मात्र भोग्या (भोगने की वस्तु) बन कर रह गयीं। इस कारण ही राजा अनेक स्त्रियां रखने लगे। पुरुष के लिए बहु-विवाह आम बात हो गयी; लेकिन स्त्रियों के लिए इसका निषेध रहा। धनवान रखेल रखने लगे। स्त्रियों पर यौन अत्याचार बढ़ने लगे। वेश्यावृत्ति इसी की देन है।

प्राचीन ऋषियों, मुनियों, विद्वानों एवं पण्डितों ने नारी के संबंध में उपर्युक्त आम धारणा व्यक्त तो कर दी; लेकिन उन्हें इसमें अपनी कुछ भूल महसूस होने लगी। उन्हें शीघ्र ही यह आभास हो गया कि नारी माँ, बहन एवं बेटी भी तो हो सकती है; अतः अब वे लीपा-पोती करने लगे। वे नारी में देवियों के रूप देखने लगे। उसे दुर्गा, अम्बा, भवानी, पार्वती आदि अनेक रूपों में पूजने लगे; लेकिन इसके बावजूद भी वे पुरुष की श्रेष्ठता को बरकरार रखना चाहते थे, अतः उन्होंने नारी को शिक्षा देने का निषेध किया। अशिक्षित स्त्री का शिक्षित पुरुष वर्ग से हीन होना स्वाभाविक है, अतः शिक्षित पुरुष स्त्री को हीन बनाये रखने में कामयाब बने रहें।

ऐसी स्थिति में यह आम धारणा बना दी गयी कि नारी बाल्यावस्था में पिता, यौवना-वस्था में पति, तथा वृद्धावस्था में पुत्र के अधिकार में रहती है। राष्ट्र-कवि मैथिलीशरण गुप्त ने नारी की इस दुर्दशा को इन पंक्तियों में व्यक्त किया है –

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

यह प्रथा सदियों प्राचीन हो गयी। जब कभी नारी-शिक्षा एवं इनके उद्धार की बात चली तो सदियों से चली आ रही यह परम्परा आड़े आयी। हमेशा यही दलील दी जाती रही कि सदियों से स्त्रियों को नहीं पढ़ाया जाता रहा है, सदियों से इनका स्थान मात्र घर ही है। क्या हमारे बुजुर्ग / पुरखे बेवकूफ थे जो उन्होंने स्त्रियों के लिए ऐसे नियम बनाये? आखिर उन्होंने भी तो वर्षों सोच-विचार कर अपनी राय दी, ये नियम बनाये, आदि, आदि; लेकिन ये सारी दलीलें थोथी नजर आती हैं, क्योंकि कभी भी इस स्त्री वर्ग को पुरुष से श्रेष्ठ सावित करने का मौका ही नहीं दिया गया। कभी भी उन्हें शिक्षा का उचित अवसर नहीं मिला। कभी भी उन्हें उस हीनता की कुण्ठा से मुक्त होने का अवसर ही नहीं दिया जो पुरुष ने उनके मस्तिष्क में पैदा कर दी थी।

पिछली सदी में नारी उद्धार के लिए कुछ माहौल बना। राजा राममोहनराय जैसे सुधारकों ने इसी सदी में जन्म लिया। इन्होंने सती प्रथा, बाल-विवाह प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध अपना तीव्र अभियान छेड़ा। स्त्रियों को शिक्षित करने के भी कुछ कार्यक्रम बने। शनैःशनैः लोगों में काफी जागरूकता आयी। उसी का परिणाम है कि आज अनेक महिलाएं शिक्षित हैं तथा विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं। चिकित्सा; इन्जीनियरिंग, शिक्षा, विज्ञान तथा अन्य सब क्षेत्रों में वे काम करती हैं, जहाँ-जहाँ पुरुष काम करते हैं। विदेशों में तो महिलाएं पहले से ही फौज में ‘भी थीं, अब भारत में भी इसका शुभारम्भ हो चुका है। विभिन्न पदों पर कार्यरत महिलाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि वे पुरुषों से किसी भी हालत में कम नहीं हैं; लेकिन आज भी वह कुण्ठा तो स्त्री और पुरुष के मस्तिष्क में बनी हुई है कि स्त्री पुरुष के मुकाबले हीन है। इस कुण्ठा को दूर होने में अभी समय लगेगा; लेकिन उम्मीद है कि एक दिन स्त्री व पुरुष समान स्तर पर होंगे।

महिलाओं में शिक्षा के साथ अपने हितों के प्रति जागरुकता भी आयी है। अब वे मात्र अबला नहीं हैं। वे प्राचीन शास्त्रों में नारी के प्रति कहे गये अनुचित वाक्यों के प्रति विरोध करने का साहस भी करने लगी हैं। यह एक शुभ लक्षण है। जैनों में भी यह जागरूकता आयी है। यह बहुत प्रसन्नता की बात है कि इसका शुभारम्भ कुछ आर्यिकाओं ने किया है। उन्होंने जैन साहित्य में नारी के प्रति कहे गये उन कटु वचनों के खिलाफ अपना रोष व्यक्त किया है जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया है। हमें यह जानकारी जयपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘वीरवाणी’ (दिसम्बर, 1991) में प्रकाशित लेख ‘पुरुषों द्वारा नारी-शोषण कितना यथार्थ?, कैसा यथार्थ?’ (लेखक श्री मनोजकुमार जैन ‘निर्लिप्त’) से प्राप्त हुई। इसी लेख से यह भी स्पष्ट है कि पुरुषों ने इन विचारों के विरुद्ध नुक्ता-चीनी करना प्रारम्भ कर दिया है। यदि कविवर ध्यानतराय ने नारी को ‘विष-बेल’ कह दिया तो हमें इस बात को आज के परिप्रेक्ष्य में भी मात्र इसलिए उचित ठहराना कि यह बात हमारे प्रसिद्ध कवि तथा विद्वान् ने कही है, ठीक प्रतीत नहीं होती। हमें इसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिये। कविवर ध्यानतराय जिस युग में हुए उसमें नारी के प्रति पुरुष की मानसिकता एवं आम अवधारणा ऐसी ही थी। यदि महाकवि तुलसीदास ने नारी को ताड़न की अधिकारिणी कहा, तो उनके युग में नारी को ऐसा ही समझा जाता था। उन्होंने शूद्र और गंवारों के लिए भी ऐसा ही कहा; लेकिन क़ानूनी तौर पर आज ऐसा साहस कौन कर सकता है जो शूद्र को ताड़न का अधिकारी बताये । यहाँ मेरा कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि कभी किसी आचार्य, विद्वान्न, या कवि ने नारी के विरुद्ध कुछ कहा है तो हमें यह स्वीकार करना चाहिये कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था एवं नारी के प्रति पुरुष की मानसिकता ऐसी थी। उस काल में नारी शिक्षित तो थी नहीं जो इस बात का विरोध करती। यही स्थिति शूद्रों की भी थीः लेकिन आज जब नारी शिक्षित होने लगी है तब उसे विरोध करने का साहस भी हुआ है। यह उचित भी है। अब प्रश्न यह है कि उन वाक्यों का क्या हो, जो नारी के प्रति कहे जा चुके हैं। इस संदर्भ हमारा यह निवेदन है कि उन्हें भले ही वैसा लिखा रहने दें; लेकिन साथ में फुटनोट (पाद-टिप्पण) दे कर यह स्पष्ट कर दें कि ‘नारी के प्रति उस काल में ऐसी ही अवधारणा / मानसिकता थी; वस्तुतः ऐसा नहीं है’।

दूसरा निवेदन यह है कि नये साहित्य की जब भी रचना की जाए, तब नारी के प्रति प्रयुक्त शब्दों में शालीनता बरती जाए। किसी वर्ग विशेष का दिल दुखा कर कुछ कहना उचित नहीं है। हमें इस बात पर हठी नहीं होना चाहिये कि ‘संसार में नारी विषबेल ही है’। यदि कोई बात किसी संदर्भ में कहनी भी है तो इस तरह कहें कि जिससे किसी का दिल न दुखे। क्या नारी-वर्ग का दिल दुखाने में हिंसा का बन्ध नहीं होगा?

 

डॉ.अनिल कुमार जैन,
बापूनगर जयपुर

Leave a Reply