गतांक से आगे-
अजीव तत्व – आत्मा के संग पर का असली परिचय
मित्रों,
सबसे पहले हमने “जीव तत्व” को जाना – चेतना को, आत्मा को पहचाना।
आज हम उससे जुड़ी उसकी छाया, उसका संग, उसका परिचारक जानेंगे – और वह है: अजीव तत्व।
अब प्रश्न उठता है –
जब आत्मा जानने वाली सत्ता है, तो वह जानती क्या है?
जिसे वह जानती है, जिससे वह प्रभावित होती है, वह है – अजीव।
1. अजीव का अर्थ – जो जानता नहीं, वह अजीव
“अ-जीव” – यानी जो जीव नहीं है।
न उसमें चेतना है,
न वह जानता है,
न वह अनुभव करता है।
लेकिन वह है – और महत्वपूर्ण भी है।
जैसे नर्तक अकेला नृत्य नहीं कर सकता – उसे मंच चाहिए, संगीत चाहिए, वस्त्र चाहिए –
वैसे ही आत्मा भी अकेले नहीं कार्य करती।
उसे आधार चाहिए – वह आधार है अजीव।
2. अजीव के पाँच प्रकार – आत्मा के पंच परिचारक
जैन शास्त्रों में अजीव को पाँच भागों में बांटा गया है। ये पाँच – आत्मा की यात्रा में उसके ‘मंच’, ‘संग’, ‘बंधन’, और ‘मुक्ति’ – सबका कारण बनते हैं।
1. पुद्गल (Pudgal) – पदार्थ
यह स्पर्श, रस, गंध, रूप से युक्त है।
यही शरीर बनता है,
यही वाणी और मन का आधार है,
और यही कर्मों का भी कारण है।
एक कथा सुनिए:
एक मुनिराज के शरीर से सुगंध आ रही थी। लोगों ने सोचा – यह तो चमत्कार है!
उन्होंने कहा – नहीं, यह पुद्गल का गुण है। आत्मा गंध नहीं देती, पुद्गल देता है।
कभी पुद्गल का गुण आत्मा से जोड़ देना – यही मोह है।
2. धर्मास्तिकाय – गति में सहयोगी माध्यम
सुनने में अटपटा लगता है – ‘धर्म’ अजीव कैसे हो सकता है?
यहाँ ‘धर्म’ का अर्थ है – गति कराने वाला माध्यम।
जैसे जल में मछली तैरती है, तो जल गति का माध्यम है –
वैसे ही यह धर्मास्तिकाय आत्मा को गति कराने वाला अदृश्य माध्यम है।
3. अधर्मास्तिकाय – विश्रांति में सहायक
जैसे थकान के बाद वृक्ष की छाया विश्राम देती है –
वैसे ही आत्मा के रुकने में सहायक तत्व है – अधर्मास्तिकाय।
यह विश्रांति की अनुमति देता है – पर यह स्वयं विश्रांत नहीं होता।
4. आकाशास्तिकाय – स्थान देने वाला तत्व
आत्मा, पुद्गल, धर्म-अधर्म – सबको स्थान देने वाला तत्व
जिसमें सब टिकते हैं, वह है – आकाश।
हमारी आत्मा की स्वतंत्रता, कर्मों की गुह्यता – सब आकाश में ही संभव है।
जैसे थाली न हो, तो रोटी कहाँ रखोगे? वैसे ही आकाश न हो, तो जीवन कहाँ होगा?
5. काल – समय का तत्व
अजीव का अंतिम प्रकार – काल।
यह ही गति का क्रम है, परिवर्तन का कारण है।
यही ‘बीता कल’, ‘आज’ और ‘भविष्य’ का रेखाचित्र है।
पर ध्यान रहे – काल स्वयं कुछ नहीं करता,
वह केवल परिवर्तनों की गवाही देता है।
3. आत्मा और अजीव – संवाद नहीं, संग
अब प्रश्न है – आत्मा को तो मोक्ष जाना है, फिर अजीव क्यों चाहिए?
उत्तर सरल है –
मोक्ष तक की यात्रा में आत्मा को माध्यम, शरीर, समय, गति – इन सबकी जरूरत है।
परंतु जब वह कर्मरहित हो जाती है – तब इन सभी से परम रूप से मुक्त हो जाती है।
4. व्यवहारिक दृष्टि – अजीव का ज्ञान क्यों ज़रूरी?
क्योंकि हम अक्सर पुद्गल को ‘मैं’ समझ लेते हैं।
शरीर को ‘आत्मा’ मान बैठते हैं।
वस्त्र, वाहन, नाम, यश – इन सब पुद्गलों को अपनी पहचान बना लेते हैं।
परंतु…
“जो मेरा नहीं, उसे मैं क्यों कहूँ?”
जो बदलता है, जो मुझसे अलग है – वह अजीव है।
एक बार राजा श्रेणिक ने भगवान महावीर से पूछा – “मैं कौन हूँ?”
भगवान ने कहा – “जो देख रहा है, जान रहा है – वह तू है। बाक़ी सब – अजीव है।”
5. अजीव का सदुपयोग – पर को जानकर आत्मा को जगाना
क्या यह अजीव त्याज्य है?
नहीं।
जब तक मोक्ष नहीं होता – अजीव की साधना जरूरी है।
लेकिन अज्ञानवश उसे “मैं” बना लेना – यही संसार का कारण है।
प्रिय साधकों,
जीव तत्व हमें आत्मा का परिचय देता है,
पर अजीव तत्व हमें असली अलगाव का बोध कराता है।
यह ज्ञान हमें सिखाता है –
“मैं जो जानता हूँ, वह हूँ –
और जो जानी जाने वाली वस्तु है, वह मैं नहीं हूँ।”
यही विवेक – मोक्ष का पहला द्वार है।
क्रमश:
पारस मल जैन
जौधपुर