श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

आज का चिंतन

चाहे गलती कोई भी हो और किसी की भी हो मगर दूसरों को दोष देना, यही आज के इस आदमी की फितरत बन गयी है !

आदमी गिरता है तो पत्थर को दोष देता है, डूबता है तो पानी को दोष देता है और कुछ नहीं कर पाता तो क़िस्मत को दोष देता है !

दूसरों को दोष देने का अर्थ ही मात्र इतना सा है कि स्वयं की गलती को स्वीकार करने का सामर्थ्य न रख पाना और अपने में सुधार की भावी संभावनाओं को स्वयं अपने हाथों से कुचल देना !

खुद के जीवन में दोष होने से भी ज्यादा घातक है दूसरों को दोष देना क्योंकि इसमें समय का अपव्यय व आत्मप्रवंचना दोनों होते हैं !

अतः आत्मसुधार का प्रयास करो, जहां आत्म सुधार की प्रवृत्ति है, वहीं परमात्मा से मिलन भी है !

This Post Has 2 Comments

  1. राजेन्द्र प्रसाद जैन

    कितनी सुंदर और सही बात है : “खुद के जीवन में दोष होने से भी ज्यादा घातक है दूसरों को दोष देना क्योंकि इसमें समय का अपव्यय व आत्मप्रवंचना दोनों होते हैं !”

    अगर दोष देना बंद करके अपने अंदर झांकेंगे,तो समभाव आयेगा, आत्मभाव जागृत होगा और निजानंद की प्राप्ति होगी, वही परमात्मा से मिलन है।

    अतः आत्मसुधार का प्रयास करो, जहां आत्म सुधार की प्रवृत्ति है, वहीं परमात्मा से मिलन भी है !

  2. राजेन्द्र प्रसाद जैन

    कितनी सुंदर और सही बात है : “खुद के जीवन में दोष होने से भी ज्यादा घातक है दूसरों को दोष देना क्योंकि इसमें समय का अपव्यय व आत्मप्रवंचना दोनों होते हैं !”

    अगर दोष देना बंद करके अपने अंदर झांकेंगे, तो समभाव आयेगा, आत्मभाव जागृत होगा और निजानंद की प्राप्ति होगी, वही परमात्मा से मिलन है।

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