एक नगर में एक राजा था। उसे धन का बहुत लोभ था वह हमेशा सोचता, कि मेरा खजाना हमेशा भरा रहे। एक बार वह मुनिराज के पास दर्शन करने गया और उसने अपनी भावना को गुरु के चरणों में रख दिया। मुनिराज ने कहा- राजन् ! जिस बात का तुम वरदान माँग रहे हो, उसके विषय में तुम सोच लेना । राजा ने कहा गुरुजी! मैंने सोच लिया है अब मुझे नहीं सोचना, मुझे तो आप कोई मंत्र दीजिये, जिससे हमारा खजाना भरा रहे । महाराज जी ने बार-बार कहा। लेकिन उसकी बात में कोई अंतर नहीं आया तब मुनिश्री ने कहा- जाओ इस मंत्र का जाप करना तुम्हारी मनोकामना पूरी हो जायेगी। वह णमोकार मंत्र था। उस राजा ने जाकर उस मंत्र की साधना शुरु कर दी। जैसा कि मुनिराज ने बताया था, उसकी साधना से खुश होकर एक देव प्रकट हुआ। उसने कहा राजन् ! कहो क्या आज्ञा है ? मैं आपकी साधना से खुश हूँ। राजा ने कहा हे देव ! मेरी इच्छा है कि मेरा खजाना हमेशा – हमेशा कि लिये भरा रहे, उसमें कोई भी कमी न आये । देव ने कहा राजन् ! अभी इस इच्छा की पूर्ति के लिये तुम्हें और साधना करनी पड़ेगी, जिसमे तुम्हें सामने दिख रहे तालाब में एक बड़ा भारी मगर दिखेगा और उससे ही तुम्हारी इच्छा की पूर्ति होगी। राजा उस देव के कहे अनुसार साधना करता है तथा वही देव उस तालाब में मगर का रूप धारण कर लेता – है तथा वह मगर तालाब के किनारे पर बैठे राजा के समीप आया और राजा से कहा-हे राजन् ! कहो क्या बात है? आपने मुझे क्यों याद किया ? आपकी मैं क्या सेवा कर सकता हूँ? आप मुझे आदेश दें। राजा ने मगर से कहा -हे मगर ! मेरी एक इच्छा है और उस इच्छा की पूर्ति आप ही कर सकते हैं ऐसा एक देव ने मुझसे कहा है। मैं उसकी आज्ञा से यहाँ आया हूँ। वह इच्छा है, कि मेरा खजाना हमेशा भरा रहे, कभी भी खाली न हो। मगर ने कहा- हे राजन् ! पहले आप मेरा एक काम करें, मैं बहुत दिनों से प्यासा हूँ इसलिये आप मेरे लिये एक लोटा जल ले आयें। जैसे ही राजा ने इस बात को सुना तो उसको आश्चर्य हुआ कि यह कैसा मगर है तालाब में रह रहा है, और मुझसे पानी माँग रहा है कि में बहुत प्यासा हूँ ऐसा कैसे हो सकता है ? वह सोचता है, कि चलो मगर से ही पूछा जाये और वह मगर से पूछता है-कि मगर राज! आप तो पानी से भरे इतने बड़े तालाब में रह रहे हो, और फिर भी प्यासे हो यह कैसे हो सकता है ? मगर ने कहा-हे राजन् ! जब आप सुख-शांति, आनंद के बीच हैं तब आपकी लोभ रूपी प्यास शांत नहीं हुई है तो मेरी प्यास कैसे शांत हो सकती है? क्योंकि सुख-शांति धन से नहीं आती है, वह तो तुम्हारे पास है, तुम्हारी आत्मा में है। और आप बाह्य पदार्थों से सुख-शांति की माँग कर रहे हो, जो उसमें नहीं है। राजा की आँखें खुल गई। उसे बहुत पश्चाताप हुआ कि मैं व्यर्थ ही धन के संग्रह, धन की आशा में लगा रहा। सच्चा सुख तो मेरी आत्मा में है, धन में नहीं। तब से वह धन की आशा छोड़ धर्मध्यान में अपना अधिक समय व्यतीत करने लगा ।
लोभ के कारण जीवन से भी हाथ धोना पड़ा
एक नगर में एक ब्राह्मण था। वह ब्राह्मण विद्या से सम्पन्न था। उसने विचार बनाया कि मैं काशी जाऊँगा तथा अधिक से अधिक अध्ययन करूँगा ताकि अधिक से अधिक भेंट मिले और मेरा बहुत सम्मान हो। वह काशी गये और बड़ी मेहनत तथा लगन से अध्ययन करने लगे। लेकिन वह निरन्तर प्रयासशील रहते कि मैं बचत करूँ, चाहे जैसे भी हो। पूजा-पाठ की दक्षिणा आती तो उसको सुरक्षित रखते, बाजार जाते तो पैदल जाते, सामान भी स्वयं अपने सिर पर रखकर लाते, सिर में तेल डालना बंद कर दिया, शरीर में साबुन लगाना बंद कर दिया, तालाब के किनारे की मिट्टी लगाकर स्नान कर लेना, इस प्रकार जैसे होता वैसे ही वह पैसे की बचत करने लगा । एक दिन बच्चे बोले-पिताजी ! आज १५ अगस्त है, तेल लगाना है। पिताजी ने कहा बेटा, अमीर लोगों के बच्चों से कुश्ती कर लेना तो तुम्हारे शरीर में तेल लग जायेगा । बीमार हो जाने पर किसी फ्री औषधालय की तलाश करते थे । त्यौहार आता तो बच्चे कहते पिताजी, आज तो दीपावली है। पिताजी कहते – बेटा, क्या पकवान को खाना, पेट में जाकर सब समान हो जाते हैं, इसलिये पकवान खाना व्यर्थ है। यदि बच्चे फिर भी जिद्द करने लगते, तो पिताजी कहते बेटा, बड़े बर्तन को ले जाकर घी की दुकान पर घी तुलवा लेना और तुलवा कर फिर कहना, ये मुझे पसंद नहीं आया और वापिस कर देना तो बर्तन में इतना घी तो लगा ही रहेगा, कि पूड़ियाँ नहीं, तो पराठे बन ही जायेंगे। इस प्रकार वह निरंतर पैसा बचाने का प्रयास करता। एक दिन समाचार मिला कि आपकी माँ जिन्होंने आपका पालन-पोषण किया है उनका देहान्त हो गया है। ब्राह्मण सोचता है, कि अगर जायेंगे तो पैसा खर्च होगा, यहीं से श्रीफल चढ़ा देते हैं। यही हमारा कर्तव्य है अब वो जिंदा तो हैं नहीं, जिंदा होती तो कोई बात थी। और वह बाजार जाता है श्री फल खरीदने के लिये । जैसे ही वह दुकानदार से श्रीफल का दाम पूछता है तो दुकानदार कहता है – सात रुपये का । दाम सुनते ही ब्राह्मण के छक्के छूट जाते हैं। वह सोचता है, इतने रुपये में तो हम पाँच दिन तक खायेंगे। वह कहता है अगर इससे छोटा नारियल हो तो आप उसे बतायें। वह दुकानदार छोटा नारियल दिखाता है और ५ रूपये का दाम बताता है बाह्मण कहता है-४ रूपये में दोगे। दुकानदार कहता है आपको गोदाम में जाना पड़ेगा। वहाँ ४ रुपये का श्रीफल मिल जायेगा। बाह्मण गोदाम जाता है और गोदामवाला उसे ४ रुपये में देने को तैयार हो जाता है। लेकिन वह कहता है-आप दो रुपये में दोगे । गोदाम वाला कहता दो रुपये में तो आपको बगीचे वे में मिलेगा। वह बाह्मण बगीचे में जाता है। और उसे बागवान २ रुपये में देने को तैयार हो जाता है। वह बाह्मण बागवान से कहता है १ रु. में दोगे। बागवान कहता है १ रुपये में तो आपको वृक्ष के पास इकट्ठे करने वाले व्यक्ति से मिल जायेगा क्यों कि वह गिर चुके हैं। वह अंदर जाता है वृक्ष के नीचे और पूछता है यह नारियल कितने का ? तो वहाँ इकट्ठा करने वाला बोला १ रुपये में । वह ब्राह्मण बोला फ्री में नहीं दोगे। नौकर ने कहा-दे सकता हूँ, लेकिन पेड़ पर चढ़ जाओ और जो भी चाहिये हो उसे ले लेना। बंधुओं। वह बाह्मण निरन्तर एक ही विचार में था कि कैसे १ रु. बच जाये ? अब ब्राह्मण चारों ओर दृष्टि दौड़ाता है कि बड़ा श्रीफल कौन सा है? और उस बड़े श्रीफल वाले वृक्ष पर चढ़ जाता है। सोचता है, माँ का आशीर्वाद है कि फ्री में ही श्रीफल मिल गया है और वृक्ष पर लगे नारियलों में से बड़े से बड़ा श्रीफल छाँटने लगा और उस श्रीफल को एक हाथ से तोड़ा तो टूटा नहीं, तो वह दोनों हाथ से उस नारियल को तोड़ने लगा जिससे उसका पैर वृक्ष से छूट गया। अब वह भगवान का नाम स्मरण करने लगा हे भगवान ! दया करो, बच गया तो सम्पति को मंदिर बनवाने में लगा दूँगा। चाहे मुझे मंदिर बनाने में भीख माँगना पड़े तो भी माँग लूँगा। वह विचार ही कर रहा था संकल्प पक्का है भगवान जीवन बच जायेगा तो मंदिर जरुर बनवाऊँगा। और भगवान ने सुन लिया कि वहाँ से एक हाथी निकला और वह ब्राह्मण चिल्लाता है, ए ! हाथी वाले अपना हाथी इधर ले आओ। वह भी चतुर था बोला- तुम मुझे क्या दोगे ? ब्राह्मण बोला-मैंने सम्पति तो भगवान को दे दी, लेकिन मेरे शरीर पर जो आभूषण हैं उसको मैं तुमको दे दूँगा। अभी वह हाथी के ऊपर पैर भी नहीं रख पाया था मात्र महावत ने उसके पैर ही पकड़े कि हाथी वहाँ से चला गया अभी तक वह अकेला था। लेकिन अब महावत भी साथ में लटक गया। ब्राह्मण फिर भी सोच रहा है कि रक्षा हो जाये और इतने में वहाँ से ऊँट वाला निकलता है दोनों उसे आवाज लगाते हैं। वह भी उसका भाई था । वह बोला-क्या दोगे ? उसने कहा मैं तुमको हाथी दूँगा। और वह ऊँट वाला उतारने के लिये जैसे ही वृक्ष के नीचे आया और उसके पैर पकड़े कि ऊँट वहाँ से खिसक गया इस प्रकार अब तीनों लटक गये तभी एक हवा का झोका आया और नारियल टूट गया जिससे तीनों नीचे गिरकर मर गये। तात्पर्य यह है कि लोभ के कारण उन लोगों को जीवन से भी हाथ धोना पड़ा ।
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