हे भव्य आत्मजन
जिन्दगी एक सफर – शुभ – अशुभ कर्मों की, दुख-सुख के भण्डार की आँसुओं से निकली हुई धारा की, सत्य असत्य के पैमानों की, मन की जुबान की चटपट, आँखों की नटखट द्वेषता की झटपट में अहंकार की कीचड़ में लिप्त है।
इस सफर में- आचार-विचार, व्यवहार, भाषा, दर्शन, संस्कार, संस्कृति आदि के दर्पण भी दिखलाई देते है । यदि हम अन्तर के चक्षु खो कर देखें तो हमें सोचना होगा कि हमारी जिन्दगी का सफर कैसे सुहावना हो,
अर्न्त मन के अनुयायी-
यदि हमारा सफर अहंकार की पगड़ी बाँधे हुए से निहित है, तो अपनी फुंकार से जीवन के मिठास को हर लेता है । तन-मन को अपने चाबुक से बस में कर लेता है । अहंकार – क्रोध का भाई है, क्रोध भभकता है घधकता, है, शान्ति के बादल फट जाते हैं। बरसात तक नहीं कर पाते। कामनाएँ सुख-चैन से नहीं बैठने देती, हे महानुभाव जीवन तो परलोक का खेत है जो अभी यहाँ बोया जाता है, वह परलोक में काटा जाएगा, याद रखे समय बड़ा कठोर है, यह अपनी कीमत वसूल करता है, कर्म ढूंढ ढूंढ़कर हिसाब लेता है ।
झूठ की तारीफ, सत्य का मजाक, कुछ ऐसा है, आजकल दुनिया का मिजाज । खत्म नही होगा जिन्दगी का सफर मौत सिर्फ रास्ता बदलती है, जो समय बेकद्री में गया या चिन्ता की अग्नि में जला तो जीवन कूडेदान में गया।
हे संयम धारी सत्य पुरूष-
व्यवहार ही जीवन का पोषक है। जिनका जीवन बोलता है उनको बोलने की उतनी जरूरत नही पडती । अपने स्वभाव तथा व्यक्तित्व को जगा, मन में चिन्तन कर, एक पल की गल्ती हमे जीवन भर रूलाती है। विकृत- विचारों को आग की लपटो में सुपुर्द कर । चाँदनी से शीतलता व मौन सीख, विचार शरीर से सौ गुना शक्तिशाली होता है। जीवन के अंधेरे में सूरज बन कर रोशनी कर, कर्मो का कचरा मन का कूडा करकट, बदवू, की लपटें,क्रोध का नजारा, साधना की झाडू से साफ कर सुहाना बनाने के लिए संत्सग की बरसात से पाप के दाग धुलते है। सत्य का दरवाजा खोल जीवन प्रगति की सीढीयों चढ़ता रहे।
हे सत्यपुरूष कर्मयोगी…
कर्म हमेशा विचारों से जुडे रहते है। जीवन में सदकर्म के बीज बोवे । मन की वेदना नैनों में दिखाई देती है और अच्छाई चेहरों पर खिलती है । सोच आत्मा का भोजन है और हदय धर्म की गुफा । होठो पर मुस्कान रख दुनिया हंसती हुई नजर आयेगी जीवन के पन्नों पर कुछ ऐसा लिखा जाए ।
मुस्कराहट तो है आंसु भी है, रंग बदलती है जिन्दगी, आज जुडा है, कल टूटा है, कैसी लाचारी है जिन्दगी, कभी अंधेरा, कभी उजाला, ऐसी क्यो बनी है जिन्दगी सीखने से गुजारो तो किताब है जिन्दगी,दिखावों से गुजारो तो बर्बाद है जिन्दगी, खुश रहकर गुजारो तो मस्त है जिन्दगी, दुखी रहकर गुजारो तो त्रस्त है जिन्दगी। मिलती है एक बार प्यार से बिताओं जिन्दगी, जन्म तो रोज ही होते है यादगार बनाओ जिन्दगी ।
है कर्मठ श्रेष्टी जन –
यादगार बनाओ जिन्दगी, नये शब्द, नई समझ, नया अन्दाज, नई कल्पनाए नई वर्तनी मन को मोह लेती है। याद रखो, जिन्दगी एक उपहार है और शमसान की धरोहर है । जिन्दगी रहे फूलों की तरह और बिखरे तो खुशबू की तरह । मन का ऑगन साफ रख, तो प्रभु आनन्द के रूप में प्रकट होगे ।
खुशबू मुबारक हो तुम्हें फूलो की ओर से,
रोशनी मुबारक हो तुम्हे सूरज की ओर से,
खुशिया मुबारक हो तुम्हे छगन की ओर से
छगनलाल जैन
अलवर