श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

जनगणना से पूर्व हमारा कर्तव्य

कुछ वर्षों से यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि जनगणना में नाम के आगे ‘जैन’ लिखायें। इसके पक्ष तथा विपक्ष में काफी लिखा जा चुका है लेकिन इस संबध में निर्णय करने से पूर्व हमें कुछ बिंदुओं पर विचार कर लेना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि जहाँ एक ओर जैन लिखने से एक अलग समाज की पहिचान बनती है वहीं इसके कुछ दूरगामी दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।

कुछ लोगों का विचार है कि जिस प्रकार मुसलमान, ईसाई तथा बौद्धों ने अपनी अलग जाति बना कर अलग पहिचान बना ली है, उसी प्रकार जैनों को भी करना चाहिये। अल्पसंख्यकों की समस्याएँ अधिक होती हैं, अतः अल्पसंख्यक होने के नाते जैनों को भी वैसा ही करना चाहिये जैसा मुसलमान, ईसाई तथा बौद्ध करते हैं।

एक अन्य बात यह और है कि जब एक जैन किसी दूसरे के उपनाम के साथ जैन लिखा देखता है तो निःसन्देह उसे प्रसन्नता होती है। उसे एक बल मिलता है कि चलो हमारे जैसे आचार-विचार वाला एक और मिला। ऐसा खासकर नौकरियों तथा व्यापार-उद्योगों के कारण बाहर निकल जाने वालों के साथ अधिक होता है। एक-से आचार-विचार वालों से मिल कर प्रसन्नता तो होती ही है, आत्मीयता भी बढ़ती है। दूसरा व्यक्ति जैन है या नहीं, यह उसके उपनाम जैन को देख कर ही आसानी से पता लगाया जा सकता है। यदि दूसरे व्यक्ति का उपनाम जैन नहीं हो तो उसके पहिचानने में कठिनाई हो सकती है।
यह सब एक पक्ष है। अब हम दूसरे पक्ष पर भी विचार करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व में बम्बई गया था। वह मेरे एक जैन मित्र रहते थे। भादों का महीना था तथा पर्युषण पर्व चल रहे थे। जब में उनके घर पहुंचा, तब वे अपनी पत्नी से बोले कि आज अनिल आ गया है, अतः सारे अण्डे अभी खत्म कर दो, इसे तो इनसे परहेज है। ऐसा वह अकेला ही नहीं है, अनेक जैन हैं जिन्हें आचार-विचार की ओर कतई कोई ध्यान नहीं है। क्या जैन, क्या भादों और क्या पर्युषण उन्हें इन सबसे कोई मतलब ही नहीं है।

यदि व्यक्ति को जन्म के आधार पर जैन माना जाता रहा तो आगे चल कर जैनों में भी खान-पान के आधार पर दो भेद पाये जाएंगे। एक वे जैन जो शाकाहारी हैं तथा दूसरे वे जो मांसाहारी हैं”, और बाद में लोग कहेंगे कि जैन मांसाहारी भी होते हैं। यदि आचरण में इसी प्रकार की गिरावट बनी रही तो मांसाहारी जैन बढ़ जाएंगे तथा फिर यह कहा जाने लगा कि कुछ जैन शाकाहारी भी होते हैं। अतः हम यदि चाहते हैं कि भविष्य में लोग यह कहें कि जैन शाकाहारी तथा मांसाहारी दो प्रकार के होते हैं तो जन्मना जैन मानना ठीक है। वैसे जैनों की एक सूक्ति प्रसिद्ध है ‘मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म से महान बनता है’। मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म से जिन बनता है तथा मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से ही जैन बनता है; लेकिन तब इस पर भी पानी फिर जाएगा।

कोई यहाँ कह सकता है कि आज वह आचार-भ्रष्ट है, कल को संभल भी सकता है। यह सैद्धान्तिक रूप से तो सही है; लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देख कर ऐसा नहीं लगता है। पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव तथा प्रत्येक के चरित्र में कमी के कारण हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। सुधरने के आसार तो न के बराबर ही हैं। आज यदि एक जैन अण्डा खाता है, तो आने वाले कल में यह संख्या एक से अधिक ही होगी। दूसरी बात यह और कि मानो कल वह संभल भी गया तो उसे कल फिर जैन मान लिया जाएगा, लेकिन वर्तमान में ऐसा मानना अनुचित ही है।

कुछ लोग यह सोचते हैं कि जिस प्रकार मुसलमान, बौद्ध तथा ईसाइयों ने धर्म के साथ-साथ स्वयं की एक जाति भी बना ली है. उसी प्रकार जैनों को भी करना चाहिये। मेरा यहाँ मतभेद है; क्योंकि हम उनसे अपनी तुलना कर ही नहीं सकते। दिखावे के लिए हम स्वयं की एक ही जाति ‘जैन जाति’ भले ही बना लें, पर यह ‘जैन जाति’ अनेक जातियों में विभक्त है और यह विभाजन यहाँ तक है कि एक ‘जैन जाति’ वाला दूसरी ‘जैन जाति’ में विवाह नहीं कर सकता है। जबकि मुसलमान, बौद्ध तथा ईसाइयों में ऐसा नहीं है। इसी कारण उनकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, उनके धर्म का विस्तार हो रहा है, जबकि जैनधर्म के साथ उल्टा होता ही दीखता है। वे लोग आपस में रोटी-बेटी व्यवहार रखते हैं, जैन ऐसा नहीं करते हैं। यदि आज कोई नव-ईसाई, नव-मुस्लिम या नव-बौद्ध बन रहा है तो पुराने ईसाई, मुस्लिम, या बौद्ध उन्हें सहज ही स्वीकार कर लेते हैं तथा आपस में विवाह संबंध भी कर लेते हैं। इस कारण अनेक लोग जो जैन धर्म स्वीकार करना कहते हैं, नहीं कर पा रहे हैं। आज जो जैन जातियाँ है, उनमें परस्पर विवाह-संबंध होने को भी अनेक जैन गलत मानते हैं, तब यदि नव-जैन बन भी गये तो क्या उन्हें पुराने जैन अपनायेंगे?

ईसाई, मुस्लिम तथा बौद्धों की जनसंख्या में वृद्धि और प्रसार का एक कारण और भी है, वह है खान-पान। उनके खान-पान में कोई कट्टरता नहीं है। वे सब कुछ खा सकते हैं; जबकि ‘जैन’ बनने के लिए सबसे पहले कई पदार्थों के खाने का त्याग करना पड़ता है। खान-पान में इस नियंत्रण के कारण पहली बात तो यह कि कोई नया जैन बनता ही नहीं है और यदि बहुत से खाद्य पदार्थों को छोड़ने के बाद वह जैन बन भी गया तो वह अपने बच्चों की शादी अपनी पुरानी जाति में न करके किसी जैन आचार-विचार वाले के यहाँ ही करना चाहेगा, लेकिन जैन अंतर्जातीय विवाह करते नहीं हैं, अतः नव-जैन के बच्चों से तो विवाह करेंगे नहीं। ऐसी स्थिति में नव-जैन क्या करेगा? एक ओर वह अपनी पुरानी जाति में विवाह नहीं करना चाहता क्योंकि वहाँ मांस, मदिरा आदि अभक्ष्यों का सेवन होता है तथा दूसरी ओर जैन उसे स्वीकारेंगे नहीं। इस सब मगजमारी के कारण कोई भी नया जैन पैदा नहीं होता है। नये जैन पैदा न होने का एक अन्य कारण और भी है। हरिजनों के जैन मंदिर में प्रवेश पर रोक तो नहीं है; लेकिन उनके प्रवेश को अच्छा भी नहीं माना जाता है। हमारे कतिपय आचार्य तो उनके हाथ से छुए हुए पानी को पीने तक में पाप मानते हैं। ऐसी स्थिति में क्या कोई हरिजन जैन बनेगा?

एक ओर बहुत से जैन जैनधर्मानुसार आचरण न करके अण्डा, मांस और मदिरा का सेवन करने के कारण जैन रहे नहीं तथा दूसरी ओर नये जैन पैदा नहीं हो पा रहे हैं। इस प्रकार सही जैनों की जनसंख्या में दिन-प्रतिदिन कमी होती जा रही है। और जब सच्चे जैन ही नहीं रहेंगे तब जैनधर्म क्या रहेगा; क्योंकि धर्म, बिना धार्मिक के कैसे रह सकता है?

इस प्रकार दोनों पक्षों पर विचार करने पर तो यह निष्कर्ष निकलता है कि वर्तमान परिस्थितियों में नाम के आगे जैन लिखाने की अपील के दूरगामी दुष्परिणाम अधिक हैं तथा लाभ कम हैं; लेकिन इस अनुपात को बदला भी जा सकता है। इसके लिए हमारा यह कर्तव्य है कि हम जनगणना में नाम के आगे जैन लिखवाने की अपील से पूर्व यह घोषणा कर दें कि ‘प्रत्येक, जो भगवान् महावीर के सिद्धान्तों में विश्वास रखता है, वह जैन है चाहे फिर वह किसी भी जाति या वर्ण का क्यों न हो’। जैनों में परस्पर अंतर्जातीय विवाह होना कोई खराब बात नहीं, बल्कि अच्छी बात है। जो भी नया व्यक्ति जैनधर्म स्वीकार करता है, वह (नव-जैन) अपने बच्चों का विवाह किसी भी जैन के यहाँ कर सकता है तथा नाम के आगे ‘जैन’ लिख सकता है और  जो व्यक्ति मांस, मदिरा का सेवन करता है वह जैन नहीं हो सकता है; लेकिन यदि वह इनके सेवन को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ कर भगवान् महावीर के सिद्धान्तों को मानने लगे तब वह पुनः जैन बन सकता है। जब हम ऐसा कर पायेंगे, तभी हमारी अपील सार्थक होगी।
सन् 2020 में हुए एक सर्वे के अनुसार 8% जैन मांसाहारी है। जनवरी 2024 के एक समाचार में बताया गया है कि 15% जैन मांसाहारी हैं।

डॉ. अनिल कुमार जैन,
बापू नगर जयपुर

 

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