एक बार की बात है कि एक देहाती भोला भाला तथा सीधा-साधा व्यक्ति था । एक बार उसके मन में विचार उत्पन्न हुआ कि मैंने बम्बई शहर का नाम बहुत सुना है तो एक बार वहाँ की सैर कर आयें, देखें वहाँ पर कितने बड़े-बड़े होटल हैं ? कितनी मंजिल की बिल्डिंग है ? डबल स्टोरी की मोटर कैसी होती है ? और अपने विचारों की पूर्ति करने के लिये वह बम्बई की ओर चल पड़ा तथा कुछ घण्टों की यात्रा के दौरान वह पहुँच गया। वहाँ की चहल-पहल को, रंग-बिरंगी बड़ी-बड़ी बिल्डिंग को, बसों आदि को देखता है तो आश्चर्य करता है और सोचने लगता है-अरे! ये क्या? इतने सारे झुंड हैं। ऐसा देखते-देखते उसे आगे एक होटल नजर आता है। वह सोचता है-देहात में कहाँ, ऐसा होटल, चलो आज इसी होटल के पकवान खाये जाये। वह सभी होटलों में जाता है और कुछ न कुछ खाता है ऐसा करते-करते उसका जरुरत से ज्यादा पेट भर जाता है जिससे वे पकवान पेट में गड़बड़ करने लगे, उसे विकल्प उत्पन्न हो गया कि मैं शंका का समाधान कहाँ करूँ? देहात में चारों तरफ जंगल होता है पर बम्बई में तो…..। इस विकल्प ने उसके मन को अशांत कर दिया। वह सब कुछ भूल गया बस एक ही विकल्प कि किसी प्रकार पेट साफ हो जाये। वह जहाँ जाता उसे आदमी ही आदमी नजर आते। कुछ दूर जाने पर उसे एक पार्क नजर आया, वह वहाँ पहुँचा वहाँ बोर्ड पर लिखा था “यहाँ गंदगी करना सख्त मना है।” वह बेचैन हो गया और उसने चारों तरफ देखा और फिर सोचता है कि चारों तरफ सूनसान है अपना काम कर लूँ, पर मन कहता है कि किसी ने देख लिया तो बेमौत मारा जाऊँगा। फिर भी साहस करता है और अपना काम कर लेता है। इतने में दो सिपाही दौड़े चले आये जिसे देख वह घबड़ा गया कि अब मैं क्या करूँ ? क्या न करूँ ? सोचता है अगर ये देख लेगें तो मेरी पिटाई करेंगे। और वह जल्दी में अपनी पगड़ी उतारता है और उस पर रख देता है ।
सिपाही वहाँ पहुँचते और जोर से पूछते हैं क्यों यहाँ क्या कर रहे हो? बोला- साहब, वैसे ही आ गया था, बम्बई घूम रहा था थक गया था सो, आकर बैठ गया। पूछा पगड़ी क्यों उतारी ? साहब गर्मी लग रही थी । पुलिस वाले आगे बढ़ गये। पर थोड़ी देर में उनके मन में विचार आया, अरे यह देहाती है। उससे कुछ माल लेना चाहिए। और वे पुनः उस देहाती के पास पहुँच जाते हैं और उससे कहते हैं, चलो उठाओ, अपनी पगड़ी और जाओ यहाँ से । वह भयभीत हो जाता है सोचता है अगर पगड़ी उठाऊँगा तो सारी पोल खुल जायेगी और वह साहस करके बैठा रहता है। पुलिस वाले पुनः कहते हैं चलो उठो, जाओ यहाँ से। वह देहाती गिड़गिड़ाने लगा और कहने लगा- साहब, माफ करना…. दरअसल बात यह है कि मेरे घर में एक बहुत प्यारा तोता था। वह हमेशा राम-राम बोलता था, अगर द्वार पर टांग देते और कोई भी आता था, सभी का स्वागत करता था… एक दिन बेटे ने पिजड़ा खोल दिया तो तोता उड़ गया था काफी समय के बाद वह पकड़ में आया है, इसलिये मैंने पगड़ी से तोते को ढक दिया है सोच रहा हूँ, पहले पिंजरा ले आऊँ फिर तोते को ले जाऊँ, पर डर है कहीं मैं घर जाऊँ और तोते को कोई ले जाये, इसलिये । दोनों सिपाही सोचते है कि तोता तो अच्छा है, मौका भी अच्छा है, दोनों निगाहें मिलाते हैं, और एक-दूसरे के भावों को समझ जाते हैं ।
वे दोनों, देहाती को पिंजरा लेने भेज देते हैं। देहाती इसी ताक में था और वह वहाँ से ऐसा भागता है कि पीछे मुड़कर भी नहीं देखता । उधर दोनों सिपाहियों में विवाद हो गया कि तोता कौन लेगा ? अंत में निर्णय हुआ कि दोनों सिपाही एक-एक हाथ पगड़ी के अंदर डाले जिसके हाथ में तोता आयेगा, वही तोते को ले जायेगा। दोनों ने पगड़ी में हाथ डाला लेकिन तोता नहीं मिला, और गंदगी से हाथ खराब हो गये, जब हाथों को देखा तो दोनों के हाथ खराब थे। अतः मायाचारी से दूसरों को ठगने वाले के हाथ में गंदगी ही आती है तथा मायाचारी स्वयं ही ठगी जाती है ।
धर्म के साथ छल नहीं
एक बार की बात है कि एक सज्जन मंदिर में पहुँचे और वहाँ परमात्मा के दर्शन करने के उपरांत जाप करने खड़े हो गये। फटाफट फटाफट उनकी अंगुली चलने लगी । एक मिनिट में ६० बार से भी ज्यादा उनका अगूंठा घूम गया। देखने वाले सोचने लगे पता नहीं कौन से मंत्र की जाप कर रहा है। णमोकार मंत्र की तो हो नहीं सकती, ‘अ सि आउसा’ कहने में भी समय लगता है ‘ॐह्री नमः’ में भी समय लगेगा। ओम् ओम् बोल रहे होंगे, और एक व्यक्ति के मन में जिज्ञासा हुई, जब उनकी जाप पूरी हो गई और वे दर्शन करके जाने लगे तो उन सज्जन से पूछा भाई साहब! आप बड़ी तन्मयता से जाप कर रहे थे और आपकी अंगुली भी बड़ी तेजी से चल रही थी, आप कौन सी जाप कर रहे थे ? वे थोड़े शरमाये फिर बोले भैया ! आपसे क्या छिपायें मुझे जाप-वाप तो आती नहीं, मैं तो जाप के बहाने दुकान का हिसाब लगा रहा था। यह धर्म नहीं धर्म के नाम पर छल है इससे कभी भी व्यक्ति का उत्थान नहीं हो सकता अतः सदैव ध्यान रखें ! धर्म के साथ छल करना ठीक नहीं है ।
मायाचारी का परिणाम
बंग देश में एक सेठ रहता था, वह प्रकृति से दयालु और दानवीर था उसका नियम था कि रोज गरीब, दीन, अनाथ, लोगों को भोजन कराना और उसके बाद स्वयं भोजन करना । एक दिन सेठ जी को किसी दूसरे गाँव जाना पड़ा तब सेठ जी ने सेठानी को समझाया कि आज मैं दूसरे गाँव जा रहा हूँ आप भोजन करा देना। सेठ आदेश देकर चला गया। सेठानी ने सोचा रोज-रोज इतना सारा भोजन बनाना पड़ता है मैं रोज परेशान होती हूँ, सेठजी तो बनी हुई रसोई को दे देते हैं। आज मैं इन सब भिखारियों का काम तमाम किये देती हूँ। रोज की झंझट समाप्त हो जायगी । भाग्य से उस दिन सिर्फ एक ही भिखारी आया, उसको भोजन दिया और कहा कि आज मैं आपको अन्य दिन की अपेक्षा अधिक भोजन देती हूँ ताकि आपके परिवार का भी पेट भर सके । बेचारा भिखारी, सेठानी के छल को समझ नहीं पाया, भोजन घर ले जा रहा था रास्ते में सेठजी मिल गये वे भूख से पीड़ित थे एक पग भी नहीं चला जा रहा था, भिखारी ने निवेदन किया कि सेठ जी, मैं यह भोजन आपके घर से लाया हूँ, आप इसको खाकर अपनी भूख शांत कर लीजिए मैं आपके साथ चलूँगा और पुनः भोजन ले लूँगा । सेठजी ने उस भोजन को स्वीकार कर लिया और खाते ही चिर निद्रा में सो गये। सेठानी को पता चला कि सेठजी मेरे द्वारा निर्मित भोजन को खाकर स्वर्ग सिधार गये तब वह बहुत दुःखी हुई । जो दूसरों के लिये गड्ढा खोदता है उसके लिए पहले खाई खुद जाती है, ऐसी कहावत चरितार्थ हुई अतः जो मायाचारी करता है उसका फल उसे स्वयं को भोगना पड़ता है ।
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