श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

कर्म के भेद-प्रभेद

गतांक से आगे-

कर्म के मूल भेद

जैन कर्म-सिद्धान्त की दृष्टि से कर्म की आठ मूल प्रकृतियाँ हैं, जो प्राणियों को अनुकूल और प्रतिकूल फल प्रदान करती हैं। वे हैं- 1. ज्ञानावरण, 2. दर्शनावरण, 3. वेदनीय, 4. मोहनीय, 5. आयु, 6. नाम, 7. गोत्र, 8. अन्तराय।’ इनमें से ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय ये चार कर्म घातिया हैं, क्योंकि इनसे आत्मा के गुणों का घात होता है। शेष चार कर्म अघातिया हैं, क्योंकि ये आत्मा के किसी गुण का घात नहीं करते, बल्कि आत्मा को एक ऐसा रूप प्रदान करते हैं जो उसका निजी नहीं है, अपितु वैभाविक है।

ज्ञानावरण कर्म से आत्मा के ज्ञान गुण का घात होता है। दर्शनावरण कर्म आत्मा के दर्शन-गुण का घात करता है। मोहनीय कर्म जीव के सम्यक् श्रद्धा और चरित्र-गुण को नष्ट करता है। अन्तराय कर्म से जीव का वीर्य अर्थात् शक्ति का घात होता है। वेदनीय कर्म जीव को सुख-दुःख का वेदन/अनुभव कराता है। आयु कर्म से आत्मा को नरक आदि गतियों की प्राप्ति होती है। नाम कर्म के कारण जीव को चित्र-विचित्र शरीर और गतियाँ मिलती हैं तथा गोत्र कर्म प्राणियों में उच्चत्व और नीचत्व का कारण है। इन आठ कर्मों के कार्यों को दर्शाने के लिए आठ उदाहरण दिये गये हैं। “ज्ञानावरणी” कर्म का कार्य कपड़े की पट्टी की तरह है। जिस प्रकार आँख पर बँधी पट्टी दृष्टि की प्रतिबन्धक है, वैसे ही ज्ञानावरण-कर्म ज्ञान-गुण को प्रकट नहीं होने देता। दर्शनावरणी कर्म प्रतिहारी की तरह है। जिस प्रकार द्वारपालों की सहमति के बिना किसी महल में प्रवेश नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार दर्शनावरण-कर्म जीव को अनन्त-दर्शन करने से रोकता है। “वेदनीय” कर्म तलवार की धार पर लगे शहद के स्वाद की तरह होता है, जो एक क्षण को सुख देता है, पर उसका परिणाम दुःखद होता है। “मोहनीय” कर्म मद्य की तरह है। जिस प्रकार मद्य के नशे में व्यक्ति को अपने हित अहित का विचार नहीं रहता तथा वह कर्त्तव्य और अकर्तव्य का विचार किये बिना कुछ भी आचरण करता है, उसी प्रकार मोहनीय कर्म भी जीव को विवेक-शून्य कर उसकी आचार और विचार शक्ति को विकारी बना देता है। “आयु” कर्म खूँटे की तरह है। जिस तरह खूंटे से बंधा पशु उसके चारों ओर ही घूमता है, वैसे ही आयु कर्म से बँधा जीव उसका उल्लंघन नहीं कर सकता। “नाम” कर्म चित्रकार की तरह है। जिस प्रकार चित्रकार छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे अनेक प्रकार के चित्रों का निर्माण करता है, उसी प्रकार नाम कर्म जीव के चित्र-विचित्र शरीर का निर्माण करता है। “गोत्र” कर्म कुम्हार की तरह है। जिस प्रकार कुम्हार छोटे-बड़े बर्तनों का निर्माण करता है, उसी प्रकार गोत्र कर्म जीव को उच्च और नीच कुलों में उत्पन्न कराता है। “अन्तराय” कर्म भण्डारी की तरह है। जिस प्रकार भण्डारी की सहमति के बिना राजकोष से धन नहीं निकाला जा सकता, उसी प्रकार अन्तराय कर्म जीव की अनन्त-शक्ति का प्रच्छादक है।

इस प्रकार ये आठ कर्म के मूल भेद हैं, किन्तु इनकी उत्तर प्रकृतियाँ (प्रभेद) 148 हो जाती हैं।

 

कर्म के उत्तर भेद

  1. ज्ञानावरण कर्म-

ज्ञानावरण कर्म जीव के ज्ञान गुण को आच्छादित/आवृत करता है, जिसके कारण इस संसार अवस्था में उसका पूर्ण विकास नहीं हो पाता। जिस प्रकार देवता की मूर्ति पर ढका हुआ वस्त्र देवता को आच्छादित कर लेता है, उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्म ज्ञान को आच्छादित किये रहता है।’ इतना होने पर भी वह जीव की ज्ञान-शक्ति को पूर्णरूप से आवृत नहीं कर पाता। जिस प्रकार दिन में सघन-घटाओं से आच्छादित रहने पर भी सूर्य-प्रकाश का अभाव पूर्णरूप से नहीं हो पाता, उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्म का तीव्रतम उदय होने पर भी वह जीव की ज्ञान-शक्ति को पूरी तरह से नष्ट/आवृत नहीं कर सकता, जिससे कि जीव सर्वथा ज्ञान-शून्य होकर जड़वत् हो जाये। ज्ञानावरण कर्म के पाँच उत्तर भेद हैं-

  1. मति-ज्ञानावरण, 2. श्रुत-ज्ञानावरण, 3. अवधि-ज्ञानावरण, 4. मनः पर्यय-ज्ञानावरण, 5. केवल-ज्ञानावरण।’

प्रथम चारों कर्म क्रमशः मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान को आवृत तथा हीनाधिक करते हैं और पाँचवाँ केवल ज्ञानावरण कर्म केवलज्ञान को उत्पन्न नहीं होने देता।

ज्ञानावरण कर्म-बन्ध के कारण निम्न कारणों से ज्ञानावरण कर्म का विशेष बन्ध होता है-

  1. ज्ञान, ज्ञानी तथा ज्ञान के साधन के प्रति द्वेष रखने से।
  2. ज्ञान-दाता गुरुओं का नाम छिपाने से।
  3. ज्ञान, ज्ञानी तथा ज्ञान के साधनों का नाश करने से।
  4. ज्ञान के साधनों की विराधना करने से।
  5. किसी के ज्ञान में बाधा डालने से।

    2. दर्शनावरण कर्म –

पदार्थों की विशेषता को ग्रहण किये बिना केवल उनके सामान्य धर्म का अवभास करना दर्शन है। दर्शनावरण कर्म उक्त दर्शन गुण को आवृत करता है। दर्शन गुण के सीमित होने पर ज्ञानोपलब्धि का द्वार बन्द हो जाता है। इसकी तुलना राजा के द्वारपाल से की जा सकती है। द्वारपाल राजा से मिलने में किसी व्यक्ति को बाधा पहुँचाता है। जिस प्रकार द्वारपाल की अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति राजा से नहीं मिल सकता, वैसे ही दर्शनावरण कर्म वस्तुओं के सामान्य बोध को रोकता है। पदार्थों को देखने में अड़चन डालता है। इसकी नौ उत्तर प्रकृतियाँ हैं- 1. चक्षु दर्शनावरण, 2. अचक्षु दर्शनावरण, 3. अवधि दर्शनावरण, 4. केवल दर्शनावरण, 5. निद्रा, 6. निद्रा-निद्रा, 7. प्रचला, 8. प्रचला-प्रचला, 9. स्त्यान-गृद्धि।

“चक्षु दर्शनावरण कर्म” नेत्रों द्वारा होने वाले सामान्य अवबोध को रोकता है। चक्षु के अलावा शेष इन्द्रियों से होने वाले सामान्य बोध को “अचक्षु दर्शनावरण” रोकता है। “अवधि-दर्शनावरण” इन्द्रिय और मन के बिना होने वाले रूपी पदार्थ के सामान्य बोध को रोकता है तथा केवल दर्शनावरण कर्म सर्वद्रव्यों और पर्यायों के युगपत् होने वाले सामान्य अववोध को व्यक्त नहीं होने देता।

हल्की नींद को निद्रा कहते हैं। ऐसी नींद कि प्राणी आवाज लगाते ही जाग उठे, “निद्रा कर्म” से उत्पन्न होती है। “निद्रा-निद्रा” कर्म के उदय से ऐसी नींद आती है, जिससे प्राणी बड़ी मुश्किल से जाग पाता है।’ प्रचला कर्म के उदय से जीव खड़े-खड़े या बैठे-बैठे ही सो जाया करता है।’ प्रचला-प्रचला कर्म के उदय से नींद में मुख से लार बहने लगती है तथा हाथ-पैर आदि चलायमान हो जाते हैं। “स्त्यान-गृद्धि कर्म” के उदय से ऐसी प्रगाढ़तम नींद आती है, जिससे व्यक्ति दिन में या रात्रि में उठना-बैठना, चलना आदि अनेक क्रियायें निद्रावस्था में ही सम्पन्न कर देता है।

निद्रा में आत्मा का अव्यक्त उपयोग होता है, अर्थात् उसे वस्तु का सामान्य आभास नहीं हो सकता। इसलिए “निद्रा” के पाँच भेदों को दर्शनावरण कर्म के उत्तर भेदों में परिगणित किया गया है। चक्षु दर्शनावरण आदि चारों दर्शनावरणी-कर्म दर्शन-शक्ति की प्राप्ति में बाधक होते हैं।

दर्शनावरण कर्म-बन्ध के कारण – जिन कारणों से ज्ञानावरण कर्म का बन्ध होता है, दर्शनावरण कर्म भी उन्हीं साधनों से बँधता है। अन्तर केवल इतना है कि यहाँ ज्ञान और ज्ञान के साधन न होकर, दर्शन और दर्शन के साधनों के प्रति वैसा व्यवहार होने पर, दर्शनावरणी बन्धता है।

  1. वेदनीय कर्म –

जो कर्म-जीव को सुख या दुःख का अनुभव कराता है, वह वेदनीय कर्म है। यह दो प्रकार का होता है-1. साता वेदनीय एवं 2. असाता वेदनीय। जिस कर्म के उदय से प्राणी को अनुकूल विषयों के संयोग से सुख का अनुभव होता है, वह “साता” वेदनीय कर्म है। जिस कर्म के उदय से प्रतिकूल विषयों का संयोग होने पर दुःख का संवेदन होता है वह “असाता” वेदनीय कर्म है। वेदनीय कर्म की तुलना मधु से लिप्त तलवार से की गयी है। जिस प्रकार शहद से लिप्त तलवार की धार को चाटने से पहले अल्प-सुख और फिर अधिक दुःख होता है, वैसे ही पौद्गलिक सुख में दुःखों की अधिकता होती है। मधु को चाटने के समान, साता-वेदनीय है और जीभ कटने की तरह असाता-वेदनीय है।’

वेदनीय कर्म-बन्ध के कारण- सभी प्राणियों पर अनुकम्पा रखने से व्रतियों की सेवा करने से, दान देने से, हृदय में शान्ति और पवित्रता रखने से साधुओं या श्रावकों के व्रत पालन करने से, कषायों को वश में रखने से साता-वेदनीय कर्म का बन्ध होता है।’

इसके विपरीत, स्वपर को दुःख देने से, शोकमग्न रहने से, किसी को पीड़ा पहुँचाने आदि आचरण करने से दुःख के कारणभूत असाता वेदनीय कर्म का बन्ध होता है। असाता वेदनीय कर्म के फलस्वरूप देह सदा रोग-पीड़ित रहती है तथा बुद्धि और शुभ क्रियाएँ नष्ट हो जाती हैं। यह प्राणी अपने हित के उदयोग में तत्पर नहीं हो सकता।

साभार –
जैन धर्म और दर्शन
मुनिश्री प्रमाणसागर

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