गतांक से आगे—
3- तीसरे भव में 8 वें देवलोक में-–
सहस्त्रार कल्प में 10 सागरोपम की आयु वाला देव हुआ।देव शैया में उसका जन्म हुआ और तत्काल तीस वर्ष के युवा के समान होगया। देवगति में बाल्य और वृद्ध अवस्था नहीं होती। उस समय वहां अखंड रत्नों के कुण्डलो से शोभित गंडस्थल के कारण मनोहर मुख वाली ,जगमग करती झांझरो से सुशोभित पैरों वाली , विलास सहित उछाले हस्त रूपी लता से स्तनों को प्रकट करती हुई ,लांक्षन विहीन पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान निर्मल मुख वाली ,कमल सदृश नयनो वाली नक्षेत्रो की श्रेणी की आशंका उत्पन्न करने वाले ,मोतियों के हार से व्याप्त कण्ठ वाली, निर्मल और अनुपम काचंली और देवदुष्य वस्त्र से शोभायमान ,श्रृंगार की गुरुता को वहन करती और हास्य प्रीति द्वारा विशेष रूप से काम की वृद्धि करने वाली देवियों ने कहा कि- हे भद्रे..आपकी जय हो..आप आनंद पाएं.. जय हो..जय हो..विजय हो..हमारे ऊपर प्रसन्न हो..आप हम अनाथों के नाथ हुए है ..आज ही पुण्य दिवस हुआ है..आज मंगल हुआ..आज पुण्य का समागम हुआ..आज ही स्वर्ग आबाद हुआ है..कि..हे नाथ आप यहां उत्पन्न हुए हैं।
कितनीक देवियाँ दर्पण लेकर खड़ी हुई,कितनीक चामर युगल ढोरने लगी,कितनीक पुष्पमालाएं, कितनीक स्वेत छत्र लेकर उपस्थित हुई।वे सब जल्दी जल्दी समयोचित कार्य करने लगी। देवियों से परिवृत्त यह देव मनोहर भोग भोगने लगा।
वह देव नंदीश्वरद्वीप में जाकर सुन्दर विलासयुक्त नृत्य ,गीत और पूजा द्वारा मनोहर अष्टान्हिका महोत्सव अतिशय भक्ति से करता था। विदेहादिक क्षेत्रो में साक्षात विहरण करने वाले, यक्षो , इंद्रो, विद्याधरों, नरो एवं किन्नरों द्वारा स्तुत चरण कमल वाले अरिहंतो को वन्दना करता था। संसार रूपी गम्भीर महासागर में पड़ते हुए जीवो को बचाने में जहाज के समान उन अरिहंतो से सद्धर्म के सार को भलीभांति सहर्ष श्रवण करता था। शास्त्र श्रवण की इच्छा में आसक्त मन वाला वह देव क्रीड़ा मात्र में सर्व शास्त्रों के परमार्थ को ग्रहण किये हुए मुनियों की भक्ति पूर्वक सेवा करता था।
किसी किसी समय प्रभु के जन्मोत्सव में सम्मिलित हुए इंद्रो और देवो के समूह के साथ मेरु पर्वत पर स्थित जिनेश्वर का स्वर्ण कलश के जल से स्नात्र करता था।किसी समय स्वयं अकेला ही भक्ति पूर्वक मणि स्वर्ण और रजत के तीन परकोटों वाले और छत्र आदि से मनोहर तीर्थंकर भगवान के समवशरण की रचना करता था।किसी समय कमल,मालती,केतकी और मंदार के पुष्पो की मालाओं के समूह से अपने हाथ से शाश्वत जिन प्रतिमाओं की पूजा करता था।
किसी समय रम्भा के समान मनोहर देवियों के कटाक्ष की और अपने नयनो को उछालता हुआ वह देव नंदनवन में स्थित बाबड़ी में क्रीड़ा का आरम्भ करता था।महान वैभव वाले पांच प्रकार के विषय सुख को भोगता हुआ काल की यापन करने लगा। आयु पूर्ण होने पर वहां से च्यवन करके चौथे भव में किरण वेग विद्याधर हुआ।
4- चौथे भव में किरणवेग विद्याधर—
इसी जम्बूद्वीप के पूर्व महाविदेह क्षेत्र में सुकच्छ नामक विजय में ,तिलकपुर नगर में विद्युतगति विद्याधर राजा की तिलकावती पटरानी की कुक्षी में, शुभ स्वप्न के साथ यह देव पुत्र के रूप में गर्भ में आया।
जन्म होने पर पांच धाय माताओं को सौप दिया गया। वह पर्वत की गुफा में स्थित कल्पवृक्ष के समान वृद्धि को प्राप्त हुआ। किरणवेग नाम रखा गया।युवावस्था में पहुचने पर पद्मावती कन्या के साथ पाणिग्रहण कराया गया।उसने आकाशगामिनी विद्या साधी।वह पद्मावती के साथ विविध प्रकार की क्रीड़ा करते हुए काल यापन करने लगा।
एक बार राजा कुसुमावतन्स उद्यान में गया। उस समय वह् मानो स्वयं ही सूर्य हो ऐसे आकाश रूपी आंगन को प्रकाशित करते हुए श्रुतसागर सूरीश्वर वहा पर पधारे थे।उनके महात्म्य से प्रसन्न हुए उस प्रदेश के देवता द्वारा निर्मित श्रेष्ठ वर्ण के सौ पत्तो वाले कमल के ऊपर वे विराजमान हुए। परिवार सहित राजा और नगर निवासी जनो ने उनके चरणकमलों में नमन किया। धर्मलाभ देकर देशना दी–
सर्व प्रथम गर्भ में उत्पन्न होने का दुःख भोगना पड़ता है।तत्पश्चात योनि में से बाहर निकलने का अतितिक्षण दुःख प्रत्यक्ष ही है।फिर दांतो की उत्पत्ति के कारण गले और तलुवे में ताड़ना की पीड़ा का अनुभव होता है।फिर विविध प्रकार की सैकड़ो दुःसह व्याधियां ,उनके कारण व्याप्त होने वाली नीरसता,वृद्धावस्था और मरण । ये सभी दुःख रूप है। इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोग की प्राप्ति होती है। ये सब दुःखो से जिनेश्वर का धर्म ही मुक्त कर सकता है। कुशल और धीर पुरुष ही धर्म की वृद्धि कर सकते है।
राजा ने किरणवेग का राज्याभिषेक करके दीक्षा अंगीकार कर ली। षट अट्ठम आदि तपस्या के कारण कृश शरीर वाले उस राजर्षि ने अन्त में अनशन करके मोक्ष प्राप्त किया। विद्याधरों का राजा किरणवेग चतुरंगी सेना द्वारा शत्रुओं के गर्व को नष्ट करता हुआ ,अत्यंत स्फुरायमान प्रताप द्वारा दुसरो के तेज का विघात करता हुआ ,क्रोधयुक्त दृष्टि डालने मात्र से दुःसाध्य कार्य को सिद्ध करता हुआ और पूर्वकृत पूण्य रूपी कल्पवृक्ष के अनुरूप सुख का उपभोग करता हुआ इंद्र की तरह यथेष्ट रमण करने लगा। पद्मावती रानी ने पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम किरणतेज रखा गया।
एक दिन उद्यानपाल ने आकर हर्ष के साथ कहा- देव, अपने सोभ्यभाव से चंद्र का पराभाव करनेवाला, तप के तेज से साक्षात सूर्य का भी तिरस्कार करने वाले सुरगुरु सूरीश्वर का पदापर्ण हुआ है। यह सुनते ही राजा किरणवेग अन्य राजाओं, परिवार तथा प्रजाजनों के साथ वहां पहुचा। सूरीश्वर को तीन प्रदक्षिणा करके एवं आदर के साथ वन्दना करके बैठा। सूरीश्वर ने धर्म कथा प्रारम्भ की। षष्ठ,अष्ठम,दशम,द्वादश बैगेरह दुष्कर तप करना प्रारम्भ किया। कुछ समय बाद वे गीतार्थ हुए । गुरु की आज्ञा लेकर , एकल विहार प्रतिमा अंगीकार करके ,आकाश मार्ग से गमन करके, विशेष प्रकार की तपस्या करने के लिए पुष्कर दीपार्द्ध में पधारे।वहां शाश्वत प्रतिमाओ को वन्दन किया।फिर अत्यंत प्रमोद के साथ वैताढय पर्वत के निकट स्थित हिमगिरि के समीप प्रतिमा योग में स्थित हुए। दिनोदिन शुभ भावना की वृद्धि होने लगी।
वह कुर्कट सर्प कमठ का जीव घोर पाप समूह को उपार्जित करके ,मृत्यु के वशीभूत होकर के यथार्थ नाम वाली धूमप्रभा नामक पाँचवी नरक भूमि में नारक हुआ। वहां शरीर के तिल तिल जितने टुकड़े किये जाते थे।वज्र जैसी कुल्हाड़ी से काटा जाता था।तिखीधार वाली बर्छियो से बीघा जाता था।ईख की तरह यंत्रों में पिला जाता था।जाज्वल्य आग से तपी हुई लोहे की शिला पर सुलाया जाता था। रूदन करने पर भी तपाया हुआ तांबा और सीसा पिलाया जाता था। बहुत भारी लोहे के रथ में जोता जाता था। पके मांस के टुकड़े खिलाए जाते थे।करवत के द्वारा लकड़े की तरह निरन्तर चीरा जाता था।नीचे प्रज्वल्लित अग्नि वाली कुम्भी में पकाया जाता था। धोबी जैसे कपड़े को पछाड़ता है उसी प्रकार शिला पर पछाड़ा जाता था। तपे हुए तांबे और सीसे के रस को प्रवाहित करने वाली नदी में पटक दिया जाता था। इसी प्रकार नारको द्वारा उत्पन्न किये गए भीषण दुःखो के समूह को सहन करता हुआ वह सत्तरह सागरोपम तक वहां रहा।
तत्पश्चात नरक का आयुष्य पूर्ण करके वहां से निकल कर उसी स्वर्णशैल के सन्निकटवर्ती निकुंज में एक योजना की शरीर अवगाहना वाला उदीयमान सूर्य मंडल जैसे रंग के दोनों नेत्रों वाला, अनेक प्राणियों का संहार करने वाला बड़ा सर्प हुआ।दुःसह यमराज के भुजदण्ड समान प्रचण्ड शरीर वाला वह विशालकाय सर्प ऐसा जान पड़ता था मानो अंजन पर्वत का वलय हो। इधर उधर भटकते उस सर्प ने मेरु पर्वत के समान निश्चल शरीर वाले और कायोत्सर्ग में स्थित राजर्षि किरणवेग को देखा। तत्काल पूर्वभव के अभ्यस्त और उदय में आये हुए बैर के कारण उछली हुई तीव्र कोप रूपी आग की ज्वाला से उसके नेत्र देदीप्यमान हो उठे। उसने भयंकर कर्कश और दृढ दाढो को उघाड़ा -मुख रूपी गुफा को फाड़ा।अपने रस्से के समान लम्बे शरीर से खम्भे के समान राजर्षि भगवान के शरीर को लपेट लिया।और अनेक स्थानों में डसा। फिर भी संसार के स्वरूप का चिंतन करने वाले और सम्यक चारित्र से सम्पन्न राजर्षि ने उस दुष्ट सर्प पर तनिक भी क्रोध नहीं किया।
सिद्ध भगवान की साक्षी से अनशन करके तथा सर्व जीवो को खमाकर पँचपरमेष्टि के स्मरण में तत्पर किरणवेग मुनीश्वर ऐसे शुभ ध्यान को प्राप्त हुए कि जिसके द्वारा धर्म पाकर पाँचवे भव में अच्युतकल्प में देव बने।
क्रमश:———
पारस मल जैन
जोधपुर