श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

श्री हनुमान जी की जैन धर्म प्रभावना

श्री हनुमान जी आदिपुर के राजा पवनंजय के सुपुत्र थे। इनकी माता का नाम अन्जना सुन्दरी था, जो महेन्द्रपुर के राजा श्री महेन्द्रकुमार की राजकुमारी थी। हनुमान जी के जन्मते ही उनकी माता सहित उनके मामा श्री अतिसूर्य विमान में बैठाकर अपने हुण देश में ले जा रहे थे कि वे खेलते हुए माता की गोद से उछल कर विमान से गिर पड़े। आकाश से एक जन्मते बालक का नीचे पृथ्वी पर गिरना उसकी माता के लिए कितना दु:खदाई हो सकता है ? परन्तु अन्जना सुन्दरी को गर्भ के समय ही एक जैन मुनि ने बता दिया था कि तुम्हारे चर्म शरीरी महापुरुष उत्पन्न होगा जो इसी भव से मोक्ष जायेगा l इसलिए उसको विश्वास था कि जैन साधु के वचन कदापि झूठे नहीं हो सकते l उसका पुत्र जीवित है, विमान से पृथ्वी पर उतरे तो उन्होंने देखा कि श्री हनुमान जी बड़े आनन्द के साथ अपने पांव का अगंठा चूस रहे हैं और जिस सुदृढ़ तथा विशाल पर्वत पर गिरे थे, वह खण्ड-खण्ड हो गया है माता अंजना सुन्दरी ने प्रेम से हनुमान जी को छाती से लगाया और उनकी इतनी प्रभावशाली शक्ति को देख कर उनका नाम महावीर रक्खा, परन्तु जब हुण देश की राजधानी में उनका पहला जन्मोन्सव मनाया गया तो हुण देश के नाम पर इनका नाम श्री हनुमान जी प्रसिद्ध हो गया। हनुमान जी वानर वंशी नरेश थे, वानर चिन्ह उनके झण्डे की पहिचान थी। कुछ लोग उनको सचमुच बानर जाति का समझते हैं, परन्तु वास्तव में वे महासुन्दर कामदेव और मानव जति के ही महापुरुष थे।

हनुमान जी का मोक्ष–
एक बार हनुमानजी मेरु पर्वत पर क्रीड़ा करने गये। संध्या का सुहावना समय था । वे प्राकृतिक दृश्य देख रहे थे कि अस्त होते हुए सूर्य पर उनके विचार अटके । वे सोचने लगे-संसार में उदय और अस्त चलता ही रहता है । आज जो उदय के शिखर पर चढ़ा हुआ है, वही कालान्तर में अस्त के गहरे गड्ढे में गिर जाता है । जो आज राव है,वह रंक भी हो जाता है । विजेता, पराजित हो जाता है और जो जन्म लेता है , वह मरता ही है । यह संसार की रीति है । उदयभाव से जीव उत्थान और पतन के चक्कर में घुमता रहता है । वे भव्यात्माएँ धन्य हैं जो संसार से उदासीन हो कर संयम और तप से संसार का छेदन कर, शाश्वत शांति प्राप्त कर लेती हैं । मुझे भी अब सावधान हो कर इस उदय-अस्त के चक्कर को काट देना चाहिए ।” इस प्रकार चिन्तन करते हुए हनुमान विरक्त हो गए । वे नगर में आये और पुत्र को राज्यभार सोंप कर आचार्य धर्मरत्न जी के पास निग्रंथ अनगार बन गए । उनके साथ अन्य सात सौ पचास राजा भी दीक्षित हुए । उनकी रानियों ने महासती श्री लक्ष्मीवतीजी के समीप प्रव्रज्या स्वीकार की । मुनिराज श्री हनुमानजी, साधना के शिखर पर चढ़़े और वीतराग सर्वज्ञ-सर्वदर्शी बने । फिर आयु कर्म पूर्ण होने पर मोक्ष को प्राप्त हुए ।

-तीर्थंकर चरित्र

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