श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

समाज सेवा का प्रशिक्षण

जैसा कि अपने बारे में हर व्यक्ति सोचता है, कि मैं यह कर सकता हूं, मैं यह बन सकता हूं, मेरा भी अपने बारे में बड़ा स्पष्ट सोच है कि, मुझ में एक श्रेष्ठ समाजसेवी के समस्त गुण कूट-कूट कर भरे हुए हैं। हालांकि और लोग इस मत के बारे में कुछ और ही मत रखते है और वे मेरे इस सोच से बिल्कुल सहमत नहीं है। मेरे घरवाले, घरवाली और अन्य सभी लोग और मेरे बीच में इस विषय को लेकर गहरे मतभेद हैं। उन लोगों का बहुमत होने के कारण मैं कभी-कभी खुद ही सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि मेरा मेरे बारे में आंकलन कहीं गलत तो नहीं है। मैं अपने सोच पर पुनः चिन्तन करता हूं और मुझे लगता है कि मेरा मेरे बारे में सोच सर्वथा उचित व्यवहारिक और विकासोन्मुख विचार है।
एक दिन मेरे घर मेरे एक पुराने मित्र आये। मैंने अपने सोच के बारे में उन्हें बताया। वे पहले तो विचार मग्न मुद्रा में अपने आप को भी भूल गये, वे यह भी भूल गये कि उनके सामने रखी चाय ठंडी पड़ती जा रही है, उन्होंने अनायास चाय के कप को उठाया और एक ही घूंट में पूरा कप खाली कर दिया। मैंने पूछा चाय ठन्डी हो गईं लगती है, तो वे बोले कोई बात नहीं। फिर विचारमग्न मुद्रा को प्रश्नात्मक मुद्रा बनाते हुए पूछा कि तुम इस खेल के किसी पुराने खिलाड़ी को जानते हो क्या? मैंने उनसे कहा कि मैं तो समाज के जाने माने समाजसेवियों में से कई कि संगत में रहा हूं, उनकी हर बात में हां में हां भरने का पार्टटाइम काम मैंने अनेकों बार किया है। उन सबसे प्रेरित हो कर ही तो मैंने अपने बारे में यह पुख्ता विचार विकसित किया है, कि मुझमें एक समाज सेवी के पूरे गुण हैं और मुझे इस फील्ड में अपने भाग्य और भविष्य को आजमाना चाहिए, पर मालूम नहीं क्यों घर-परिवार, रिश्तेदार – नातेदार और शुभचिंतक मेरे इस विकासोन्मुखी विचार के क्यों खिलाफत करने पर तुले हैं। वह लोग मेरे भविष्य को बनते हुए नहीं देखना चाहते। मित्र फिर विचारों में मग्न हो गये, एक लम्बी चुप्पी के बाद वे बोले- तुम इस विषय के किसी स्पेशलिस्ट को अपना गुरु क्यों नहीं बना लेते, उनसे समाज सेवा के सारे गुर सीख कर फिर अपने भविष्य के विकास पर लगो तो ज्यादा कारगर होगा।
हमने दोनों ने मिलकर अनेकों समाज सेवियों के क्रियाकलापों पर गहन चिंतन-ममन कर सर्वश्रेष्ठ समाज सेवी के रूप में श्री संतजी को उपयुक्त श्रेष्ठ और विकासोन्मुखी समाज सेवी के रूप में चिन्हित कर यह विचार पुख्ता किया कि मुझे कुछ समय श्री संतजी से गुरू ज्ञान लेना चाहिए।
हमारे मित्र महोदय ने मुझे सलाह दी कि रविवार दिन 21 जुलाई को गुरू पूर्णिमा है, सो तुम प्रात: ही स्नान- ध्यान वंदन कर, नारियल और सवा रुपये, अरे नहीं नहीं सवा से झंझट रहेगा सो 5 रूपये ज्यादा ठीक रहेंगे, लेकर श्री सन्तजी के दरबार में पहुंच कर उनके श्री चरणों में श्रीफल व 5 रु. रख कर विनय की जाये कि कृपया मुझे आप अपने शरण में लेकर ऐसा गुरू ज्ञान दे कि मैं एक सफल समाजसेवी के रूप में स्थापित हो सकूं।
दूसरे दिन ही गुरू पूर्णिमा थी, सो हम, हम से तात्पर्य मैं और मेरे मित्र महोदय दोनों स्कूटर पर आगे पीछे बैठ कर श्री सन्तजी के निवास की ओर कूच कर गये, रास्ते में मित्र महोदय ने कान में फुसफुसाया कि थोड़ी मिठाई और फूल माला भी ले चलते तो ठीक रहेगा। हमने तुरन्त स्कूटर को हलवाई की दुकान पर रोका, वहां से पाव भर इमरती खरीदी। पास में ही देवी का मन्दिर था वहां से गेंदे की माला खरीदी और सीधे श्री संत जी के निवास पर पहुंच गए। हमारे भाग्य से श्री सन्तजी उस समय नीचे बैठक में ही कुछ शागिर्दो से घिरे बैठे थे। मित्र महोदय ने मुझे रास्ते में ही समझा दिया था, कि तुम तो जाते ही श्री सन्तजी श्रीचरणों में नतमस्तक होकर निवेदन कर देना कि आज गुरू पूर्णिमा का पावन दिन है, यह अज्ञानी अपने आप को आपके श्रीचरणों में समर्पित होने के लिये उपस्थित हुआ है, मेरो अर्ज सुन लीजिये और अपने पवित्र श्रीचरणों में स्थान देकर मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर समाज सेवा के उत्तरदायित्व निर्वहन की शिक्षा देकर अनुगृहित कीजिये। हमने तय कार्यक्रम के अनुकूल अपने व्यवहार आचरण का क्रियान्वयन पूरी निष्ठा और निपुणता के साथ कर दिया।

श्री संतजी हमारे व्यवहार और समर्पण से इतने अभिभूत हुए कि श्रीफल के साथ जो गेंदे की माला हमने उनके श्रीचरणों में अर्पित की थी उसे उन्होने तुरंत उठाया और हमारे गले में डालते हुए यह आशीर्वचन कहे कि ‘हे अयोग्य बालक तुम्हारे इस गुरू बनाने के समर्पित भाव से हम अत्यन्त प्रसन्न हुए अतः इस गुरू पूर्णिमा के शुभ अवसर पर हम अपने शिष्य परम्परा के अनुकूल तुम्हें समाज सेवा के क्षेत्र में पारंगत करने का संकल्प लेते हैं। हमारे बताए हुए सिद्धांतों पर तुम खरे उतरो और अपने तीक्ष्ण ज्ञान से उसे जीवन की कसौटी पर घिस घिस कर निखारो यही हमारी अभिलाषा आज से तुम्हारे प्रति रहेगी। बाकि तुम्हारी उन्नति हमारे प्रति तुम्हारे समर्पण पर निर्भर करेगी। हम तुम्हें अपने इस महान गुरूकुल में आज से दाखिला देकर तुम्हारे भविष्य को गौरवान्वित बनाने का पूरा भरोसा दिलाते हैं। हमेशा हमारे आगे पीछे बने रहो, हमारे आचरण और व्यवहार पर अपनी पैनी नजर बनाये रखो, वैसे तो उसी में तुम्हारे आगे की दीक्षा निहित होगी। फिर भी अभी तुम बाहर बैठो हम जब तक अपने इन परम्परागत शिष्यों से कुछ गुप्त और गंभीर वार्ता कर लें फिर तुम से बात करेंगे।
गुरू जी के आशीर्वाद और संकेत को समझ हम दोनों तुरंत उठे और बाहर पड़े मुड्ढ़े पर आकर बैठ गये। हमारे बाहर निकलते ही गुरू जी के एक शिष्य ने भड़ाक से कमरे का दरवाजा बन्द कर लिया। मैं दरवाजे से कान लगाये बैठा रहा पर उन महान लोगों के बीच क्या खुसुर-पुसुर हो रही थी समझ नहीं पा रहा था, बस कुछ शब्द पकड़ने की नाकाम कोशिश कर रहा था। लगभग बीस मिनट बाद कमरे का दरवाजा खुला और ये चारो महान योद्धा मेरी और एक तीक्ष्ण निगाह डालते हुए विचित्र सी मुस्कान फेंकते हुए आगे बढ़ गये। वैसे कमरे का गेट खुलते ही मैं और मेरा मित्र खड़े हो गये थे बाहर निकलते ही उनमें से एक जिसकी कदकाठी किसी पहलवान से कम नहीं थी कुर्ता पायजामा शरीर पर धारण करे हुआ था उसने ठिठक कर मेरी ओर गौर से देखा फिर अपना उल्टा हाथ मेरे कन्धे पर रख कर मुस्कुराया और बिना कोई आशीष वचन बोले आगे बढ गया।
इतने में ही कमरे के अन्दर से आवाज आ गई, आ जाओ! संतजी तब तक सोफे पर आसन लगा कर गुरू मुद्रा में आ गये थे।
हम अन्दर जा कर हाथ जोड़ कर विनम्र शिष्य की भांति खड़े हो गये श्री सन्तजी ने प्रश्न किया कि समाज सेवा का प्रशिक्षण दोनों ही लेना चाहते हो या केवल तुम? मेरे मित्र ने तुरन्त हाथ जोड़ कर निवेदन कर दिया कि यही शिक्षा ग्रहण करना चाहते हैं, मैं तो इनका मित्र हूँ सो साथ आ गया! श्री सन्तजी ने मेरे मित्र को विनम्र भाव से कहा तो श्रीमान कुछ समय के लिए बाहर बैठो ! गुरु पूर्णिमा का पावन दिन है अतः आज से ही शिक्षा दिया जाना आवश्यक है। मेरे मित्र बाहर चले गये और मैं श्री संतजी के सामने कमरे में ही खड़ा रहा। जब मित्र कमरे से बाहर चले गये तब श्री सन्तजी ने कमरे की किवाड़ फेर लेने के लिए इशारा किया, मैंने किवाड़ भेड़ दिये। श्री सन्तजी ने सामने जो सोफा पड़ा था उस पर बैठने के लिए इशारा कर बैठने की आज्ञा प्रदान कर दी।
श्री सन्तजी ने मेरे बैठते ही अपने आशीष वचन इस प्रकार से देने शुरू किये-
बन्धु तुम बड़े भाग्यशाली हो, जो तुम आज ही हमारी शरण में आ गये, वैसे तो समाज सेवा के क्षेत्र में स्थापित होने के लिए आदमी का जीवन खप जाता है। बहुत जुतियां चटकानी पड़ती है। तुम्हारा भाग्य बहुत अच्छा है जो तुम इस समय हमारी शरण में आ गये। सुनो बन्धु समाजसेवा के क्षेत्र में गुरु शिष्य परम्परा पुराने जमाने का उपक्रम था, अब इस विकसित युग में यह परम्परा बन्धुत्व भाव से ओत-प्रोत हो गई है अतः तुम्हारे और हमारे सोच में सब कुछ पारदर्शी रहे इसलिये हमने आपको बंद कमरे में बन्धु कह कर बंधुत्व भाव का बोध करा दिया है, बाहर तुम्हें हमें गुरु या बॉस की भांति मान सम्मान देना होगा। इस बात को तुम गांठ बांध लो अब यह जान लो कि तुम भाग्यशाली क्यों हो, ताजा मिली खबरों के अनुसार चीन देश में कोरोना वायरस नामक कृत्रिम अवयव एक संक्रामक रोग फैलाने वाला है, जो दुनिया भर के देशों में फैल जाएग। जब दुनिया के सभी देशों में फैलेगा तो अपना देश कोई अनोखा तो है नहीं कि यहां पर इस वायरस की गरमाहट न आये, इस वायरस से पैदा हुए रोग से पूरी दुनिया प्रभावित होगी। बस वही समय होगा जब हम तुम्हें समाज सेवा के क्षेत्र में लांच करेंगे।

ध्यान रहे ! तब तक हम तुम्हें कुछ दिशा-निर्देश देकर तुम्हें परिपक्व करेंगे ताकि भविष्य में तुमसे कोई भूल-चूक न हो सके। आज बस इतना ही कल पुनः प्रातः 8 बजे पैन और स्लिपपैड लेकर यहां पर उपस्थित होना, आगे के दिशा-निर्देश कल देंगे।
दूसरे दिन हम श्री सन्तजी के निर्देश के अनुसार पैन और स्लिपपैड लेकर उनके निवास स्थान पर सही समय पर पहुंच गये। बैठक का दरवाजा बन्द दिखाई दे रहा था, सो हमें मजबूरन कॉलबेल बटन दबाना पड़ा, घंटी की आवाज सुनकर बालकॉनी के झरोखे में से मैक्सी पहने लगभग तीस वर्ष की महिला ने पूछा कौन है? हमने तुरन्त सतर्क होकर अपना परिचय देते हुए पूछा, साहब हैं क्या? उन्होंने बड़ा बुरा सा मुंह बनाते हुए हमें बताया कि अभी बाथरूम में हैं, आप बैठिये। हम बैठक के आगे पड़े हुए मुद्दों में से एक को खिसका कर बैठक के बाहर ही धरनार्थी की भांति बैठ गये ।
लगभग बीस मिनट बाद श्री सन्तजी ऊपर से नीचे उतरे, आते ही बैठक के किवाड़ खोले और हमें अन्दर आने का इशारा किया। हम उनके पीछे-पीछे बैठक में घुस गये। श्री सन्तजी जब तक सोफे पर अपना आसन लगाते तब तक हम खड़े रहे, जब वे सोफे पर विराजमान हो गये तब उन्होंने हाथ के इशारे से हमें भी सामने बैठने का संकेत करा, उनका इशारा पाते ही हम भी सामने वाले सोफे पर बैठ गये और अपना स्लिप पैड और पैन जागरूक छात्र की भांति सम्हाल लिया।
श्री संतजी ने अपने देरी से उतरने और हमारे इन्तजार पर अपने कोई विचार नहीं रखे, सीधे से बोले- अब देखो, हमें तुम्हारी योग्यता- वोग्यता के बारे में तो कुछ जानना है नहीं, अपने काम को कैसे और कितनी जल्द पिकअप करते हो उससे समाजसेवा के क्षेत्र में तुम्हारे कद का विकास अपने आप होता जायेगा, सब तुम्हारी लगन और पकड़ पर निर्भर रहेगा, जितनी ज्यादा लगन और पकड़ होगी उतना ही समाजसेवा के क्षेत्र में चमकते जाओगे।
समाजसेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए कुछ बुनियादी बातों को जानना आवश्यक है वह लिखने पढ़ने से नहीं आयेगी। जो हम तुम्हें बताने जा रहे हैं वह तुम्हारे दैनिनदिन व्यवहार में परिलक्षित होनी चाहिए, इसलिये यह जानना बहुत जरूरी है कि तुम काम क्या करते हो और समाज सेवा जैसे कार्य को कितना समय देना तुम्हारे लिए मुमकिन हो सकेगा। मैंने तुरन्त गुरूदेव की ओर मुखातिब होकर कहा कि सर मैं एकदम निठल्ला हूं मैं तो इसी काम के लिये पैदा हुआ हूं और सम्पूर्ण जीवन इसी काम की साधना-आराधना में लगा देना चाहता हूं। गुरूजी ने लम्बी हुंकार भरी और बोले तब ठीक है फिर पूछने लगे- स्कूटर चला लेते हो क्या? मैंने उत्साह के साथ कहा माननीय टूव्हीलर तो छोड़ो फोर व्हीलर कार, ट्रैक्टर, ट्रक आदि सब बखूबी ड्राइव कर लेता हूं। मोबाइल है? मैंने तुरंत जेब से बीस हजार वाला तीन कैमरे वाला मोबाइल निकाल कर दिखा दिया। मोबाइल देखने के उपरान्त गुरूजी बोले- आज के जमाने में समाजसेवा के क्षेत्र में वेल इक्यूप्ट होना बहुत जरूरी है क्योंकि सामाजिक सरोकारों को विकसित करने के लिए इन हथियारों का इस्तेमाल करने की विद्या में पारंगत होना भी आवश्यक है। व्हाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक आदि सामाजिक पोर्टलों का इस्तेमाल करना, उन्हें ऑपरेट करना भी जानते हो या नहीं सर, बिल्कुल जानता हूँ, अच्छी प्रकार से जानता हूं। अभी आपसे निवेदन किया ही है कि बिल्कुल निठल्ला हूँ, कोई काम-काज नहीं है, अतः इनके सहारे ही समय का काम तमाम करता हु । गुरूजी ने तुरंत कहा गुड़, वैरी गुड तुममें तो एक अच्छे समाजसेवी के काफी लक्षण तो बुनियादी रूप से हैं, अब तो तुम्हें बस थोड़ा सा मांझ कर परिष्कृत करना ही शेष है।
श्री संतजी बोले- तो बंधु कुछ बात नोट कर लो मैंने तुरंत पैड और पैन संभाला, तभी गुरू जी बोले- यह स्लिप पैड पर लिखने की जरूरत नहीं है, दिल और दिमाग में फिट करने की बात है, सो अपने दिमाग के चक्षु खोलो और इन बातों को आत्मसात कर अपने व्यवहार में गहराई से उतारना है पर प्रदर्शित नहीं होने देना है।

* जो दिखेगा वही बिकेगा – यह सूक्ती वचन है इसको गहराई से समझने के लिए तुम्हें कुछ समय हमारी लगातार सेवा में रहना होगा यह प्रयोगात्मक विषय है इसे व्याख्या करके नहीं समझाया जा सकता, अपने अनुभव और विवेक के शातिराना ढंग से ही इसमें महारत हासिल हो सकेगी।

·तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊं – यह भी प्रयोगात्मक विषय है, संगत से ही इसमें महारत हासिल हो सकेगी। समय- समय पर और किस समय इसका उपयोग किया जाता है, यह भी अनुभव से ही ज्ञान प्राप्त हो सकेगा।

* सारे क्रियात्मक प्रयोग लक्ष्य प्राप्ति के संकल्प से प्रेरित होने चाहिए – यह भी प्रायोगिक विषय है, अतः इसका ज्ञान भी सत्संग और समर्पण के दिखावे पर निर्भर करता है। अतः समयानुसार अपनी प्रेरणा, पुरुष के आचार-विचार और व्यवहार का तीक्ष्ण निरीक्षण परिक्षण से ही स्वतः ही प्रशिक्षित होते चले जाना होगा यह भी लिखित विषय नहीं है।

* समाजसेवा के व्यवसाय में उसी व्यक्ति को समर्पित भाव से आगे जाना चाहिए जिसकी चमड़ी मोटी हो। इस सूत्र का तात्पर्य है कि समाजसेवा के कार्य के लिए संकल्पित महानुभाव में बेशर्मी और बेहयाई का गुण आन्तरिक सुंदरता तक समाहित हो, वैसे तो यह अनुवांशिक गुण होता है परन्तु अच्छी संगत से भी इस गुण विकास की पूरी संभावना रहती है।

* समाज सेवा का अन्तिम सत्य राजनीतिक दृष्टिकोण का विकास है– समाज सेवा ऊपरी तौर पर दिखाये जाने वाला आवरण है इसका अंतिम प्रोजेक्ट राजनैतिक प्रभुसत्ता को हासिल कर अपना विकास करना है।

मूल रूप से इन सभी विषयों में सफलता प्रयोगात्मक प्रशिक्षण से ही हासिल की जा सकता है। इसमें थ्योरियां समयानुसार अदलती बदलती रहती हैं कुछ मूलभूत सामान्य गुण जो एक सफल समाज सेवी में होने चाहिये, जैसे- अपने आप को स्थापित करने के लिए झूठी कसमे खाना, दुनिया में बुराईयों को देखना और उनका संकलन करना, समय-समय पर उनकी उद्घोषणा करना, अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना, अपने चारों ओर ऐसे महत्वाकांक्षी लोगों को रखना जिनका लक्ष्य मात्र अपनी पहचान के लिए हां में हां मिलाना आवश्यक कर्म हो। समाज सेवा के क्षेत्र में अपने को स्थापित रखने के लिए झूठे मान पत्र या पुरस्कारों का जुगाड़ करना या समय की नजाकत को भांपते हुए किसी ऐसे व्यक्ति जिससे आप समाजसेवा के क्षेत्र में भविष्य में लाभान्वित होने वाले हो, उसके लिए या उसको प्रभावित करने के लिए जुगाड़ से उसे पुरस्कृत करवाना। मौकापरस्ती में अपने आप को इतना पारंगत कर लेना कि जो व्यक्ति कल तक आपके दृष्टि में लसोढ़ा था उससे यदि चंदा मिल जाये तो उसे कार्यक्रम अध्यक्ष बनाने पर आपके निमेषी भाव पर कोई फर्क न पड़े। यह छोटी-मोटी बातें हैं जिनका एक अच्छे स्थापित समाजसेवी में होना परम्परागत रूप से अच्छा माना जाता है।
हां तो बंधु, तुमने बताया था कि तुम फोर व्हीलर भी चला लेते हो, सामने जो गाड़ी खड़ी है उसे साफकर लो और चलो तुम्हें आज से ही कुछ प्रेक्टिकल प्रशिक्षण का अनुभव करवाते हैं, वैसे तुम्हें यदि कोई काम हो तो रहने देना, यदि न हो तो चलो आज हमारे साथ घूमो।
हमने गुरुजी की कार को नल में पाइप लगाकर अच्छी तरह से धोकर रगड़-रगड़ कर पोंछा फिर ड्राइवर की सीट संभाली और समाजसेवा के प्रयोगात्मक ज्ञान को पाने की लालसा में श्री संतजी के साथ निकल लिये।

अशोक कुमार जैन
2-बी, रामद्वारा कॉलोनी,
महावीर नगर, जयपुर

Leave a Reply