श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

स्वयं की शरण में

महावीर की भाषा संघर्ष की है। महावीर के पास शरणागति जैसा कोई शब्द ही नहीं है। महावीर कहते हैं, आशरण- भावना। किसी की शरण में मत जाना। अपने ही शरण में लौटना है। घर जाना है। किसी का सहारा मत पकड़ना। सहारे से तो दूसरा हो जाएगा। सहारे से तो दूसरा महत्वपूर्ण हो जाएगा। नहीं, दूसरे को त्यागना है, छोड़ना है, भूलना है। बस एक ही याद रह जाए, जो अपना स्वभाव है, जो अपना स्वरूप है- इसलिए कोई शरणागति नहीं।

महावीर गुरु नहीं है
महावीर कल्याण मित्र हैं। वे कहते हैं, मैं कुछ कहता हूं, उसे समझ लो, मेरे सहारे लेने की जरूरत नहीं है। मेरी शरण आने से तुम मुक्त न हो जाओगे। मेरी शरण आने से तो नया बंधन निर्मित होगा, क्योंकि दो बने रहेंगे। भक्त और भगवान बना रहेगा। शिष्य और गुरु बना रहेगा। नहीं दो को मिटाना है।

इसलिए महावीर ने भगवान शब्द का उपयोग ही नहीं किया
कहा कि भक्त ही भगवान हो जाता है।

इसे समझना। विपरीत दिखाई पढ़ते हुए भी यह बातें विपरीत नहीं है।

नारद कहते हैं, भक्त भगवान में लीन हो जाता है। भगवान ही बचता है, भक्त खो जाता है। महावीर कहते हैं,भक्त जाग जाता है अपनी परिपूर्णता में, भगवान खो जाता है। भक्त ने पहचान लिया अपना स्वरूप- भगवान हो गया। स्वरूप को पहचान लेना भगवत्ता है। इसलिए महावीर के धर्म में भगवान नहीं है,शरणागति नहीं है। शरण जाने को ही कोई नहीं है, जिसकी शरण चले जाओ। कोई प्रार्थना नहीं, कोई पूजा नहीं_ हो नहीं सकती, क्योंकि पूजा में तो दूसरा जरूरी होगा।

महावीर की भाषा ध्यान की है, पूजा की नहीं। ध्यान और प्रार्थना में यही फर्क है। प्रार्थना में दूसरा चाहिए। ध्यान में दूसरे को मिटाना है, भूलना है। इस तरह भुला देना है कि बस अकेले तुम ही बचो, शुद्ध चैतन्य बचे, दूसरे की रेखा भी न रहे, छाया भी न पडे।

शालू जैन
महावीर नगर जयपुर

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