श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

समाज सेवा की खेती

समाज सेवा करना जैसे मिर्च की खेती करना है। मिर्च हरी हो या लाल पीली हो या गुलाबी इसकी खेती-बाड़ी बाकी सब खेती किसानी से बहुत कठिन मानी जाती है। जिस प्रकार बहुत से किसान मिर्च के साथ कई फसलों को उगाते हैं, उसी प्रकार समाजसेवी किसान समाज सेवा की खेती के साथ-साथ विभिन्न विधाओं की खेती करके गाहे-बगाहे अच्छी समाज सेवा करने में पारंगत हो सकता है। कुछ पेशेवर समाजसेवी किसान जिनको जान-बूझकर समाज सेवा की खेती करने के लगातार दौरे पड़ते हैं। उनके लिए जानकारों का स्पष्ट मानना है कि जब तक किसी को मिर्च न लगे, वह समाज सेवा ही क्या ?
वैसे तो भारत के अलावा समाज सेवा की खेती अलग-अलग समुदायों, जाति, विरादरियों, गरीब, अमीर मध्यमवर्गीय, नर और मादा मजदूर, सेवक, मालिक आदि के अपने-अपने क्षेत्रों में की जाती है, परन्तु भारत में जुगाड़ से सबको मिलाकर भी यह खेती की जा सकती है। इस लिये भारतीय परम्परा के अनुसार समाज सेवा की खेती करना मतलब आंखों में मिर्च लगाना ज्यादा माना जाता है। समाज सेवा और मिर्च की खेती करना दोनों ही बहुत कठिन कार्य है। दोनों ही की खेती को चट करने वाले रोग और कीड़े एक ही जैसे है। इसलिये यहाँ आपको समाज सेवा की खेती के प्रारंभिक तौर-तरीके बता रहे है। इन्हें अंतिम नहीं माना जाना चाहिए। आप यदि समाज सेवा की खेती से जुड़ना चाहते हैं तो समय काल के अनुसार अपनी सुविधा, बुद्धि, विवेक से परिवर्तन कर सकते है ।
समाज सेवा की खेती के लिए हवा का रूख देखना आना चाहिए । गरजने – बरसने वाले बादलों की समझ समाज सेवा की खेती में मद्दगार साबित होगी। समाज सेवा की खेती के लिए सिर्फ पुरवा, पछवा हवा का रूख ही जानना जरूरी नहीं, बल्कि यह जानना भी जरूरी है कि इसके साथ-साथ कौन-कौन सी फसलों को ओर लगाया जा सकता है। नहीं तो ऐसा भी हो सकता है कि “आस-पास रबी बीच में खरीफ, नोन मिर्च डाल कर खा गया हरीफ।”
श्री संत जी ने समाज सेवा की खेती के सम्बन्ध में आगे बताया है कि समाज सेवा की खेती के साथ ऐसी फसलों को बोना चाहिए जिसमें ” न नमक लगे न कि फिटकरी रंग हो चोखा ही चोखा ” । जिस प्रकार मिर्च अकेले काम नहीं कर सकती उसी प्रकार समाज सेवा की खेती लाभ के स्थान पर नुकसान दे सकती है। अब देखो भाई अपने देश में जमीन की तो वैसे ही बहुत कमी है, अतः मिर्च की खेती अलग से किया जाना फायदे का सौदा नहीं है। इसलिए ऊपरी सतह पर मिर्च और गहरे में प्याज बोई जाती है। आपको याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि मिर्च लगने पर ही प्याज काटी जाती है। प्याज काटने का मजा भी तभी लिया जा सकता है जब मिर्च बहुत तीखी लगी हो । खेत में हरा धनियां बहुत कमाल करता है। वह लक्षित व्यक्ति को मिर्ची लगने से पहले संभलने नहीं देता, यदि इस खेत में लहसुन की खेती भी कर ली जाए तो अपने चहेतों के साथ मिलकर तड़का लगाने से मिर्ची भी बहुत लगती है। इस लिए तीन-चार तरह की सामाजिक खेती करने में फायदा ही फायदा है।
सामाजिक खेती करने वाले जानकारों का तो यहाँ तक कहना है कि यदि गेन्दे के फूलों को भी मेड़ और रोड के आस-पास लगा कर खेती की जाए तो मिर्ची लगने और उससे जमींदोज होने की खुशी में, लगे हाथ फूलों की माला पहना कर व्यापार को बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार की खेती का सबसे अधिक फायदा जनता को होगा क्योंकि जनता यह देखकर खुश होगी कि सामाजिक खेती करने वाले कम से कम एक-दूसरे को मिर्च लगाकर सबका मन बहला रहे है। वैसे भी सामाजिक खेती का देश-प्रदेश की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। सामाजिक खेती ही एक ऐसा व्यवसाय है जो सोने पे सुहागा वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है, वरना आज के आधुनिक दौर में कहावते भी मृत प्रायः हो गई है।
सामाजिक खेती में कसीदे पढ़ना आना चाहिए। लिखना आता हो या न आता हो पर कसीदों की भाषा में अपनापन जरूर होना चाहिए, फिर चाहे भक्त बनाओ या मठ बनाओ यही समाज की सच्ची सेवा है, जो आज की जरूरत है क्योंकि यही तो बचा है समाज सेवा के छेत्र में, बाकी के सब काम पूरे हो चुके है। इसलिए सामाजिक सेवा की खेती करना एक कला है। कला विज्ञान के बिना अधूरी है। अतः विज्ञान का लाभ वह लोग ही उठा सकते हैं जिन्हें सामाजिक खेती के लाभों के बारें में आन्तरिक जानकरी हो ।

अशोक कुमार जैन
2 – बी, रामद्वारा कॉलोनी,
महावीर नगर, जयपुर

This Post Has 2 Comments

  1. kapil Jain

    perfect

  2. kapil Jain

    100% right

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